शशिधर खान

राज्यों के पुलिस महानिदेशकों के वार्षिक सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब उत्तर पूर्व की कानून और व्यवस्था का जायजा ले रहे थे, उस समय उल्फा यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम चेयरमैन अरविंद राजखोवा नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड; खोले कोन्यक गुट के साथ वर्षों पुरानी मैत्री को याद करते हुए 'संप्रभुता' की लड़ाई मिलकर लड़ने की दुहाई दे रहे थे, ताकि बात संघर्षविराम से आगे बढ़े।

उसी समय नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड ने इस चेतावनी के साथ भूख हड़ताल शुरू कर दी कि अगर सरकार ने 'ठोस' बातचीत में टालमटोल रवैया नहीं छोड़ा तो वे फिर से हिंसा का रास्ता अपनाने को बाध्य होंगे।

'स्वतंत्र संप्रभु' नगालिम 'राष्ट्र'; राज्य नहीं की मांग को लेकर हिंसक आंदोलन छेड़नेवाले पूर्वोत्तर के सबसे पुराने विद्रोही गुट नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड; एनएससीएन के आइसाक-मुइवा गुट के साथ केन्द्र का संघर्षविराम समझौता 1997 से चल रहा है। इसी के प्रतिद्वंद्वी खपलांग के नेतृत्ववाले गुट से संघर्षविराम 2001 में हुआ, जिसे आज तक वार्ता के लिये नहीं बुलाया गया। दोनों गुटों की मांग एक जैसी है। आइसाक मुइवा गुट वाले एनएससीएन के साथ गत जुलाई के अंत में जब 67वें दौर की वार्ता केन्द्रीय गृह मंत्रालय से हो रही थी, उस वक्त दूसरे गुट में वार्ता के ही मुद्दे पर नेतृत्व परिवर्तन हो रहा था। खपलांग के सहयोगियों ने उन्हें यह कहकर 'अपदस्थ' कर दिया कि 10 साल से चल रहे संघर्षविराम से कुछ नहीं निकला। खपलांग की जगह 'कर्नल' खोले कोन्यक ने अपने को चेयरमैन घोषित कर दिया और किटोवी झिमोमी को भूमिगत नगालिम संघीय सरकार के 'स्वयंभू प्रधानमंत्री' के पद पर बरकरार रखा। मणिपुर - म्यांमार सीमा पर स्थित अपने अड्डे से अल्टीमेटम जारी करके 'कर्नल' खोले ने केन्द्र सरकार को चेतावनी दी कि अगर उन्हें वार्ता के लिए नहीं बुलाया गया तो संघर्षविराम रद्द कर देंगे। नए स्वयंभू 'राष्ट्रपति' व 'चेयरमैन' खोले ने अपने को सर्वेसर्वा तथा वार्ता के लिये अधिकृत घोषित कर दिया। मुइवा गुट में एन मुइवा अपने संगठन के महासचिव और 'स्वयंभू प्रधानमंत्री' हैं। आइसाक चिशी चेयरमैन और 'स्वयंभू राष्ट्रपति' हैं। इनकी भी अलग भूमिगत 'संघीय सरकार' है।

असम के विद्रोही गुट उल्फा का हिंसक आंदोलन भी 32 साल पहले 'स्वतंत्र संप्रभु असोम' को लेकर शुरू हुआ। बांग्लादेश की मदद से गिरफ्तारी और फिर जमानत पर रिहा होने के बाद उल्फा चेयरमैन अरविंद राजखोवा का भी इसी महीने के पहले सप्ताह में केन्द्र के साथ संघर्षविराम समझौता हुआ है। उन्होंने संघर्षविराम के तुरंत बाद गुवाहाटी लौटकर चेतावनी दे दी कि वे लंबे समय तक चलनेवाली वार्ताओं के चक्कर में नहीं पड़ेंगे। उल्फा के स्वयंभू 'चीफ सैनिक कमांडर' परेश बरुआ पुलिस गिरफ्त से बाहर हैं और उन्होंने इस आधार पर विरोध किया है कि 'संप्रभुता' वार्ता के बिना संघर्षविराम भी उल्फा 'संविधान' के खिलाफ है। उल्फा चेयरमैन अपने पुराने सहयोगी एनएससीएन के खोले गुट से नगालैंड सीमा पर स्थित संघर्षविराम कैम्प में यह बताने के लिये मिलने गए कि जिस तरह एकजुटता के बिना हिंसक आंदोलन नहीं चलाया जा सकता, ठीक उसी तरह आपसी फूट से संघर्षविराम समझौता भी 'कारगर' साबित नहीं होगा। उन्होंने नगाओं के दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों में दोस्ती और उल्फा के साथ मिलकर सम्मानजनक स्थायी समझौते के लिये प्रयास करने पर बल दिया।

16 सितंबर को असम-नगालैंड सीमा पर यह बैठक हो रही थी, जिस दिन प्रधानमंत्री पुलिस महानिदेशकों के साथ मुख्य रूप से पूर्वोत्तर की कानून व व्यवस्था की समीक्षा कर रहे थे। गृहमंत्री पी. चिदंबरम और प्रधानमंत्री दोनों ने ही गोरखा समझौते के बाद उल्फा और बोडो संघर्षविराम का जिक्र करते हुए इसे शांति की दिशा में सार्थक कदम बताया।

अलग बोडो राज्य गठन की उम्मीद में इस संगठन के दो गुटों ने 1993 और 2003 में अलग-अलग संघर्षविराम समझौते किए, लेकिन अभी तक बात वहीं अटकी है। संगठन के 'सूचना प्रचार सचिव' एस. संजारंग के मुताबिक 45 वर्ष से चल रहे बोडो राज्य आंदोलन को राज्य सरकारों ने कमजोर करने की कोशिश की। इस गुट ने अनशन के साथ-साथ हिंसा की ओर लौटने की भी धमकी दी।

पूर्वोत्तर में सबसे ज्यादा अलगाववादी आंदोलन असम में चल रहे हैं। यहीं के आदिवासी गुट कोबरा मिलिशिया फोर्स के साथ भी 2003 में संघर्षविराम समझौता हुआ। कर्बी एंगलोंग और उत्तरी कछार आंदोलनकारियों से 1995 से समझौता चल रहा है, मगर बात संविधान की धारा 244 ए के अंतर्गत स्वायत्त राज्य की जगह छठी अनुसूची वाली परिषद से आगे नहीं बढ़ पा रही है। त्रिपुरा-बांग्लादेश व्यापारिक रेल संपर्क परियोजना के प्रति पूर्वोत्तर में कोई उत्साह नहीं है, जिसे रेलवे बोर्ड ने प्रधानमंत्री की ढाका यात्रा; 6-7 सितंबर से काफी पहले मंजूरी दे दी। उनके साथ गए असम के मुख्यमंत्री को अखिल असम छात्र संघ, भाजपा समेत सभी विपक्षी दलों के प्रबल विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ढाका के बाद तीन देशों की यात्रा से लौटने के दिन 17 सितंबर को मुख्यमंत्री का काले झंडे से स्वागत किया गया। विपक्षी दलों का आरोप है कि बांग्लादेश के साथ हुए सीमा समझौता में राज्य के हितों को दरकिनार कर 2000 बीघा से ज्यादा उपजाऊ जमीन बांग्लादेश को दे दी गयी।

—लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं