यह लेख सीबीआई, आरबीआई और लोकपाल जैसे प्रमुख भारतीय संस्थानों के संवैधानिक और कानूनी आधार पर सवाल उठाता है। यह बताता है कि सीबीआई का गठन एक कार्यकारी आदेश के तहत हुआ था, जिसे गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया था, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी। लेख इन संस्थानों के राजनीतिक दुरुपयोग और उनकी स्वायत्तता की कमी पर प्रकाश डालता है, जिससे आम जनता में भ्रम पैदा होता है।
यह लेख 'एक देश एक चुनाव' के प्रस्ताव को लागू करने में चुनाव आयोग के सामने आने वाली दुविधाओं पर प्रकाश डालता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस विचार के प्रबल समर्थक हैं, लेकिन आयोग को विधायी और संवैधानिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जिन्हें राजनीतिक दल संबोधित करने को तैयार नहीं हैं। लेख हरियाणा और महाराष्ट्र के साथ झारखंड और दिल्ली के चुनावों को एक साथ न करा पाने, जम्मू-कश्मीर में चुनाव न होने और संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता जैसे उदाहरणों के माध्यम से इन चुनौतियों का विश्लेषण करता है।
धारा-370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद फिर से पैर पसार रहा है, जिसमें पुंछ में सेना के जवानों पर हमले और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है। इससे कश्मीरी पंडितों और प्रवासी मजदूरों का पलायन फिर शुरू हो गया है, जिससे क्षेत्र में असुरक्षा और दहशत का माहौल है। लेख अफगानिस्तान में तालिबान के उदय को इस नई आतंकी लहर से जोड़ता है और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता है।
यह लेख जम्मू-कश्मीर में राज्य का दर्जा बहाल करने की आवश्यकता पर केंद्रित है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में इस मांग को प्रमुखता से उठाया है और केंद्र सरकार से इस पर कार्रवाई करने का आग्रह किया है, जबकि धारा 370 की वापसी की बात से बचते रहे हैं। लेख में भाजपा के साथ नेशनल कॉन्फ्रेंस के संभावित गठजोड़ की अटकलों, केंद्र सरकार के दावों और क्षेत्रीय दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप पर भी चर्चा की गई है।
यह लेख जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के एक साल बाद की स्थिति का विश्लेषण करता है। इसमें उपराज्यपाल गिरीश चंद्र मुर्मू के इस्तीफे, राजनीतिक नेताओं की नजरबंदी, संचार पाबंदियों और सुरक्षा चिंताओं पर प्रकाश डाला गया है। लेख में बताया गया है कि कैसे इन परिवर्तनों ने क्षेत्र की राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों को प्रभावित किया है, और सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामलों का भी जिक्र है।
यह लेख भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान की भूमिका और वर्तमान में धारा 370 हटाने के विरोध पर एक आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। लेखक का तर्क है कि कम्युनिस्ट पार्टियों ने हमेशा राष्ट्रीय हितों के बजाय सोवियत संघ और चीन के एजेंडे का पालन किया है, जिसके कारण उनका राष्ट्रीय जनाधार कम हुआ है। लेख में सीपीआई और सीपीएम के राष्ट्रीय दल के दर्जे के खतरे और उनके भारतीय जनमानस को समझने में विफल रहने पर भी प्रकाश डाला गया है।
यह लेख असम में एनआरसी के प्रकाशन के बाद पश्चिम बंगाल में नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर चल रहे राजनीतिक घमासान पर केंद्रित है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बंगाल में एनआरसी लागू करने का कड़ा विरोध किया है, जबकि भाजपा इसे देशव्यापी स्तर पर लागू करने की वकालत कर रही है। लेख में पूर्वोत्तर राज्यों, विशेषकर असम में एनआरसी से उत्पन्न असंतोष और गोरखा समुदाय पर इसके प्रभाव पर भी प्रकाश डाला गया है, साथ ही विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं का भी उल्लेख है।