सैर और सुकून की धरोहर है लद्दाख पहाड़ी
लद्दाख पहाड़ी की नुब्रा घाटी के पानामिक गांव में उस मनोरम जगह पर खड़ा हूँ, जहां नुब्रा नदी शियोक नर से मिलती है । पानामिक गांव से होते हुए नारी नुब्रा नदी धीरे-धीरे बहती आती है । जबकि शियोक नर उफन रहा है । इसकी उछलती किल्लोल मचाती लहरें दोनों तरफ कंक्रीट पत्थरों से लदे तटों को थपेड़ों से अपना रास्ता बनाने के प्रयास में जुटी हैं ।
स्थानीय मान्यता के अनुसार नुब्रा नदी नारी है और शियोक नर पुरूष है । जब से नुब्रा नदी ने अपने बहाव का रास्ता बदल लिया है, शियोक बेचैन है । यह अपनी प्रिया से मिलने के लिए चट्टानों और बड़े.बड़े पत्थरों को तोड़ता हुआ दूर.दराज तक बस्तियों में पहुंच जाता है । टैक्सी ड्राइवर नुर्बू बताते हैं कि अभी हमलोग सुमूर गांव से निकलकर हुंडर होते हुए आगे बढ़ रहे हैं, ये इलाके नुब्रा घाटी के हिस्से हैं । इन गांवों में शियोक(पुरूष नर) उत्पात मचाता है । बरसात और जाड़े के महीनों में प्रायः शांत रहता है । लेह में सिंधु नदी से मिलने के बाद जंस्कार को साथ लेते हुए सभी छोटी.बड़ी नदियों का शियोक के साथ संगम होता है । कहते हैं, तुरतुक बॉर्डर पर ग्लेसियर वाटरफॉल के पास सियाचिन युद्ध स्मारक के लिए दुर्गा ब्रिज बनने के समय से शियोक नाराज है । शियोक समूचे लद्दाख को छूनेवाला नर है, अब इसका कुछ बस्तियों से तलाक हो गया है ।
१६.१७/०८/२०२२ को १८ए००० फीट की ऊंचाई से मैं अपनी आंखों और मस्तिष्क को सुकून दे रहा हूँ ।
यहाँ से थांग खालसार गांव नजर आ रहा है, जो भारत.पाक सीमा का अंतिम भारतीय गांव है । इस रास्ते में सैलानियों का तांता लगा है । तुरतुक बॉर्डर के त्याक्षी से निकलकर थांगए यलुन्खाए गाशी गांव से गुजरते हुए टैक्सी ड्राइवर नुर्बू ने एक संगीत बजा रखा है । चारों तरफ व्याप्त मनभावन शीतलता के बीच मन को शांति प्रदान करनेवाले इस संगीत के बारे में पता चलता है कि यह हब्बा खातुन के गीत हैं ।
समूचे जम्मू व कश्मीर की सबसे लोकप्रिय सूफी शायर सह लोकगायिका हब्बा खातुन जन.मन कण.कण में रची बसी हैं । कहते हैं, नदियों की कलकल हिलोरों और घाटियों में निरंतर बहनेवाली मस्त हवाओं की सांय.सांय में हब्बा खातुन की आवाज सुनाई देती है । हब्बा खातुन महलों का सुख त्यागकर इसी जगह कुटी बनाकर रहती थीं, जहां नदियों का मिलन होता है । उन्हें लद्दाख की मीराबाई कहा जाता है । किवदंती के अनुसार नुब्रा नदी ने हब्बा खातुन को कुटी समेत अपने आगोश में ले लिया । घाटियों में गूंजती हब्बा की आवाज से बेचैन रूहों ध अतृप्त आत्माओं को शांति मिलती है । जनश्रुति के अनुसार हब्बा खातुन एक खास किस्म के बने साज के साथ शायरी गाती थी, जिसमें से डमरू और सारंगी की जुगलबंदी निकलती थी ।
नुर्बू ने आकाशवाणी के लेह केंद्र से प्रसारित होती हब्बा खातुन की तन्मय करनेवाली पंक्तियां सुनायी.
