मणिपुर से सिर्फ हिंसा और तनाव की खबरें आती हैं । इस असामान्य हालात के तीन वर्ष से ज्यादा हो गए । इस अवधि के बेबाक विश्लेषण में अब बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रह गयी है कि हिंसा पर काबू पाना राज्य सरकार और सुरक्षा बलों के लिए संभव नहीं हो पा रहा है ।
जमीनी स्तर से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार दर्जनों जातियों/उपजातियों में बंटे इस छोटे से राज्य मणिपुर में गुटीय संघर्ष के तेवर बदलते जा रहे हैं । जिस टकराव और आपसी संघर्ष के कारण हिंसा पर नियंत्रण में कठिनाई आ रही है, उसमें विभिन्न समुदायों की स्थानीय कटुता नया मोड़ लेती जा रही है । क्षेत्रीय झगड़े में उलझे जातीय गुट अपने-अपने स्वार्थ से मौका देखकर रंग बदलते हैं । इसमें खून-खराबा रोकने का एजेंडा सामूहिक नहीं है । एक समुदाय का दूसरे समुदाय पर हमला, आगजनी का जवाब और सरकार पर दोषारोपण का सिलसिला खतम नहीं हो रहा है । हिंसा के पीछे राजनीतिक से ज्यादा सामाजिक कलह और अविश्वास का माहौल काम कर रहा है ।
मणिपुर से दूरदराज की खबरें देर से आती हैं । हालिया रिपोर्ट के अनुसार कुकी और नगा समुदाय आमने-सामने हैं । दोनों समुदायों के कई उग्रवादी/हमलावर गुट हैं, जो एक-दूसरे पर हमले करते रहते हैं । कुकी - नगा हिंसा दशकों पुरानी है ।
अभी इस हिंसा से मेइतेइ समुदाय ने खुद को अलग कर लिया है । जबकि मई, 2023 में झमेले की शुरूआत मेइतेइ - कुकी हिंसा से हुई थी ।
हिंसा भड़कने का कारण उस समय मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह का कथित उकसाने वाला भाषण बताया गया, जो आदिवासी मेइतेइ और कुकी समुदायों के एसटी (अनुसूचित जनजाति) दर्जा विवाद से सम्बन्धित था । मेइतेइ समुदाय से आनेवाले मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह का भाषण उनके अपने समुदाय के लोगों की अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की मांग से जुड़ा था । उस मांग के विरोध में 03 मई, 2023 को आदिवासी एकजुटता मार्च के दौरान हिंसा उफनी । मेइतेइ से मुकाबले में कुकी समुदाय के लोग थे । हिंसा लगातार जारी रही । नगा समुदाय के लोगों ने उस हिंसा से दूरी बनाए रखी और लगभग तटस्थ रहे । कुकी उपजाति के भी नगा गुट उससे अलग रहे ।
हिंसा के तीसरे वर्ष में प्रवेश करने के बाद कलेवर बदल गया । अब कुकी और नगा भिड़े हुए हैं । मेइतेइ समुदाय के लोग किसी के साथ नहीं हैं । मगर इनका कुकी विरोध बरकरार है । मेइतेइ का नगाओं के प्रति नरम रवैया है ।
अभी ताजा मामला पूरे राज्य में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का सामने आया है, जिसमें मेइतेइ और नगा समुदाय के सारे सिविल सोसायटी संगठनों ने एकजुटता का परिचय दिया है । यह विवाद परिसीमन जनगणना प्रक्रिया शुरू होने को लेकर खड़ा हुआ है । जनगणना को मणिपुरियों ने एनआरसी से जोड़कर नया आंदोलन शुरू कर दिया ।
सही और उचित परिसीमन (JFD - जस्ट एंड फेयर डिलिमिटेशन) अभियान के बैनर तले चल रहे इन विरोध प्रदर्शनों के संचालकों ने राज्य सरकार को 30 अगस्त को अल्टीमेटम दिया ।
