यह लेख कांग्रेस और सीपीएम के बीच बेमेल चुनावी गठजोड़ की जटिल गतिशीलता का विश्लेषण करता है। केरल में दोनों दल कट्टर प्रतिद्वंद्वी हैं, जबकि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में वे भाजपा और तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों का मुकाबला करने के लिए गठबंधन करते हैं। लेख कांग्रेस के भीतर के. सुधाकरन द्वारा शशि थरूर और के.वी. थॉमस को सीपीएम के सम्मेलन में शामिल होने से रोकने के विवाद और इस गठजोड़ के ऐतिहासिक संदर्भ पर प्रकाश डालता है।
यह लेख वाम दलों, विशेषकर सीपीएम के घटते जनाधार और कांग्रेस के साथ उनके 'इंडिया' गठबंधन में शामिल होने से उत्पन्न चुनौतियों का विश्लेषण करता है। सीपीएम अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने और केरल व पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कांग्रेस के साथ चुनावी रणनीतियों के टकराव को लेकर चिंतित है। लेख में कांग्रेस की आंतरिक संगठनात्मक कमजोरियों और विभिन्न राज्यों में उसके चुनावी प्रदर्शन पर भी प्रकाश डाला गया है।
यह लेख कोरोना लॉकडाउन के दौरान भारत में हुई तीव्र राजनीतिक उठापटक और जोड़-तोड़ की राजनीति का विश्लेषण करता है। इसमें मध्य प्रदेश, राजस्थान और मणिपुर में सरकारों को बचाने या गिराने के प्रयासों, विधायकों की खरीद-फरोख्त और अदालती हस्तक्षेपों पर प्रकाश डाला गया है। लेखक स्वास्थ्यकर्मियों की उपेक्षा और कोरोना बचाव प्रयासों की तुलना में राजनीतिक गतिविधियों की अधिक मुस्तैदी पर भी टिप्पणी करता है।
यह लेख पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले चुनाव आयोग की भूमिका पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की आपत्तियों का विश्लेषण करता है। माकपा ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग तृणमूल कांग्रेस के इशारे पर काम कर रहा है और उन क्षेत्रों को निशाना बना रहा है जहां वाम मोर्चा का वोट अधिक है। लेख में चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वायत्तता और राजनीतिक दलों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए उस पर सवाल उठाने की प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला गया है, साथ ही चुनावी सुधारों और राजनीतिक अपराधों से संबंधित चुनौतियों पर भी चर्चा की गई है।
पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने चुनाव आयोग पर तृणमूल कांग्रेस के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया है। माकपा का कहना है कि आयोग वाम मोर्चा के गढ़ों को निशाना बना रहा है और उसके शीर्ष अधिकारियों के बार-बार दौरे दलीय राजनीति से प्रेरित हैं। लेख में अन्य राज्यों के उदाहरणों के साथ माकपा के आरोपों की पड़ताल की गई है और चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वायत्तता पर जोर दिया गया है।
दार्जीलिंग और डूआर्स में अलग गोरखालैंड राज्य के लिए अनिश्चितकालीन बंद जारी है, जिसका नेतृत्व गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) कर रहा है। लेख केंद्र की भाजपा और राज्य की तृणमूल कांग्रेस सरकारों की राजनीतिक अवसरवादिता पर प्रकाश डालता है, जो चुनावी लाभ के लिए गोरखालैंड के वादे करती हैं लेकिन आंदोलन को हल करने के लिए बातचीत से बचती हैं। यह आंदोलन की गंभीरता और नेताओं की चुप्पी के कारण बढ़ती हिंसा को दर्शाता है।
यह लेख गोरखालैंड संकट और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (दीदी) द्वारा इसे संभालने की रणनीति पर केंद्रित है। लेखक का तर्क है कि दीदी ने दार्जीलिंग में नेपाली भाषा पर बंगला थोपने के फैसले के बाद भड़की हिंसा को अपनी कूटनीतिक चालों से शांत किया। उन्होंने जीजेएम नेताओं को अलग-थलग कर दिया और वार्ता के माध्यम से आंदोलन को कमजोर किया, जिससे यह साबित हुआ कि गोरखालैंड समस्या का समाधान केवल उन्हीं के पास है।