ने प्रसारित होती हब्बा खातुन की तन्मय करनेवाली पक्तियां सुनायी. रूह कभी भटकती नहीं इन्सान का भ्रमजाल है भटकाव मिट्टी किसी को दफन नहीं करती उसमें जुगनू है नर्गिस का नूर पहाड़ए नदियांए घाटीए पेड़ सब तो टिके हैं इसी जमीं पर जमीन्दोज होना जन्नत को पाने जैसा है रिश्ते बिरादर चले जाते हैं फातिहा पढ़कर रूह कभी कहीं नहीं जाती नदियों के मिलन की यह लोक कथा अन्यत्र भी वैसी पहाड़ियों में सुनने को मिली है,एजहां बौद्ध समुदाय के लोगों की आबादी ज्यादा है । २०२४ में भुटान पर्यटन के दौरान भी नदियों के प्रेम.मिलन और बिछुड़न से धारा में विचित्र बदलाव की कहानी मैंने सुनी । पड़ोसी देश भुटान को छूनेवाली कुछ नदियों का प्रवेश बागडोगराए दार्जीलिंग और बांग्लादेश तक है । भुटान में भी जब पुरुष नर प्रिया नदी से बिछुड़ता है तो प्रलय मचाता है । चीन और भुटान की सीमा से लगा भारतीय पहाड़ी राज्य सिक्किम में यदा.कदा आनेवाली विनाशकारी बाढ़ के विषय में इसी से मिलती. जुलती दंतकथा प्रचलित है । सिक्किम में बौद्धों की आबादी ज्यादा है, लेकिन वहां की कहानी लद्दाख और भुटान से उल्टी है । सिक्किम में भारत.चीन व्यापारिक क्षेत्र नाथू.ला के निकट से गुजरनेवाली और पर्यटन स्थलों की रौनक बढ़ानेवाली धाराओं में पुरुष नर को जब अपनी प्रिया नदी से मिलने में निर्माण साईट बाधक बनते हैं, तो जलप्लावन की नौबत आ जाती है ।
ये बातें सोचते लद्दाख की शाश्वत निश्छल नैसर्गिक छटाओं को निहारते घाटी के नीचे आ जाते हैं । टैक्सी जहां रूकती है, वो जगह नुब्रा का समतल क्षेत्र है । नदी यहां से थोड़ी दूर है, बलुवाही जमीन पर सैलानी बैक्ट्रियन कैमल की सवारी का लुत्फ उठा रहे हैं ।
बैक्ट्रियन कैमल अर्थात् पीठ पर दो कूबड़ वाला ऊंटए जिसके बीच में ऐसा खांचा रहता है, जिसमें बैठकर पर्यटक ऊँट सवारी का आनंद लेते हैं । बैक्ट्रियन कैमल के नाम से परिभाषित इस ऊँट के साथ एक इतिहास जुड़ा है, जो लद्दाख पर भी लागू होता है । मध्य एसिया(सेंट्रल एसिया) के एक प्रांत का नाम है बैक्ट्रियाए जो अब अफगानिस्तान का हिस्सा है । ऐतिहासिक मान्यता ये है कि अफगानिस्तान से सदियों पहले लोग बैक्ट्रियन ऊंट (कैमल) पर ही बैठकर माल.असबाब लेकर खूनखराबा से बचने के लिए भागकर आए और लद्दाख में ही बस गए । लद्दाख से अफगानिस्तान का रूट वाया पाकिस्तान सीधा है । १९९९ के कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने अफगान मुजाहिदीनों को आगे करके कारगिल में भारतीय सीमा के अंदर तक घुसपैठ कराया था ।
यह बैक्ट्रियन कैमल लद्दाख की खासियतों में भी खास है । ऐसा कैमल भारत तो क्याए दुनिया के किसी भी हिस्से में नहीं मिलता है । यहां तक की लद्दाख की भी अन्य बर्फीली घाटियों में याक तो हर जगह चरते.विचरण करते मिलेंगे । लेकिन बैक्ट्रियन कैमल नुब्रा घाटी की अपनी विशिष्टता है । इसकी बनावट राजस्थानी ऊँटों से भिन्न है । बैक्ट्रियन कैमल की ऊंचाई कम है, क्योंकि इसकी टांगें रेगिस्तानी ऊँटों जितनी लंबी नहीं है । राजस्थान के पर्यटक स्थल जैसलमेर में ऊँट सवारी का आनंद ले चुके पर्यटकों को बैक्ट्रियन कैमल पर चढ़कर घूमने में ज्यादा मजा आता है । मैं खुद भी उनमें शामिल हूँ, साथी कैमल सवारों ने अपना अनुभव साझा किया । ५० रूपए की पर्ची कटाइए और अपनी बारी का इंतजार कीजिए । कैमल के मुंह से निकलते झाग और नाक में मक्खियां भिनभिना रही हैं । थोड़ी बदबू जैसी भी है, मगर उससे घिन नहीं लगती । वो कैमल अपने रखवाले की देह में कपड़े पर मुंह रगड़ता रहता है । जितनी देर सवारी नहीं आतीए मालिक रस्सी ढीली किए कैमल को सहलाता रहता है । घूमने के समय कड़ी धूप नहीं अखरती । लद्दाख की सबसे रोचक पर्यटन स्थल नुब्रा घाटी का यह अंतिम प्वाइंट है ।
