यह लेख चुनाव आयोग की उस लाचारी पर प्रकाश डालता है जिसमें वह दागी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकता। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को इस संबंध में 'तार्किक आदेश' जारी करने का निर्देश दिया है, जबकि चुनाव आयोग का मानना है कि यह अधिकार उसके पास नहीं है और इसके लिए जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन की आवश्यकता है। राजनीतिक दल इस मुद्दे पर कानून बनाने से बचते रहे हैं, जिससे राजनीति का अपराधीकरण जारी है।
यह लेख पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले चुनाव आयोग की भूमिका पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की आपत्तियों का विश्लेषण करता है। माकपा ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग तृणमूल कांग्रेस के इशारे पर काम कर रहा है और उन क्षेत्रों को निशाना बना रहा है जहां वाम मोर्चा का वोट अधिक है। लेख में चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वायत्तता और राजनीतिक दलों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए उस पर सवाल उठाने की प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला गया है, साथ ही चुनावी सुधारों और राजनीतिक अपराधों से संबंधित चुनौतियों पर भी चर्चा की गई है।
यह लेख 17वीं लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान चुनाव आयोग की भूमिका और आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़े विवादों का विश्लेषण करता है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह को क्लीन चिट दिए जाने, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के नाथूराम गोडसे संबंधी बयान, और 'भारतीय जिन्ना पार्टी' जैसे मुद्दों पर प्रकाश डाला गया है। लेख चुनाव आयोग की सीमित शक्तियों और उसकी निष्पक्षता पर उठे सवालों पर भी चर्चा करता है।
यह लेख बताता है कि कम्युनिस्ट चीन के साथ भारत की सीमा वार्ता भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार द्वारा निर्धारित ढांचे पर चल रही है। इसमें अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा 2003 में शुरू की गई विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ताओं का उल्लेख है, जिसमें ब्रजेश मिश्र और दई बिंगुओ शामिल थे। लेख में मनमोहन सिंह सरकार के तहत शिवशंकर मेनन और दई बिंगुओ के बीच चल रही वार्ताओं और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी की चीन यात्रा का भी जिक्र है, जिन्होंने वाजपेयी के योगदान को रेखांकित किया।
यह लेख धारा 370 हटाए जाने के पांच साल पूरे होने पर भाजपा के राजनीतिकरण की आलोचना करता है। लेखक का तर्क है कि भाजपा इसे अपनी ऐतिहासिक उपलब्धि मानती है, जबकि जम्मू-कश्मीर के मतदाताओं के लिए यह अब कोई मुद्दा नहीं रहा। लेख में बताया गया है कि कैसे भाजपा इस मुद्दे को आगामी विधानसभा चुनावों और अन्य सार्वजनिक आयोजनों में भुनाने की कोशिश कर रही है, जबकि अन्य दल इसमें रुचि नहीं रखते।
यह लेख जम्मू व कश्मीर में अनुच्छेद 370 की वापसी और राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग पर केंद्रित है, जो इसके निरस्त होने के छह साल बाद भी जारी है। क्षेत्रीय दल और कांग्रेस केंद्र सरकार पर मानसून सत्र में राज्य का दर्जा बहाल करने वाला विधेयक लाने का दबाव बना रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार के टालमटोल रवैये पर सवाल उठाया है, जबकि उपराज्यपाल प्रशासन राजनीतिक गतिविधियों को दबाने और अन्य मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने का आरोप है।
यह लेख जम्मू-कश्मीर में धारा 370 की वापसी की लड़ाई के कमजोर पड़ने का विश्लेषण करता है। गुलाम नबी आजाद जैसे प्रमुख नेताओं ने स्वीकार किया है कि केंद्र सरकार इसे बहाल नहीं करेगी, और अब उनका ध्यान राज्य का दर्जा बहाल करने और विधानसभा चुनाव कराने पर है। लेख पीएजीडी में दरारों और परिसीमन प्रक्रिया पर राजनीतिक दलों के मतभेदों पर भी प्रकाश डालता है, जबकि सभी दल सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
यह लेख जम्मू व कश्मीर में परिसीमन आयोग के दौरे और केंद्र सरकार तथा स्थानीय राजनीतिक दलों के बीच चल रहे गतिरोध पर केंद्रित है। केंद्र सरकार विधानसभा चुनाव से पहले परिसीमन कराना चाहती है, जबकि जम्मू व कश्मीर के दल पहले राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग कर रहे हैं। धारा 370 की वापसी की संभावना को भी असंभव माना जा रहा है।