चीन के रक्षामंत्री और स्टेट काउंसिलर छांग वान्कुआन के काठमांडू से विदा होते ही भारत के सेनाध्यक्ष जनरल रावत नेपाल पहुंचे । चीन और नेपाल के बीच पहले से ही सैनिक अभ्यास चल रहा है । चीन के रक्षामंत्री के नेपाल रवाना होने के समय ही चीनी सरकारी मीडिया ने भारत को चेतावनी दी कि दक्षिण एसियाई देशों के साथ चीन के संबंधों के बीच में अगर भारत आया तो 'उसके खिलाफ चीन लड़ेगा ।' चीनी रक्षामंत्री छांग वान्कुआन के काठमांडू दौरे का मकसद चीन-नेपाल के संबंधों में भारत की वजह से आ रही थोड़ी बहुत दरार ठीक करना और सैनिक आदान-प्रदान तथा सहयोग पूर्ववत् बनाए रखना था ।
उसी की काट में भारत के नए सेनाध्यक्ष जनरल रावत बिना देरी किए चीनी रक्षामंत्री के नेपाल से निकलने के बाद वहां पहुंच गए । जनरल रावत ने अपने पहले विदेश दौरे को यह कहकर उचित ठहराया कि पड़ोसी देश उनकी प्राथमिकता है । जनरल रावत बांग्लादेश भी गए । भारतीय सेनाप्रमुख का दोनों ही पड़ोसी देशों का दौरा मायने रखता है । क्योंकि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद के भारत दौरे की तैयारी पूरी हो चुकी थी । जनरल रावत ढाका से लौटे और उसके बाद शेख हसीना दिल्ली पहुंची । बांग्लादेश की प्रधानमंत्री की भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रतिनिधि स्तर की वार्ता आठ अप्रैल को हुई और कई द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए । उनमें असैनिक परमाणु संधि के अलावे रक्षा सौदे पर भी पर्याप्त फोकस किया गया ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में सत्ता संभालने के बाद से पड़ोसी देशों से रिश्ता मजबूत करने पर बार-बार जोर दे रहे हैं । लेकिन अभी तक उन्हें चीन को पछाड़ने में भरपूर सफलता नहीं मिल रही है । दक्षिण एसियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) लगातार खटाई में चल रहा है । उसके लिए अगर सिर्फ एक देश को जिम्मेदार ठहराया जाए तो वह पाकिस्तान है । चीन का एकमात्र पाकिस्तान से जुड़ा मामला बिल्कुल स्पष्ट है कि भारत - पाकिस्तान संबंध बेहतर नहीं होने देना है । इसलिए हथियार सौदे से लेकर जम्मू व कश्मीर और पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) तक पाकिस्तान से जुड़े हर मामले में चीन की घुसपैठ है । जब भारत के सेनाध्यक्ष नेपाल, बांग्लादेश के दौरे पर निकले उस वक्त पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बजवा चीन में थे । चीनी सेना प्रमुख जनरल ज्यांग फेंगुई से उनकी मुलाकात एफ सी-1 शियाओलोंग लड़ाकू विमान का संयुक्त रूप से उत्पादन और चीन-पाक आर्थिक कोरीडोर की रक्षा के लिए 15,000 से ज्यादा सैनिक तैनात करने पर केंद्रित थी ।
नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार में चीनी पेंच इतनी गहराई तक है कि ये पड़ोसी देश भारत से ज्यादा चीन को अपना हितैषी मानते हैं । इन पड़ोसी देशों के साथ एक विचित्र बात ये है कि आर्थिक - व्यापारिक संबंध भारत से बढ़ाते हैं और रक्षा के मामले में भारत से ज्यादा चीन पर भरोसा करते हैं ।
पड़ोसियों में सबसे पेचीदा और उलझन वाला मामला नेपाल तथा बांग्लादेश का है । बांग्लादेश की वर्तमान अवामी लीग सरकार को भारत समर्थक कहा जाता है । 2018 में बांग्लादेश में आम चुनाव होनेवाला है । शेख हसीना के नेतृत्व में पिछले चुनाव में अवामी लीग की भारी जीत में भारतीय सेना की कथित भूमिका के प्रचार में चीन के अखबार 'ग्लोबल टाइम्स' का बड़ा हाथ था । बांग्लादेश में सेना पर्दे के पीछे से सरकार में निर्णायक भूमिका निभाती है । वहां की सेना पाकिस्तान की तरह भारत से अच्छा रिश्ता पसंद नहीं करती, लेकिन चीन से दोस्ती में परहेज नहीं है । राजनीतिक नेतृत्व पर भी ये बात हावी रहती है । चीन का दवाब बांग्लादेश पर इतना ज्यादा है कि भारत के रक्षा सौदे में वहां की सरकार हिचकिचाती है । बांग्लादेश - चीन का वर्तमान रक्षा सौदा 2002 का है, जब बांग्लादेश में बेगम खालिदा जिया की सरकार थी । वे सैनिक जनरल की पत्नी हैं, जो सैनिक तख्तापलट करके राष्ट्रपति बनने के बाद मार दिए गए ।
