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टेबुल की फीस

जमीन जायदाद मकान की रजिस्ट्री वाले ऑफिस से साफ-सुथरी छवि लेकर रिटायर हुए लाला बद्री नारायण को उसी टेबुल से साबका पड़ गया, जिस पर वे कभी खुद बैठा करते थे । हमउम्र पड़ोसी टीकमचंद को साथ लेकर उन्होंने कई चक्कर लगाये । रोज-रोज ‘कल दस बजे आइये’ सुनते-सुनते लाला का धैर्य जबाब दे गया - आखिर आप मोटी फाईल बढ़ा क्यों नहीं रहे हैं, वो कल कब आएगा जब आप उस फाईल पर से धूल झाड़ने का समय निकाल पाएंगे?

टेबुल के बड़ा बाबू ने उनकी ओर आंख उठाकर देखे बिना ही जवाब दिया - ‘आप बुजुर्ग और अनुभवी हैं, तब भी ऐसे पूछ रहे हैं । मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि टेबुल से फाईल कैसे बढ़ती है, उसका तौर-तरीका आपको बाहर मंगलू समोसेवाले के यहां लेजाकर समझाना पड़ेगा । ‘कैसे बढ़ती है, आप हमें समझाने चले हैं, पता है, इसी टेबुल से दो साल पहले मैं रिटायर हुआ हूं, आप नया राज्य बनने के बाद तबादला लेकर आए हैं, इसलिए आपको जानकारी नहीं है । ज्यादा समझदारी मेरे को मत दिखाएं’ - लाला आप से बाहर हो गये ।

लेकिन बाबू को कोई फर्क नहीं पड़ा । उसने पहले की तरह इत्मीनान से चश्मा आंख से थोड़ा नीचे लाकर कहा - ‘फिर तो आपको और भी अच्छी तरह पता होगा कि रजिस्ट्री ऑफिस में काम कैसे होता है’ ।

लाला गुस्से में थूक निगलकर उबल पड़े - ‘लाइए दीजिये मेरी फाईल, मैं दूसरे टेबुल से बढ़वाउंगा । पड़ोसी टीकमचंद ने भी उनकी हां में हां मिलायी - ‘हर जगह थोड़े ही अंधेड़ है । बाबू ने सहर्ष फाईल सौंपते हुए ठहाके लगाए - ‘लाला जी किसी भी टेबुल पर जाओगे बिना फीस के बात नहीं बनेगी’ । यह बाबू नहीं टेबुल लेता है, जो बैठेगा, वो लेगा । बिना फीस के ये सिलसिला चलता रहेगा और वही होता रहेगा जो आपके सामने हो रहा है । चाहो तो कई दिनों का कल आज और अभी में बदल सकता है, आपके हाथ में है, सोच लो । अपने टाईम में आपने ‘कमाई’ नहीं की होगी यह तो मानी नहीं जा सकती और आज मेरी ‘रोजी’ मारने पर तुले हो । याद होगा कि रजिस्ट्रार के दस्तखत और स्टैम्प वाले टेबुल की अलग-अलग फीस होती है । फाईल आप ले चुके हैं, अब आप जानो आपका काम जाने ।

लाला बाबू तो घूटते रहे और वो ‘समझाता’ रहा - ‘टेबुल की फीस की रसीद नहीं होती, सिर्फ रजिस्ट्री की होती है, जिसके लिये पहले ही भुगतान करना होता है, आप भूले नहीं होंगे, जो जमा हुए बगैर ‘पक्की’ रजिस्ट्री की गारंटी नहीं । इसे लाल बत्ती पार करनेवालों और बिना हेमलेट के दुपहिया वाहनचालकों के खिलाफ ट्रैफिक पुलिस द्वारा काटी जानेवाली पर्ची से जोड़कर देखो न । एक रेड लाईट से बचकर भागने से काम नहीं चलता । छुटकारा तभी मिलेगा जब भुगतान होगा - चाहे पहलेवाली पर कहो या लास्टवाली पर............

बबुआनी

नेपाल का जनकपुर धाम । कपिलदेवा को यहां बेलदारी करते हुए कुछ ही दिन गुजरे हैं । भाड़े के ट्रक पर बोरा लोड-अनलोड करता है । कपिलदेवा बिहार के दरभंगा जिले का रहनेवाला है । उसका गांव वैसे इलाके से आता है, जहां हर साल बाढ़ से धान, मूंग, मकई की फसल बर्बाद हो जाती है । दहनाल वाली जमीन में कई महीनों तक पानी जमा रहता है । वासडीह के अलावे जमीन नहीं, रैयती पगार और बंटाईदारी से गुजर बसर होता है । परिवार का खाना खर्चा नहीं निकलता । साल भर दिहाड़ी का काम नहीं मिलता । जमीनवालों के घर में भी डंड पेलने की नौबत रहती है । बाहर नौकरी करनेवालों की कमाई से खेती चलती है । कम जोत वाले बबुआनों को भी पेट के लिए गांव छोड़ना पड़ा है । मगर गांव लौटते हैं तो बबुआनी नहीं छोड़ते । हर बात में मां-बहन शुरू हो जाते हैं - ‘रे बहान्चो, भरूबा, पेट में दाना जा रहा है तो अपनी औकात भूल गया रे, तेरा बाप-दाता इस ड्योढ़ी में बेगारी खट के जिंदा रहा है’......

