बांग्लादेश से निर्वासित विवादास्पद लेखिका तस्लीमा नसरीन पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के समर्थन में कोलकाता में बोलीं और उसके तुरंत बाद हसीना ने कहा - 'मैं बांग्लादेश लौटूंगी, चाहे जो कीमत चुकानी पड़े' ।
कट्टरपंथी मुल्ला उलेमा, कोर्ट के खिलाफ बेधड़क खरी-खरी लिखने-बोलने के कारण विवादों से घिरी तस्लीमा नसरीन अपने इस्लामी मुल्क बांग्लादेश से तीन दशकों से निर्वासित / निष्कासित हैं । इसी वजह से उन्हें 2007 में वाम मोर्चा शासनकाल में कोलकाता छोड़ना पड़ा, जहां से ‘दूसरा घर’ कहकर रह रही थीं । उन्नीस साल बाद तस्लीमा उस समय कोलकाता लौटीं, जब पश्चिम बंगाल में पहली बार भाजपा की सरकार बनी ।
02 अगस्त को एक कार्यक्रम में शामिल होने कोलकाता पहुंची तस्लीमा नसरीन का गर्मजोशी से स्वागत हुआ । उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत बांग्लादेश के घटनाक्रम से करते हुए कहा कि शेख हसीना की वापसी पर अनिश्चितता चिंता की बात है । तस्लीमा ने शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग पर प्रतिबंध का विरोध किया और कहा कि राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध लोकतंत्र के खिलाफ कदम है ।
उसके तीन दिन बाद 5 अगस्त को दिल्ली स्थित विदेशी संवाददाता क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में शेख हसीना ने ऑडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मीडिया कर्मियों से बात करके कहा कि ‘मैं दिसंबर में अपने मुल्क लौटूंगी’ । हसीना ने कहा कि ‘चाहे इसकी जो भी कीमत चुकानी पड़े, मैं बांग्लादेश लौटूंगी’ ।
शेख हसीना की अवामी लीग सरकार के खिलाफ जुलाई-अगस्त, 2024 में बांग्लादेश में हुए उग्र छात्र आंदोलन पर काबू पाने में विफल होने के बाद शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद के साथ-साथ देश भी छोड़ना पड़ा । उसके बाद से वे भारत में रह रही हैं ।
राष्ट्रपति मोहम्मद शाहाबुद्दीन द्वारा छात्र नेताओं के दबाव में गठित कार्यवाहक सरकार के सलाहकार नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस ने शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया । इतना ही नहीं, एक विशेष अध्यादेश के तहत बने नए कानून के अंतर्गत अवामी लीग को आतंकी गुट घोषित कर दिया गया । शेख हसीना के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोधियों की कथित हत्या समेत कई गंभीर अपराधों के खिलाफ मुकदमे चलाए गए और उन्हें सजा-ए-मौत सुनाई गई । भारत-बांग्लादेश के रिश्ते में तल्खी आ गई । शेख हसीना को ट्रायल के लिए सौंपे जाने के बांग्लादेश सरकार के अनुरोध पर भारत सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया ।
शेख हसीना ने शायद खुद से या भारत सरकार की सलाह से चुप्पी साध रखी थी । तस्लीमा नसरीन के अचानक इस मुद्दे पर खुलकर बोलने के बाद शेख हसीना ने चुप्पी तोड़ी । दोनों महिलाओं के खुलकर बोलने के बाद भारत-बांग्लादेश के राजनेताओं का मिलना-जुलना और शेख हसीना के ढाका प्रत्यर्पण समेत विभिन्न द्विपक्षीय मुद्दों पर वार्ता का सिलसिला शुरू हुआ । ढाका के लिए हसीना की वापसी अहम है ।
