बिहार का मिथिलांचल आज मधुबनी चित्रकला के कारण दुनिया भर में जाना जाता है। मधुबनी कला का फैशन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है। पर इसकी रचना में जुटी कलाकार महिलाओं का जीवन कैसा है, इस पर शायद कोई ध्यान नहीं देता।
**— मधुबनी से शशिधर खां की रिपोर्ट**
जितवारपुर बिहार के मधुबनी जिले का एक छोटा सा गांव है जिसका नाम मिथिला लोककला के लिए दुनिया भर के कलाप्रेमी जानते हैं। करीब १५०० मैथिलों का यह गांव मधुबनी शहर से सटा है लेकिन वहां के लोग शहरी चकाचौंध से दूर हैं और आलम यह है कि देश-विदेश के बड़े बड़े महानुभावों का आना-जाना लगा ही रहता है। उसकी वजह है वहां की प्राचीनतम मिथिला चित्रकारी, जो एक ओर ड्राइंग रूम में सजाने की वस्तु है तो दूसरी ओर रोजी-रोटी कमाने का माध्यम।
इस गांव के जिस किसी भी घर के सामने खड़े हो जाइए, मिट्टी की दीवार ही कलाकारों का परिचय दे देगी। फूस और खपरैल की छतों के अंदर यहां की महिलाएं, पुरुष, बच्चे सबके सब हाथ में कूची लिए अपनी प्राचीनतम धरोहर को बचाए रखने में जुटे हैं। उनके चित्र रामायण की पूरी कहानी सुनाते हैं।
जितवारपुर गांव में प्रवेश करते ही सबसे पहला मकान आता है पद्मश्री पुरस्कार-प्राप्त ८० वर्षीया सीता देवी का— सामने खुला हुआ, जगह-जगह बिखरे खपरैल वाली छत, दो-तीन कुर्सियां, दो चौकी और एक लकड़ी की अलमारी। हर चीज टूटी-फूटी, मिट्टी लगी हुई। वह अलमारी सलीके से बंद भी नहीं हो पाती जिसमें श्रीमती सीतादेवी विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में मिले पुरस्कार बड़ी मुश्किल से सुरक्षित रख पा रही हैं। यह मकान आंधी, पानी, बरसात से उनका बचाव नहीं कर पाता। जब बारिश होती है और छत टपकने लगती है तो उनके लिए अपनी उन कृतियों को बचाना कठिन हो जाता है जिनकी बदौलत उन्होंने देशविदेश में अपने गांव और प्रदेश का गौरव बढ़ाया है।
सीतादेवी आज भी घंटों बैठकर काम करने का माद्दा रखती हैं लेकिन उन्हें इस बात का दुख है कि मोतियाबिंद के कारण आंखों की रोशनी नहीं रही। 'आंखों के इलाज के लिए बिहार सरकार और भारत सरकार को कई बार लिखा, पर जब कहीं से कोई जवाब नहीं मिला तो जमीन गिरवी रखकर पटना और दिल्ली गई डाक्टर बोला इतनी देर क्यों की'- ये शब्द हैं सीतादेवी के, जो कई-कई बार जर्मनी, अमेरिका, फ्रांस और जापान से हो आई हैं। सीतादेवी सिर्फ हस्ताक्षर भर करना जानती हैं। गांव की भोली-भाली कैसे समझे कि वे खुद और उनकी कलाकृतियां राज्य सरकार तथा केंद्र सरकार के लिए प्रदर्शन की वस्तु हैं।
सीतादेवी का नाम पहली बार प्रकाश में आया १९७२ में जब राष्ट्रीय हस्तशिल्प प्रदर्शनी के सिलसिले में वे दिल्ली गई और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिल सकीं। सीतादेवी ने श्रीमती गांधी के सामने बैठकर पांच घंटे के अंदर सिर्फ माचिस की तीली से भगवती दुर्गा का चित्र बनाकर अपनी कलात्मक प्रतिभा का परिचय दिया। सीतादेवी बताती हैं, 'इस चित्र के पूरा होते-होते प्रधानमंत्री को किसी जरूरी काम से बाहर निकलना पड़ा। लेकिन बाद में उन्होंने अफसोस जाहिर करते हुए अपनी हस्ताक्षरयुक्त तस्वीर और एक शॉल भेजा।' सीतादेवी ने उस तस्वीर और शॉल को संभालकर रखा है। आगंतुकों को दिखाते वे समय भावविह्वल हो उठती हैं।
सीतादेवी १९८६ में बर्लिन (उस समय के पूर्व जर्मनी की राजधानी) गई। भारत महोत्सव के दौरान चित्र बनाते समय सीतादेवी की तन्मयता से अभिभूत होकर तत्कालीन चांसलर एरिक होनेकर ने अपने ड्राइंग रूम का सबसे खूबसूरत शो-पीस उन्हें भेंट किया। शीशे के इस शो-पीस में तरह-तरह के डिजाइन बने हैं और इसमें लगे आईने में कई तरह के चेहरे दिखाई देते हैं।
सीतादेवी मधुबनी चित्रकारी का सबसे मशहूर नाम है और इस गांव की एक दर्जन से भी ज्यादा राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त महिलाओं में सबसे ज्यादा ख्याति अर्जित कर चुकी हैं।
सीतादेवी की आमदनी का एकमात्र स्रोत है पद्मश्री के तौर पर मिलने वाले ५०० रुपए। अपने पोते को सचिवालय में नौकरी दिलवाने के लिए उन्हें घूस देनी पड़ी, उसके बावजूद उसको नौकरी नहीं मिली। घर का खर्च चलाने के लिए उन्हें बिचौलियों का इंतजार रहता है जो उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर कम कीमत पर पेंटिंग खरीद लेता है और बाहर ले जाकर ऊंची कीमत पर बेचता है। ये बिचौलिए विदेशी कला व्यापारियों के होते हैं।
दर्जनों राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित सीतादेवी आज उन महान हस्तियों में से हैं जिनसे पुरस्कार और प्रशस्ति पत्र ही महिमामंडित होते हैं। राष्ट्रपति भवन में जो भी समारोह होते हैं उनका बुलावा आता है। बड़े-बड़े लोग लेखक, पत्रकार, कलाप्रेमी आते हैं और तस्वीरें खिंचाकर चले जाते हैं। कभी-कभी इसका थोड़ा-बहुत फायदा भी मिल जाता है।
जून के प्रथम सप्ताह में कुछ पत्रकारों ने वहां जाकर स्थिति का अध्ययन किया और अखबारों में लिखा। उसके कुछ दिन बाद समाचार आया कि प्रधानमंत्री राहत कोष से सीतादेवी की सहायता के लिए दस हजार रुपए की मंजूरी दी गई है। लेकिन सीतादेवी को यह सब कुछ एक तिलिस्म जैसा लगता है।
इसी गांव की हैं बौआ देवी और शांतिदेवी, जो इन दिनों जापान में ही हैं। जगदंबा देवी, चंद्रकला देवी और यमुना देवी भी विदेश में हैं।
शिवन पासवान और शांति देवी— जितवारपुर गांव का नाम रोशन करने में इस हरिजन दंपति का सीतादेवी से कोई कम योगदान नहीं है। शिवन पासवान का कहना है कि उनका भाग्योदय हुआ १९८७ में जब पहली बार भारत सरकार की ओर से उन्हें इटली और अमेरिका ले जाया गया। उसके बाद से विदेशी कला व्यापारी खुद आने लगे और फिर उनके बिचौलियों के जरिए कलाकृतियों की बिक्री होने लगी।
१९८३ में शांति देवी को सोनिया गांधी ने २५,००० रुपए नकद प्रदान किए और कहा कि जब भी कोई जरूरत हो उन्हें लिखे। यह दंपति गोबर और प्राकृतिक रंगों के माध्यम से मिथिला लोक कथा का चित्रण करने में दक्ष है। अपनी इसी प्रतिभा की बदौलत शिवन और शांति को डेनमार्क, जर्मनी, जापान और फ्रांस जाने का मौका भी मिला। ३० वर्षीया शांति देवी अपने नाम और शोहरत का श्रेय श्रीमती गांधी को देती हैं जिनके साथ उन्हें विदेश जाने का मौका मिला। शांति देवी को यह प्रतिभा पारिवारिक विरासत के रूप में मिली। उनकी सास कुसुमा देवी को धातु से बनाई गई विभिन्न देवताओं की मूर्ति पर श्रेष्ठ शिल्प के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
शिवन और शांति का पूरा समय नए कलाकारों को प्रशिक्षण देने में गुजरता है। केंद्र सरकार के निर्देश पर बिहार सरकार ने एक कमरा बनवा दिया है जिसमें बैठकर यह दंपति गांव की अन्य महिलाओं को बोरे और कपड़े पर प्राकृतिक रंगों का कमाल सिखाता है। प्रशिक्षक के तौर पर १५०० रुपए शिवन को और ७५० रुपए शांति को भारत सरकार से मिलते हैं जो एकमात्र स्थायी आमदनी है।