इस आंदोलन में शामिल 14 सिविल सोसायटी संगठनों और विधायकों ने मुख्यमंत्री युमनाम (वाई) खेमचंद सिंह को दिए गए अल्टीमेटम में कहा कि अगर सरकार यह घोषणा नहीं करती है कि जनगणना से पहले एनआरसी अपडेट किया जाएगा तो सोमवार (31 अगस्त) की आधी रात से 24 घंटे की आम हड़ताल शुरू हो जाएगी ।
जनगणना से पहले राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर अपडेट करने के लिए आंदोलन दो-तीन महीना से चल रहा है । लेकिन सामाजिक संगठनों ने 24 घंटे की आम हड़ताल की धमकी विधान सभा सत्र को ध्यान में रखकर दुहरायी । 02 सितंबर से आहूत विधान सभा सत्र के मद्देनजर मुख्यमंत्री के लिए भी मांग को नकारना और आंदोलन की उपेक्षा करना संभव नहीं था । वे समझ रहे थे कि इससे फिर नए सिरे से और भी जनजीवन अस्तव्यस्त होगा । उससे भी ज्यादा कि विधायकों के लिए विधान सभा पहुंचना मुश्किल हो जाएगा । वाई. खेमचंद सिंह भूल नहीं सकते कि फरवरी, 2026 में गठित नए मंत्रिमंडल में सिर्फ अकेले वही सुरक्षा किलाबंदी घेरे में राजधानी इंफाल में मुख्यमंत्री पद की शपथ ले पाए । उनके दो उपमुख्यमंत्री कुकी-जो समुदाय से नेमचा किपगेन और नगा समुदाय से लोसी दीखो को अपने पद की शपथ दिल्ली में ही मणिपुर भवन में लेनी पड़ी । फरवरी में ही विधान सभा के बजट सत्र में शामिल होने भाजपा के 10 कुकी-जो विधायक सदन तक पहुंचने की स्थिति में नहीं थे ।
अभी भी हालात में सुधार नहीं है । 28 अगस्त को एक विधायक सापाम रंजन सिंह के इंफाल पश्चिम जिला स्थित आवास में बम फटा । मुख्यमंत्री उनके घर पहुंचे और हिंसा की निंदा की ।
मुख्यमंत्री एनआरसी प्रदर्शनकारियों से आम हड़ताल और चक्का जाम टालने की अपील करते हुए तुरंत दिल्ली रवाना हो गए । मुख्यमंत्री ने भरोसा दिलाने के लिए आंदोलनकारियों से कहा कि 14 सिविल सोसायटी संगठनों के नेताओं और विधायकों के प्रतिनिधिमंडल की विगत दिनों दिल्ली में इस संबंध में केंद्रीय नेताओं से मुलाकात सार्थक रही ।
मगर आंदोलनकारी अपने अल्टीमेटम पर अड़े रहे कि 30 अगस्त की रात या 31 अगस्त की सुबह तक केंद्र एलान करे कि जनगणना का काम अभी स्थगित रहेगा और एनआरसी अपडेट किया जाएगा । यह तो केंद्रीय गृह मंत्रालय के एजेंडे का ही हिस्सा है और देश भर के सीमावर्ती राज्यों में यह अभियान चल रहा है कि घुसपैठियों/अवैध आप्रवासियों की पहचान करके उन्हें निकाल बाहर किया जाए और एनआरसी अपडेट किया जाए ।
इसलिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस अल्टीमेटम को गंभीरता से लिया और 30 अगस्त को ही दिल्ली में उच्चस्तरीय बैठक करके स्थिति की समीक्षा की गयी । गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में मणिपुर के मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह के अलावे राज्यपाल अजय कुमार भल्ला और केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन शामिल हुए । निर्णय हुआ कि जातीय हिंसा प्रभावित मणिपुर में तय कार्यक्रम के अनुसार 01 सितंबर से घर-घर जाकर जानकारी एकत्र करने का जनगणना काम स्थगित रखा जाए । मुख्यमंत्री सचिवालय से जारी वक्तव्य के अनुसार लोगों की आकांक्षाओं और भावनाओं का ख्याल करके जनगणना का काम रोकने का फैसला किया गया है ।