2002 में भारत में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा गठजोड़ सरकार थी । बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेगम खालिदा भारत दौरे से लौटने के बाद चीन गयीं और रक्षा सौदा किया ।
जनरल रावत बांग्लादेश को समझा आए कि भारत से रक्षा सहयोग किस प्रकार चीन से ज्यादा भरोसेमंद हैं । नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद शेख हसीना दूसरी बार भारत आयी हैं । नरेंद्र मोदी भी ढाका हो आए हैं । अभी भी दिल्ली हवाई अड्डे पर हसीना को रिसीव करने प्रोटोकॉल तोड़कर नरेंद्र मोदी स्वयं गए । इस बार की शेख हसीना की भारत यात्रा काफी महत्वपूर्ण रही, क्योंकि इसके पहले दो बार स्थगित हो चुकी थी । दोनों देशों के बीच जिन 22 समझौतों पर सहमति बनी, उनमें रक्षा, सुरक्षा और असैन्य परमाणु सहयोग भी शामिल है । भारत अपने यहां से रक्षा खरीद के लिए बांग्लादेश को 4.5 अरब डॉलर का ऋण देगा । 22 सहमतियों में से पांच रक्षा और तीन असैन्य परमाणु से संबंधित हैं । 500 मिलियन डॉलर एलओसी (लाइन ऑफ क्रेडिट / ऋण सहायता) मुख्य रूप से रक्षा साज-सामान खरीद में सहयोग के लिए तय हुए । निशाना सीधा था, ताकि बांग्लादेश रक्षा उपकरण के लिए चीन पर निर्भर न रहे ।
नेपाल के अंदर राजनीति से लेकर सेना तक चीनी घुसपैठ का पेंच भारत-नेपाल नजदीकी में सबसे बड़ा अड़ंगा है । नेपाल के साथ एक अजीबोगरीब बात ये रही है कि वहां कई वर्षों से लगातार चल रही राजनीतिक अस्थिरता के लिए नेपाल के राजनीतिज्ञ भारत को जिम्मेदार ठहराते हैं । लेकिन आंतरिक और बाहरी रक्षा के लिए हथियार तथा सैनिक साज-सामान चीन से लेते हैं । आज से नहीं, राजशाही के जमाने से ही नेपाल का ये हाल है । नरेश वीरेंद्र अपनी और देश की रक्षा के लिए चीन से हथियार खरीदते थे । राजशाही के खिलाफ खूनी आंदोलन चलानेवाले माओवादी अपने नाम और सिद्धांत के अनुकूल चीन से हथियार तथा शाही सेना को पछाड़ने वाली छापामार ट्रेनिंग भी लेते थे । नेपाल में खूनखराबे के लिए राजशाही और माओवादी दोनों ही भारत पर तोहमत लगाते थे । आज भी वही हाल है । हथियार चीन का, माओवादी हमले का निशाना भारत भी था । क्योंकि भारत पर राजशाही को संरक्षण देने का आरोप था । लेकिन चीन पर कभी भी उकसावे का आरोप नेपाल में सुनने को नहीं मिला । 2002 में प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने उस समय माओवादियों से निबटने के लिए भारत से हथियार मांगा, जब वे भारत में छिपकर रह रहे थे । उसी वर्ष फरवरी में नेपाल नरेश स्वयं चीन गए । 1996 में हथियार मांगने चीन पाकिस्तान जानेवाले पहले प्रधानमंत्री थे, शेर बहादुर देउबा । 1999 में वाजपेयी शासनकाल में ही नेपाल के त्रिभुवन हवाई अड्डे पर भारतीय विमान का अपहरण हुआ था ।
नेपाल में भारतीय मूल के मधेसियों को अन्य नेपाली नागरिकों की तरह अधिकार देना कोई पार्टी नहीं चाहती । माओवादी आंदोलन की उपज पुष्पकमल दहल उर्फ प्रचंड राजनीतिक उथल-पुथल के माहौल में ही दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत आए मधेसियों को मोहरा बनाकर हथियार सौदा करने चीन गए ।
पड़ोसी देशों के राजनीतिक उलटफेर में चीन की तरह भारत की कभी-भी सीधी सैनिक भूमिका नहीं रही । 1971 की बांग्लादेश लड़ाई को सैनिक हस्तक्षेप नहीं कहा जा सकता, वो मुक्ति संग्राम में सहयोग था । लेकिन चीन की फौजी नीति लगभग सभी देशों में अंदर तक है । म्यांमार की फौजी सरकार को मदद पहुंचाकर चीन ने वहां लोकतंत्र आंदोलन को कुचला । अमूमन वर्षों के संघर्ष के बाद नोबेल शांति पुरस्कार विजेता औंग सान सूकी की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) की सिर्फ सरकार बनी है । नियंत्रण सेना का है जो चीन के इशारे पर चलती है और सिर्फ चीन से ही हथियार खरीदती है । म्यांमार में लोकतंत्र बहाली का सबसे बड़ा समर्थक भारत चीन के मुकाबले दक्षिण पूर्व एसिया के मुहाने पर पीछे है ।