कपिलदेवा गांव कम ही जाता है । बूढ़े मां-बाप के नाम मनीआर्डर भेज देता है, ताकि पेट के लिए गाली नहीं सुननी पड़े । मां-बहन, अपनी घरवाली तक को कपिलदेवा ने गाली-बेइज्जती सुनते हुए दिहाड़ी मजदूरी करते देखा है ।

कपिलदेवा के टोले से सटे बाभन गांव के एक युवक पढ़-लिखे सनक गए, हो गए बबाजी । गांव के लोग ‘झूलन’ कहकर मजाक उड़ाने लगे । युवक आ रहे थे जनकपुर धाम, तो कपिलदेवा भी उनके साथ लगकर आ गया । बबाजी का जनकपुर में विशाल आश्रम है ।

कपिलदेवा अपने गांव-परिवार की भुखमरी हालत के कारण बहुत परेशान रहता था । एक दिन लाईन होटल में चाय पीते वक्त अचानक कपिलदेवा की नजर एक बेलदार पर अटकी, थोड़ी राहत मिली । यह लाईन होटल बिहारी का है और उस आसपास के लगभग सभी बेलदार यहीं चाय-बिस्कुट खाते हैं । कपिलदेवा से नजर मिलते ही वो बेलदार चाय खतम किए बिना ही जल्दी से उठकर चल दिया । कपिलदेवा ने एक नजर में पहचान लिया था, ये बाभन गांव के बबुआन राधेश्याम थे । यह समझते देर नहीं लगी कि राधेश्याम बाबू को भी जमीन-जाल की बदतर हालत के कारण यहां आना पड़ा है । कपिलदेवा को यह जानने की उत्सुकता हुई कि देखें ‘राधेश्याम बाबू’ कहां बेलदारी करते हैं । मामूली पढ़े-लिखे थे, गांव से बाहर निकलकर और कौन काम मिलेगा ।

कपिलदेवा उनके पीछे हो लेता है और थोड़ी दूरी बनाए रखकर चलता जाता है । कपिलदेवा अच्छी तरह भांप गया था कि अपनी झेंप और शर्म छिपाने के लिए ‘राधेश्याम बाबू’ तेजी से उठकर भागे हैं ।

कपिलदेवा देखता क्या है कि ‘राधेश्याम बाबू’ उसी ट्रांसपोर्ट मालिक के ट्रक से बोरा उतार रहे हैं । मैनेजर को अनलोड करने की जल्दी थी, दूसरे भाड़ेवाले का बार-बार फोन आ रहा था । अब कपिलेदवा और राधेश्याम बाबू दोनों पीठ पर बोरा लादे साथ-साथ आगे-पीछे चल रह हैं । कपिलदेवा पीछे है । बोरा ‘हह’ करके गोदाम में पटकते ही ‘राधेश्याम बाबू’ की आंखें कपिलदेवा से मिलती है । भागते नहीं बन रहा है । पसीने से तरबतर ‘बबुआन साहब’ की ओर कपिलदेवा अपनी गमछी मुंह पोछने के लिए बढ़ा देता है । माथे से पसीना उनके मुंह में जा रहा था, वो तो पोंछ लिया, लेकिन अंदर का पित्त न उगलते बन रहा है, न निगलते ।

कपिलदेवा का उन्हें सहज करने का प्रयास ‘अरे अब परदेस में तो जो गति मोरी सो गति तोरी, रामा हो रामा, आइए चाह खाते हैं । ‘आप तो ठीक से चाह पीए भी नहीं’ -........ रैयत कपिलदेवा का दुराग्रह उनके माथे पर खून बहा देता है, पसीना तो बह चुका था । कपिलदेवा को उनकी बबुआनी की ऐसी की तैसी होते देख संतोष हो रहा है। अपनी आंखों के सामने मां-बहन की होते देख कपिलदेवा के नथूने फूल उठते थे, पीठ पर लात पड़ते समय बाहें फड़कने लगती थी ।

एक लतियानेवाले ‘मालिक’ बेलदार की पीठ पर लतखोरों का बोरा लदे देखने के बाद कपिलदेवा उस दिन बबाजी का आश्रम जाता है । कपिलदेवा के बाप कबीरपंथी हैं । उन्हीं की तरह गाते एक सारंगिया जा रहा है - ‘आए हैं सो जाएंगे राजा रंक फकीर............’ सबका मालिक एक............ ।

‘राधेश्याम बाबू’ को उस दिन के बाद जनकपुर में कपिलदेवा ने दुबारा नहीं देखा - लाईन होटल वाले ढाबा में भी नहीं, जहां उनका भगिना थाली-बर्तन धोता है । चाय का पैसा नहीं लगता था । चाय पीने के समय भी कपिलदेवा से वे साथी बेलदार की तरह बात नहीं कर पा रहे थे । जली रस्सी की ऐंठन वाली बबुआनी छांटना धोसड़ गया है । फिर धनकटनी के समय कपिलदेवा गांव लौटा है । कपिलदेवा की मुस्कान के जवाब में राधेश्याम बाबू की बबुआनी खुखुआकर खिसियानी आंखों से घूर रही है । नेपाल की बेलदारी ‘भेंट’ उन्हें अपने गांव में पहले की तरह इतना भी कहने नहीं दे रही है कि धान काटनेवाली जनानियों को सुबह भेजना है ।