यह लेख 1975 के आपातकाल की "मीठी और कड़वी यादों" का विश्लेषण करता है। लेखक जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन, आपातकाल के दौरान की घटनाओं और उसके बाद भारतीय राजनीति में आए बदलावों पर प्रकाश डालता है, जिसमें भाजपा का उदय भी शामिल है। लेख आपातकाल के दौरान अनुशासन और व्यवस्था में सुधार को याद करने वाले आम लोगों की धारणाओं की तुलना प्रेस सेंसरशिप और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी जैसे कड़वे अनुभवों से करता है, और वर्तमान मोदी सरकार की नीतियों से समानताएं खींचता है।
यह आलेख मीडिया, समाज और चुनावों के बीच संबंधों पर केंद्रित है, जिसमें फेक न्यूज, पेड न्यूज और सोशल मीडिया के न्याय प्रक्रिया पर बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त की गई है। इसमें राफेल सौदे, पुलवामा हमले और चुनाव आयोग की पेड न्यूज को चुनावी अपराध बनाने की मांग जैसे हालिया उदाहरणों का हवाला दिया गया है। लेखक मीडिया की विश्वसनीयता बनाए रखने और आत्म-नियमन की आवश्यकता पर जोर देता है।
यह लेख भारत में पत्रकारों पर 'देशद्रोह' के आरोप में बढ़ती दंडात्मक कार्रवाई की आलोचना करता है, विशेषकर कोरोना लॉकडाउन के दौरान। अंतरराष्ट्रीय प्रेस इंस्टीच्यूट, एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने गुजरात के पत्रकार धवल पटेल की गिरफ्तारी और अन्य पत्रकारों के खिलाफ दर्ज मामलों की निंदा की है। लेख में कहा गया है कि सरकार की नीतियों की आलोचना करने वालों को 'देशद्रोही' करार दिया जा रहा है, जिससे प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में है।
यह लेख भाजपा सरकार द्वारा अपने आलोचकों को 'शहरी नक्सल' और 'साहित्यिक नक्सल' करार देने की प्रवृत्ति पर केंद्रित है। यह विशेष रूप से पारुल खक्कड़ की कविता 'शववाहिनी गंगा' पर गुजरात साहित्य अकादेमी की प्रतिक्रिया और गंगा में तैरते शवों के मामले में मीडिया की भूमिका पर सरकार की आपत्ति का विश्लेषण करता है। लेख यूएपीए कानून के दुरुपयोग और लोकतंत्र में असहमति को दबाने के प्रयासों पर भी प्रकाश डालता है।
यह लेख धर्म के राजनीतिकरण और सोशल मीडिया के माध्यम से सांप्रदायिक असहजता फैलाने पर केंद्रित है। यह भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति, तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों की बदलती रणनीति और पूर्वोत्तर, गोवा, तमिलनाडु, केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में हाल की घटनाओं का विश्लेषण करता है। लेखक सोशल मीडिया पर अफवाहों और नफरत भरे भाषणों के नकारात्मक प्रभाव पर भी प्रकाश डालता है।
यह लेख सोसल मीडिया के 'अनसोसल' माहौल बनाने और इसके नकारात्मक प्रभावों पर केंद्रित है। इसमें सरकार द्वारा ट्विटर, व्हाट्सएप, फेसबुक और यूट्यूब जैसे प्लेटफार्मों पर खातों और वीडियो को ब्लॉक करने के प्रयासों, चाइल्ड पोर्नोग्राफी और दुष्कर्म वीडियो के मामलों, तथा ट्विटर द्वारा सरकारी आदेशों को चुनौती देने जैसे कानूनी विवादों का उल्लेख है। लेख में डेटा प्राइवेसी, भारत-विरोधी गतिविधियों में सोसल मीडिया के इस्तेमाल (जैसे पीएफआई द्वारा), और चीनी ऐप्स द्वारा धोखाधड़ी जैसे मुद्दों पर भी प्रकाश डाला गया है।