31 अगस्त को ही गुवाहाटी से यह खबर आयी कि केंद्र के जनगणना, 2027 स्थगित रखने की बात मणिपुर हाईकोर्ट में पेश दलील में कही । आंदोलन के दौरान ही यह मामला कोर्ट में जा चुका था । मणिपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 12 अक्टूबर तक जनगणना का काम रोकने का निर्देश दिया । केंद्र और राज्य सरकार दोनों की ओर से हाईकोर्ट में अंडरटेकिंग की गयी । केंद्र ने हाईकोर्ट को कहा कि रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त 01 सितंबर से शुरू होनेवाला जनगणना का काम रोकने की अधिसूचना जारी कर रहे हैं ।
मुख्यमंत्री ने दिल्ली रवाना होने से पहले प्रदर्शनकारियों से अपील में कहा कि वे केंद्रीय नेताओं से एनआरसी के अलावे राज्य में कानून और व्यवस्था समेत अन्य समस्याओं पर भी विमर्श करेंगे । उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्रालय से बेकाबू हिंसा पर चर्चा की या नहीं, यह जानकारी तो बैठक के अंदर ही रह गयी । मगर इधर केंद्रीय गृह मंत्री हालात की उच्चस्तरीय समीक्षा कर रहे थे और बाहर हिंसा जारी रहने की चर्चा समानान्तर चल रही थी । हमला और जवाबी हमला की खबर एनआरसी प्रदर्शनकारियों की मांग मान लेने के साथ ही आ रही थी ।
हिंसा की वारदातें कुकी-जो बहुल आबादी वाले कांगपोकपी जिले में हुई, जो अभी हिंसा का केंद्र है और इसका असर उसके आसपास म्यांमार सीमा से सटे इलाकों में फैला हुआ है । प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार दो महिलाओं समेत तीन ग्रामीण तेइखांग कुकी गांव पर हुए संदिग्ध उग्रवादी हमले में मारे गए और चार अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए ।
घटनास्थल वाले प्रखंड ट्वीलांग कुकी समन्वय समिति और कुकी छात्र संगठन ने इस वारदात के लिए नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (एनएससीएन – IM - आइसाक मुइवा) तथा इसकी डमी हमलावर गुट (ZUF – K) को जिम्मेदार ठहराया है ।
उसके अगले दिन 02 सितंबर को कांगपोकपी जिले के ही नगा आबादी वाले तीन गांवों पर बंदूक धारियों ने आक्रमण किया, जिसमें एक पादरी मारा गया और कई लोग घायल हो गए । हमलावरों ने 30 मकानों में आग लगा दी । इसे कुकी उग्रवादियों का जवाबी हमला बताया गया ।
इसके पहले 28 अगस्त को भी इसी जिले में एक वाहन पर घात लगाकर किए गए हमले में चार नगाओं की मौत हो गयी । युनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी - UNC) ने उस हमले का आरोप कुकी नेशनल फ्रंट और कुकी रिवोल्यूशनरी आर्मी (केआरए - KRA) पर लगाया । इस साल कांगपोकपी और उखरूल जिले में ही 25 से ज्यादा लोग मारे गए हैं, जहां कुकी तथा नगाओं की मिली-जुली कौम रहती है ।