तस्लीमा नसरीन के भारत प्रवास के दौरान कुछ भी लिखने-बोलने का असर दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्ते के अलावा भारत के अंदरूनी सियासी राजनीति पर भी पड़ा है । अभी उसमें नया मोड़ आ गया है । क्योंकि तस्लीमा जब कोलकाता में रहने आई थीं, उस समय यहां सभी राज्यों में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की सरकारें थीं । अभी जब तस्लीमा को भारत में कहीं भी रहने की छूट है, उस समय अधिकांश राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं । पश्चिम बंगाल की नई बीजेपी सरकार के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने तस्लीमा का स्वागत किया । अब तस्लीमा को तय करना है कि वो अब वापस कोलकाता आकर रहती हैं या नहीं । 2002 में जब तस्लीमा कोलकाता में रहने आई थीं, उस समय भी केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली बीजेपी गठजोड़ सरकार थी । नवंबर, 2007 में पश्चिम बंगाल के वाम मोर्चा के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने पंचायत चुनाव से ठीक पहले तस्लीमा को कोलकाता छोड़ने कहा ।
19 वर्ष बाद तस्लीमा ने अभी अगस्त, 2026 में कोलकाता में कदम रखा है । शेख हसीना के समर्थन में बोलने का एकमात्र कारण है, भारत सरकार की हसीना के प्रति हमदर्दी । हसीना के भी शासनकाल में तस्लीमा को बांग्लादेश आने की इजाजत नहीं थी । 1994 में जब तस्लीमा को बांग्लादेश से उलेमाओं के फतवे के कारण निर्वासित किया गया था, उस समय बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) सत्ता में थी और बेगम खालिदा जिया प्रधानमंत्री थीं ।
खालिदा जिया शासन के दौरान भारत-बांग्लादेश के रिश्ते अच्छे नहीं थे । थोड़े दिनों बाद बीएनपी को हटाकर अवामी लीग सत्ता में आई और शेख हसीना लगातार प्रधानमंत्री बनी रहीं । शेख हसीना ने न तो मुल्ला-उलेमाओं के दबाव में कोई काम किया और न ही उनसे नाराजगी मोल ली । उसमें भारत से बेहतर रिश्ते बनाने के साथ-साथ तस्लीमा को बांग्लादेश न आने देना भी शामिल रहा ।
वैसे तो तस्लीमा का सारा लेखन ही विवादित है, लेकिन उनकी किताब 'द्विखंडितों' और सात खंडों में छपी (आपबीती) पुस्तक 'निर्वासन' को लेकर ज्यादा बवाल मचा । तस्लीमा ने हमेशा मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और हरम मानसिकता वाले मुल्लाओं के बुर्का पंथ तथा तीन बार तलाक बोलने जैसी कुप्रथा के खिलाफ आवाज उठाई है ।
तस्लीमा इस्लामपंथ के खिलाफ जितना बोल्ड होकर बोलती आई हैं । उतना ही बोल्ड अभी हिंदुत्व कोड के समर्थन में बोल रही हैं । उनकी किताबों का कई विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और तस्लीमा यूरोपीय देशों में रह चुकी हैं । उनके पास अभी भी स्वीडन का वीजा है ।
कोलकाता को अपना दूसरा घर मानने वाली तस्लीमा कोलकाता के जरिए राजनीतिक / मजहबी विवाद के इर्द-गिर्द रही हैं । अभी अगस्त में तस्लीमा कोलकाता में कट्टरपंथ विरोधी भाजपा समर्थित साहित्यिक कार्यक्रम में भाग लेने आई, जिसमें मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी थे । तस्लीमा ने कार्यक्रम में जोरदार शब्दों में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का समर्थन किया और कहा कि भेदभाव खासकर मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ भेदभाव खत्म करने के लिए ऐसा कानून जरूरी है । तस्लीमा ने कहा कि भारत में यूसीसी लागू हो गया और बांग्लादेश तथा पाकिस्तान में भी ऐसा कानून बने । उन्होंने कहा, ‘मैं विगत 40 सालों से यूसीसी जैसे कानून के लिए लड़ रही हूं’ ।
