ग्यारह जने
छठुआ की बेटी की लाश आंगन में पड़ी है । उसके सारे गोतिए लाश घेरकर बैठे हैं । उन्हें इस बात की चिंता है कि बेटी की मजदूरी से पेट पालनेवाला छठुआ ग्यारह जनों को कहां से खिलाएगा । लाश उसी चीथड़े से ढंकी है, जिसमें सवेरे बेटी मरी पायी गयी । कहते हैं, सांप काट लिया । जिन गोतियों ने छठुआ की बीबी-बच्चे को एक शाम खाना देने लायक नहीं समझा, उन्होंने छठुआ को कफन के पैसे और श्राद्ध-भोज के चावल-दाल के लिए उसे गांव के महाजन रघुनाथ बाबू के यहां भेजा हुआ है । बड़े दयालू हैं, उन्होंने ही छठुआ की बीबी के श्राद्ध में वासडीह का अंगूठा निशान लेकर मदद की थी । छठुआ की बीबी उन्हीं के यहां बर्तन मांजते हलवाहों के लिए रोटी सेंकते काली खांसी से मरी ।
रघुनाथ बाबू शायद ड्योढ़ी पर नहीं हैं, इसलिए छठुआ के लौटने में देर हो रही है और इधर उसके आंगन में टीपाटीपी चल रही है - लाश को जलाना क्या जरूरी है, छठुआ लकड़ी कहां से लाएगा । मैं तो अपना जामुन नहीं काटने दूंगा। मेरे को बरसात से पहले घर बनाना है ।
दूसरा टीपता है - क्यों न लाश नदी में बहा दिया जाए, लेकिन ग्यारह जनों को तो खिलाना ही होगा?
इस पर सहमति है - हां हां, इसके बिना तो श्राद्ध ही अशुभ होगा । महापात्र बोल गये हैं कि ग्यारह जनों के साथ प्रेत खाता है, जिसकी नाराजगी का कोपभाजन पूरे गांव को बनना होगा और प्रेतछाया से महाअमंगल हो सकता है ।
महापात्र समझाते हैं - “भैया, ग्यारह जने छठुआ की गरीबी और लाचारी को देखते हुए कम-से-कम रखा गया है । वैसे तो पूरे गांव को खिलाना होता है । हमारा भोजन अलग है ।”
तबतक छठुआ आ जाता है । महाजन बाबू ने कहा जरूर ‘भरूबा, तुमको कुछ देना तो पानी में बहाना है । फिर भी श्राद्ध तो करा ही लूंगा, गांव की नाक नहीं कटने दूंगा और ग्यारह जनों को खिलाने लायक दाल-चावल के साथ-साथ लाश जलाने के लिये लकड़ी भी दे दी । उनसे उपकृत आंगन को घेरे गोतियों के उद्गार - ‘चाहे जो कह लो, गरीबों के सहारा हैं रघुनाथ बाबू, आखिर खानदानी महाजन ठहरे ।’
श्मशान घाट से लौटने तक छठुआ का वासडीह महाजन बाबू की जोती जमीन में तब्दील हो चुका और छठुआ का छौनी-छप्पर खेत में मिलाने का काम निपटानेवाले वही ग्यारह जने थे, जिन्होंने श्राद्ध का भोज खाया ।
महाजन बाबू की भैंस की पीठ पर लेटा छठुआ खुश है, जिन्होंने उसे चरवाहा रख लिया ताकि कर्ज चुका सके । पगार तबतक कटती रहेगी, जबतक एक ही संतान के श्राद्ध-भोज के लिए लिया गया बयाना का ब्याज सध नहीं जाए । महाजनी व्यवस्था के मुताबिक बेसहारा छठुआ के परिवार में अब कोई रोवनहारा भी नहीं बचा, जो मूलधन चुका सके । इसलिए उसकी पगार मृत्युपर्यन्त ड्योढ़ी में जमा होती रहेगी । तबतक उसे खाना, कपड़ा मिलता रहेगा ।