गौरतलब है कि एनएससीएन (आई-एम) नगालैंड और मणिपुर का सबसे पुराना मजबूत गुट है, जिसके नेता टी. मुइवा उखरूल नगा होने के साथ-साथ मणिपुर निवासी हैं । इस गुट का 2015 से केंद्र सरकार के साथ संघर्षविराम (शांति) की ‘फ्रेमवर्क डील’ चल रही है । 90 साल की उम्र पार कर चुके मुइवा अभी तक तय नहीं कर पाए कि उनके समुदाय का भविष्य शांति में है कि हिंसा में । उनके साथ-साथ सात अन्य नगा गुटों का भी केंद्र से समझौता चल रहा है ।
उसके अलावे कुकी गुटों का भी केंद्र से शांति पर सहमति वार्ता चल रही है । गत मई से जब नगा, कुकी समुदायों के बीच विद्वेष ने हिंसा को दूसरा मोड़ दे दिया, उसी समय केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों की मौजूदगी में कुकी नेशनल ऑगनाइजेशन और युनाइटेड पीपुल्स फ्रंट नेताओं के साथ दिल्ली में वार्ता हुई । उग्रवादी गुटों की हठधर्मिता के कारण बेनतीजा शांति वार्ता से हताशा में आए दिन नए गुट पैदा हो रहे हैं । इससे हिंसा की आग बुझ नहीं पा रही है ।
गत जुलाई में एनएससीएन (आईएम) के दिवंगत सह संस्थापक आइसाक चिशी के पुत्र इकारो चिशी ने अपना गुट बना लिया और कहा कि तीन दशक में संघर्षविराम की भावना खत्म हो चुकी है, नए सिरे से लड़ाई तेज करने की जरूरत है । आइसाक चिशी की अगस्त, 2015 में दिल्ली में उसी समय अस्पताल में मृत्यु हो गयी, जब मुइवा ने केंद्र के साथ ‘फ्रेमवर्क डील’ पर दस्तखत किए ।
हिंसा में शामिल सब-के-सब आदिवासी समाज के लोग हैं, जिनके अंदर सद्भाव और समन्वय की जगह नफरत की भावना ने ले ली है । संघर्षरत तीनों समुदायों - मेइतेइ, कुकी-जो और नगा से भाजपा विधायक जीते हुए हैं, जिसकी सरकार है । मणिपुर में भाजपा का दूसरा कार्यकाल चल रहा है और सरकार इतने दिनों में सभी समुदायों को भरोसे में नहीं ले पायी । अगले वर्ष चुनाव होनेवाला है । इसके लिए कहीं-न-कहीं राजनीतिक और सामाजिक रूप से सबल मेइतेइ समुदाय दोषी है, जिस समुदाय के दूसरे मुख्यमंत्री हैं, वाई. खेमचंद सिंह । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 2029 तक पूर्वोत्तर को उग्रवाद मुक्त घोषित करने की बात कह रहे हैं । मगर इसके केंद्र में है मणिपुर । पूर्वोत्तर में शांति के लिए मणिपुर को हिंसामुक्त करना जरूरी है ।
हिंसा की जड़ में सिर्फ म्यांमार से सटी खुली सीमा के रास्ते कुकी उग्रवादियों की घुसपैठ नहीं है, जो मेइतेइ और नगा समुदाय की जुगलबंदी बता रही है । नगाओं के भी गुट म्यांमार सीमा से हिंसा को अंजाम देते हैं । कुकी और नगा दोनों में हमलावरों को उग्रवादी गुट कहा जाता है, जो फायरिंग करके एक-दूसरे के घरों में आग लगाकर भाग जाते हैं ।
सीमा पर बाड़ लगाने का काम देखने और सीमा सुरक्षा बल के साथ सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करने जून के पहले सप्ताह में पूर्वोत्तर दौरे पर पहुंचे अमित शाह ने कहा कि सीमा के जरिए आबादी का संतुलन बिगड़ने नहीं दिया जाएगा । एक महीना पहले मई में सुरक्षा बलों ने म्यांमार सीमा से कुकी और नगा दोनों उग्रवादी गुटों के कामजोंग जिले के रास्ते प्रवेश करने की जानकारी दी । दोनों ही समुदाय मेइतेइ की ही तरह मणिपुर के पुराने वाशिंदे हैं । लेकिन मेइतेइ और नगा सिविल सोसायटी संगठनों ने जनगणना से पहले एनआरसी अपडेट मांग के समर्थन में कहा कि म्यांमार सीमा से घुसपैठ करनेवाले अवैध प्रवासियों ने मणिपुर का आबादी संतुलन बिगाड़ दिया है ।