तस्लीमा ने ऐसे समय में यूसीसी की वकालत कोलकाता आकर की है, जब पश्चिम बंगाल सरकार ने यूसीसी का मसौदा तैयार करने के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी गठित की है । भाजपा शासित असम, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र सरकारों द्वारा यूसीसी कानून बनाने को लेकर मुस्लिम, ईसाई समुदायों में रोष है । कुछ संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है ।
उधर बांग्लादेश में शेख हसीना के अपदस्थ होने और निर्वासन के बाद से हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले तेज हो गए । हिंदुओं के खिलाफ हिंसा, आगजनी की वारदातें बढ़ गईं । भारत के बार-बार कड़े एतराज जताने के बावजूद बंद नहीं हुए । 2025 के संसदीय चुनाव में छात्र संगठनों के समर्थन से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में लौटी, जिस पर शेख हसीना ने प्रतिबंध लगाया था । 2024 के आंदोलन के दौरान बेगम खालिदा का लंबी बीमारी के कारण इंतकाल हो गया । कई वर्षों से लंदन में निर्वासन में रह रहे खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान प्रधानमंत्री बने । लेकिन भारत से उनके रिश्ते में तल्खी बरकरार है और हिंदुओं पर हमले भी बंद नहीं हुए ।
तस्लीमा ने कोलकाता कार्यक्रम में भारत-बांग्लादेश के अच्छे रिश्तों की उम्मीद जताते हुए कहा कि भारत सरकार अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन करती है । इसके साथ-साथ तस्लीमा ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के धरना प्रदर्शन और बांग्लादेश में 2024 जेन जी छात्र आंदोलन में समानता दिखाई । तस्लीमा ने कहा कि ढाका छात्र आंदोलन ने हमें धोखा दिया, जिसने अवामी लीग सरकार को सत्ता से बाहर किया ।
तस्लीमा कोलकाता में गुजरे अपने वर्तमान और अतीत को याद करते हुए भावुक होकर कुछ इस अंदाज में बोली - ‘एक सरकार ने जाने को मजबूर किया, दूसरी ने आने नहीं दिया, और तीसरी ने मेरा स्वागत किया’ ।
गौरतलब है कि मई, 2025 में जब बांग्लादेश की कार्यवाहक सरकार शेख हसीना और अवामी लीग का आगे का राजनीतिक रास्ता बिल्कुल बंद करने में जुटी थी, उस समय भी भारत सरकार ने तस्लीमा ‘प्रेम’ दोहराया । तस्लीमा को पूरे देश के साथ-साथ कोलकाता में भी घूमने-रहने की आजादी दी ।
तस्लीमा और शेख हसीना के बांग्लादेश के विषय में मुँह खोलने से कुछ ही दिन पहले राष्ट्रपति मुहम्मद शहाबुद्दीन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया । बांग्लादेश की संसद (जातीय संसद) के स्पीकर हफिजुद्दीन अहमद को भेजे गए इस्तीफा पत्र में राष्ट्रपति ने वैसे इसमें अपनी बिगड़ती सेहत का हवाला दिया, मगर राजनीतिक हलकों में इसका कारण सियासी मतभेद है । राष्ट्रपति शहाबुद्दीन का पांच साल का कार्यकाल अप्रैल, 2028 में समाप्त होने वाला था । लेकिन सत्तारूढ़ बीएनपी और अवामी लीग की वैसे ही प्रतिद्वंद्वी विपक्षी जमात-ए-इस्लामी नेताओं को अवामी लीग शासनकाल के राष्ट्रपति गंवारा नहीं था । जैसा कि ‘ढाका डेली’ अखबार का कहना है । जेन जी आंदोलन से हुए सत्ता परिवर्तन के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ सभी शीर्ष पद खाली कराए गए । राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन एकमात्र व्यक्ति बचे रहे थे ।