व्यापारिक और आर्थिक कारोबार भी जितना चीन का पसरा हुआ है, कि उससे प्रतिस्पर्द्धा भारत के लिए कठिन है । सबसे विशाल व्यापारिक अड्डा चीन ने श्रीलंका में स्थापित कर रखा है । हथियारों के मामले में भी श्रीलंका की चीन और पाकिस्तान से करीबी नेपाल से मिलती-जुलती है ।
श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना फरवरी, 2015 में भारत आए । राष्ट्रपति बनने के बाद उनका पहला विदेश दौरा था । क्योंकि सिरिसेना ने चुनाव प्रचार अभियान में अपने प्रतिद्वंदी महिंदा राजपक्षे की चीन से बढ़ी नजदीकी को मुद्दा बनाया । सितंबर, 2014 में भारत की यात्रा पर आए चीन के राष्ट्रपति शी जिन्पिंग भारत से निकलकर श्रीलंका गए और वहां विशाल मेगा मेरिटाईम सिल्क रोड प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया । 1.34 अरब डॉलर का वो प्रोजेक्ट श्रीलंका के हाई सिक्योरिटी जोन इलाके में प्राइम लोकेशन पर स्थित है । अत्याधुनिक सुरक्षा और सुविधाओं से युक्त वह पोर्ट सिटी आज पूरी तरह तैयार होकर चीनी निवेशकों की दक्षिण पूर्व और दक्षिण एसिया के रास्ते प्राचीन मेरिटाईम सिल्क प्रोजेक्ट का मार्ग प्रशस्त कर चुका है । सुरक्षा के लिए चीनी सुरक्षाकर्मियों के रूप में फौज तैनात रहते हैं, जो भारतीय समुद्री मुहाने पर चौकसी रखते हैं । इस प्रोजेक्ट पर भारत की भी नजर है । भारत को आश्वस्त कर सिरिसेना चीन को खुश करने में जुट गए ।
2009 में श्रीलंका सरकार ने लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम (लिट्टे) सफाया अभियान में भारत से हथियार मांगकर पसोपेश में डाल दिया । महिंदा राजपक्षे जानते थे कि तमिलनाडु के लोगों की भावनाओं का ख्याल करके भारत सरकार हथियार नहीं देगी । इसलिए चीन सरकार से सीधे और पाकिस्तान के रास्ते चीनी हथियार लेने के बाद भारत सरकार से कहा कि लिट्टे से निबटने के लिए हथियार दे, वर्ना चीन से हथियार लेने को वे बाध्य होंगे ।
चीन के कारण पड़ोसी देशों से खिचखिच का भारत के अंदर भी असर पड़ता है । लिट्टे के खिलाफ युद्ध के दौरान श्रीलंका को चीन की गिरफ्त में जाने से रोकने के लिए भारत सरकार ने हल्के-फुल्के हथियार दिए । तमिलनाडु में इसका जख्म आज तक नहीं भरा है, जहां लिट्टे के प्रति हमदर्दी है ।
भारत की अगुवाई में दक्षिण एसिया क्षेत्रीय सहयोग सम्मेलन (सार्क) के संस्थापकों में है, बांग्लादेश । भारत के साथ संबंधों में सीमावर्ती पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों के विद्रोही गुटों को बांग्लादेश, म्यांमार, पाकिस्तान के जरिए मिलनेवाली छापामार ट्रेनिंग तथा हथियार भी उसमें शामिल है । नगा विद्रोहियों ने चीन में रहकर ट्रेनिंग ली हुई है । 60 वर्ष पुराना यह सिलसिला उल्फा और मणिपुर के दर्जन भर विद्रोही गुटों तक बरकरार है ।
नदी जल बहाव में ब्रहमपुत्र से तीस्ता तक चीन की लहरें प्रदूषित करती हैं । हाल में असम में हुए ब्रहमपुत्र महोत्सव के दौरान चीनी अतिक्रमण चर्चा में आया ।
सिक्किम से निकलनेवाली तीस्ता नदी उत्तरी बंगाल होते हुए बांग्लादेश में घुसती है और फिर ब्रहमपुत्र में मिलती है । तीस्ता नदी जल बंटवारे को लेकर भारत बांग्लादेश विवाद में पश्चिम बंगाल प्रमुख फैक्टर है । मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (दीदी) राज्य के हित की अनदेखी को मुद्दा बनायी हुई हैं, जिसके चलते शेख हसीना के ताजा दौरे में भी तीस्ता पर बात नहीं बनी । 2011 में उसी की वजह से ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ ढाका जाने का कार्यक्रम अंतिम समय में रद्द कर दिया । मार्च, 2015 में दीदी स्वयं ढाका गयीं, फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गयीं, मगर झगड़ा सलटा नहीं ।