यह लेख एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने की संभावना पर केंद्रित है, जिसे चुनाव आयोग के लिए एक बड़ी चुनौती बताया गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत ने स्पष्ट किया है कि संवैधानिक संशोधन और पर्याप्त वीवीपीएटी मशीनों के बिना यह संभव नहीं है। भाजपा सरकार इस पर दबाव बना रही है, जबकि विपक्षी दल इसे असंवैधानिक और अव्यावहारिक मानते हैं, और ईवीएम छेड़छाड़ के मुद्दे पर भी चिंता व्यक्त कर रहे हैं।
यह लेख अण्णा हजारे के हालिया अनशन और लोकपाल की नियुक्ति में सरकार की देरी का विश्लेषण करता है। लेखक का तर्क है कि 2011 के आंदोलन के विपरीत, लोकपाल अब जनता या राजनेताओं के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं रह गया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद, लोकपाल चयन समिति में रिक्तियों और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण प्रक्रिया अटकी हुई है।
यह लेख नरेंद्र मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल में लोकपाल के गठन में देरी पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खर्गे ने 'विशेष आमंत्रित' के रूप में लोकपाल चयन समिति की बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया, और सरकार ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में लोकपाल नियुक्ति में बाधा बताया। लेख सरकार पर जानबूझकर लोकपाल गठन को टालने का आरोप लगाता है, जबकि सुप्रीम कोर्ट लगातार इस मामले में जवाब मांग रहा है।
यह लेख लोकपाल के गठन में केंद्र सरकार की अनिच्छा और देरी पर केंद्रित है, जबकि लोकपाल एक्ट 2013 में पारित हो चुका था। सुप्रीम कोर्ट लगातार सरकार पर लोकपाल नियुक्त करने का दबाव बना रहा है, लेकिन सरकार प्रक्रियात्मक अड़चनों का हवाला देकर टालमटोल कर रही है। विशेष रूप से लोकपाल चयन समिति में विपक्ष के नेता और प्रमुख न्यायविद की नियुक्ति को लेकर विवाद है।
यह लेख लोकपाल के गठन में हो रही देरी पर केंद्रित है, जिसमें कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खर्गे द्वारा लोकपाल चयन समिति की बैठकों का बहिष्कार और सुप्रीम कोर्ट के दबाव के बावजूद सरकार की निष्क्रियता को उजागर किया गया है। लेखक तर्क देता है कि लोकपाल के गठन को जानबूझकर टाला जा रहा है, और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में हालिया संशोधन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को कमजोर कर रहे हैं। अण्णा हजारे के आंदोलन का भी उल्लेख है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नगालैंड के 6 पूर्वी जिलों को मिलाकर अलग आदिवासी राज्य की मांग पर चुनाव के बाद विचार करने का आश्वासन दिया है। यह लेख नगा अलगाववाद, शांति प्रक्रिया की ठप स्थिति, और भाजपा नेताओं द्वारा चुनावी वादों में विकास पर जोर देने के बावजूद अलग राज्य की मांग पर चुप्पी साधने का विश्लेषण करता है। इसमें AFSPA के विरोध और नगालैंड में महिला प्रतिनिधित्व की कमी जैसे मुद्दों पर भी प्रकाश डाला गया है।