13 अगस्त को बीएनपी ने राष्ट्रपति पद के लिए अपने महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर को उम्मीदवार बनाया और 20 अगस्त को चुनाव का ऐलान कर दिया ।
शेख हसीना के स्वदेश लौटने की बात मीडिया के जरिए प्रचारित करने के पांचवें दिन 10 अगस्त को ढाका में भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी प्रधानमंत्री तारिक रहमान से मिले । भारतीय एलीट खुफिया एजेंसी रॉ (RAW) प्रमुख पराग जैन ने भी ढाका में वहां के सुरक्षा सलाहकार डॉक्टर ए॰ के॰ एम॰ शम्सुल इस्लाम से मुलाकात की । बांग्लादेश सरकार ने भारत को भरोसा दिलाया कि शेख हसीना को पूरी सुरक्षा दी जाएगी, मगर उन्हें अदालती ट्रायल का सामना करना पड़ेगा ।
शेख हसीना ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा - ‘मैं जानती हूँ कि ढाका लौटने पर गिरफ्तार किया जा सकता है, मेरी हत्या भी हो सकती है, फिर भी मैं लौटूंगी’ । भारत ने बांग्लादेश के इस आरोप को खारिज किया कि हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस भारत प्रायोजित थी । उसी समय बांग्लादेशी प्रधानमंत्री को भारत आने का न्योता दिया गया । 12 और 13 सितंबर को भारत बिम्सटेक शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा, जिसमें शामिल होने के लिए तारिक रहमान को आमंत्रित किया गया है । इस व्यापारिक संगठन का बांग्लादेश भी सदस्य है ।
इस प्रसंग के कुछ और उतार-चढ़ाव देखने के लिए जरा पीछे चलते हैं । भारत में रहते हुए तस्लीमा पहले बोल चुकी हैं - ‘मैं वोट बैंक की राजनीति की शिकार हूं, सूटकेस की जिंदगी जी रही हूँ । मैं यहां राजनीतिक फुटबॉल नहीं बनना चाहती । लेकिन रही भारत में ही ।’
2007 में कोलकाता से निकाल बाहर किए जाने के बाद भाजपा और आरएसएस नेताओं में तस्लीमा को अपने यहां बुलाने की होड़ मच गई । सबसे आगे बढ़कर न्योता उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भेजा । आरएसएस प्रमुख के॰ एस॰ सुदर्शन ने अपने घर बुलाया । उसके बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुलावा भेजा । केंद्र की कांग्रेस गठजोड़ सरकार ने तस्लीमा को दिल्ली के बाहरी इलाके में अज्ञात स्थान पर रखा और मुँह बंद रखने को कहा ।
2012 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पुस्तक मेले में तस्लीमा को ‘निर्वासन’ पुस्तक के विमोचन के लिए आने की इजाजत नहीं दी । बांग्लादेशी प्रशासन और अपने यहां के मुस्लिम समुदायों का दबाव था । 2017 में केंद्र में भाजपा गठजोड़ सत्ता में थी और राजस्थान में भी भाजपा सरकार थी । वार्षिक जयपुर साहित्य उत्सव में तस्लीमा को बुलाने के जबरदस्त विरोध के कारण उन्हें जयपुर से भगाया गया और आयोजकों को कहना पड़ा कि आगे से तस्लीमा को नहीं बुलाया जाएगा । तस्लीमा ने उस समय ही समान नागरिक संहिता की वकालत करने के साथ-साथ मुसलमानों को ‘सहिष्णु’ होने की नसीहत दे डाली । इतनी जद्दोजहद के बावजूद तस्लीमा को ‘शरणार्थी’ का दर्जा नहीं है और कांग्रेस शासनकाल की तरह आज भी वीजा की अवधि बढ़ाने के लिए भाजपा गठजोड़ सरकार की दया पर टिकी हैं । भाजपा नेताओं को तस्लीमा के लिए ‘अतिथि देवो भव’ परंपरा का पालन करने के अलावा बांग्लादेश से रिश्ते बेहतर रखने और शेख हसीना की सलामती की भी फिक्र है ।