कुकी-जो समुदाय के लोग (भाजपा के 10 विधायक समेत) 2027 चुनाव से पहले ‘अलग कुकी प्रशासन’ (UT - यूटी टाईप) की मांग पर अड़े हैं । ये मणिपुर के उन्हीं 6 जिलों के निवासी हैं, जहां के अधिकारियों ने जनगणना के लिए पर्यवेक्षकों की ट्रेनिंग का काम स्थगित कर दिया है ।
केंद्र सरकार, राज्य सरकार हिंसा पर काबू पाने के प्रयास में थक चुकी है । सुप्रीम कोर्ट हिंसा पीड़ितों का दर्द सुनते-सुनते थक चुकी है ।
बीते 14 अगस्त को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकान्त की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने मेइती और कुकी दोनों समुदायों से कहा कि लड़ते-लड़ते तीन साल से ज्यादा हो गए, थक गए होंगे, शांति बहाल करने और सड़कों तथा राजमार्गों को चालू करने के बारे में सोचें ।
मणिपुर में तीन साल में पांच मुख्य सचिव बने । तीन साल से ज्यादा हो गए, इंफाल, दीमापुर, गुवाहाटी सड़क मार्ग बंद है । मुख्यमंत्री ने 30 अगस्त को दिल्ली जाने के समय इसे चालू करने का जिक्र किया ।
मणिपुर के विश्लेषकों को अब 1990 के दशक वाली हिंसा फिर से जीवित होने की आशंका है, जब दोनों इसाई समुदायों के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया, जिसमें 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए । जून में 6 नगाओं के क्षत-विक्षत शव सुरक्षा बलों ने बरामद किए, जिन्हें कुकियों ने बंधक बनाकर मारा । मेइती समुदाय के रवैए को राजनीतिक माना जा रहा है । इन 6 नगाओं को बंधक से मुक्त कराने की मांग को लेकर आयोजित रैली में नगा पीपुल्स यूनियन ने उपमुख्यमंत्री नेमचा किपगेन को भी हटाने की मांग की । 26 मई की रैली में मेइती लोग भी शामिल हुए । कुकी-जो और नगा गुटों ने एक-दूसरे समुदाय के 48 लोगों को एक महीने तक बंधक रखने के बाद छोड़ा । 10 जून को रिहाई के समय ही कांगपोकपी जिले नगाओं के शव बरामद हुए ।
केंद्र और राज्य सरकार मणिपुरियों को विश्वास में लेने लायक संवेदनशील नहीं हुई है । 03 मई, 2023 को भड़की हिंसा की जांच के लिए कमिटी एक महीने बाद ही बनी, जिसकी अवधि बार-बार बढ़ायी जा रही है । जांच कमिटी को 6 महीने में रिपोर्ट देनी थी ।
भाजपा के सभी विधायकों की मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को हटाने की मांग केंद्र टालती रही । बीरेन सिंह ने इस्तीफा 09 फरवरी, 2025 को दिया, जब सुप्रीम कोर्ट ने एक दिन पहले कहा कि मुख्यमंत्री के कथित उकसाऊ भाषण की वीडियो क्लिप देखी जाएगी । उसके बाद राष्ट्रपति शासन लगा । फरवरी, 2026 में सरकार बहाली की विधायकों की मांग पर वाई. खेमचंद सिंह के नेतृत्व में दूसरा मंत्रिमंडल बना, इसके दोनों समन्वय मंत्री लगातार विवाद के घेरे में हैं ।