घाटियोंए नदियों को साथ लेकर चलनेवाले लेक के बीच समरसता और समन्वय का भी अद्भुत संगम है । लद्दाखियों में बौद्ध मुस्लिम समुदायों में सामाजिकए सांस्कृतिक सद्भाव तथा बिरादर जैसा भाईचारा लद्दाख पहाड़ी की थाती है ।
इस रोमांचक यात्रा संस्मरण के अगले पड़ावों की ओर बढ़ने से पहले तारीख बताना जरूरी है । पहाड़ी इलाकों की सैर में प्रायः पर्यटक जुलाई.अगस्त में ही निकलते हैं । टैक्सीए होटलए गेस्ट हाउस की बुकिंग करनेधकरवाने वाले पर्यटन ऑपरेटर भी वही समय उपयुक्त बताते हैं । लेकिन लद्दाख घूमने का २०२२ का अगस्त महीना वहां के मस्त मौसम और रम्य आवोहवा के साथ.साथ राजनीतिक दृष्टि से भी माएने रखती थी । वहां सबसे ज्यादा गौर करने और सराहने वाली बात हमको ये लगी कि किसी भी तरह की राजनीति से लद्दाखवासियों का सामाजिक जीवन प्रभावित नहीं होता । बहुजन हिताय से जुड़े हर मुद्दे पर सबके सब एकजुटता और आपसी मेलजोल का वातावरण बनाए रखते हैं ।
सुधी सजग पाठकों को याद दिला दें कि लद्दाख में अलग राज्य आंदोलन ०५/०८/२०१९ में धारा ३७० खतम करके जम्मू व कश्मीर को दो यूटी(संघ शासित क्षेत्र) में विभाजन के पहले से चल रहा है ।
मैं जिस समय लद्दाख में हूँ, वो लद्दाख को जम्मू व कश्मीर से काटकर अलग यूटी बनाए जाने का तीसरा वर्ष था । कश्मीर में धारा.३७० वापसी का आंदोलन गर्म था और उसके समानान्तर इस धारा को हटाना कश्मीरियों के हित में बताए जाने के सरकारी आयोजन के भी ज्यादा दिन नहीं गुजरे थे ।
लद्दाख के पर्यावरण विशेषज्ञ मैगसेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक का स्थानीय सिविल सोसायटी संगठनों के समर्थन से जत्थेवार अनशन चल रहा है । लद्दाख को संविधान की ६ठी अनुसूची के अंतर्गत जनजातीय क्षेत्र का दर्जा पूर्ण राज्य का दर्जा के साथ देने की मांग को लेकर सोनम वांगचुक का शांतिपूर्ण आंदोलन २०१९ लोकसभा चुनाव के पहले से जारी है । लद्दाख के दोनों जिले. लेह और कारगिल के लोगों ने मिलकर वांगचुक के नेतृत्व में इस अहिंसक संघर्ष को जनान्दोलन का रूप दे दिया है । बौद्धों के वर्चस्व वाले लेह का जनसंगठन लेह अपेक्स बॉडी(सठ एलएबी) और मुस्लिम बहुल आबादी वाले कारगिल का सिविल सोसायटी संगठन(कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस) इस आन्दोलन में साथ हैं ।
केंद्र से वार्ता करने के लिए बने प्रतिनिधिमंडल में दोनों समुदायों से दोनों संगठनों के सदस्य शामिल हैं । इनके संयुक्त समर्थन से २०१९ आम चुनाव में लद्दाख लोकसभा सीट से लद्दाखियों की मांगें पूरी करवाने के लिए आवाज उठाने के वायदे पर जाम्यांग त्सेरिन नामग्याल चुनाव जीते ।
१५ अगस्तए २०२२ को लेह में सिंधु नदी के तट पर स्थित होटल नेचर रेजिडेंसी के रूम नं.२०३ से निकलकर मैं सिंधु की धारा से बिल्कुल सटकर बैठा । कलकल ध्वनि को आंखों और कानों में संचय करते हुए वहीं से नाश्ता चाय लेकर निकला हूँ ।
पेंगोंग लेक की दूरी लेह शहर से १५५ किलोमीटर है और १४ए००० फीट की ऊंचाई पर स्थित है । यहां से होते हुए कारगिलए निम्बू पहुँचना है । कारगिल में शहीद स्मारक के अलावे अन्यत्र जाना मुश्किल है । संयोग से वहां भी स्वतंत्रता दिवस के कारण जोश और उत्साह का माहौल है । २६ जुलाई को कारगिल में आयोजित शहीदों को श्रद्धांजलि और विजय दिवस समारोह के कारण भी ठंडी में गर्मी का एहसास है । १९९९ में ०३ मई से २६ जुलाई तक चले भारत. पाकिस्तान युद्ध में जंग का मैदान कारगिल का तोलोलिंग टाइगर हिल और बटालिक सेक्टर था, जिसमें ५२७ भारतीय सैनिक शहीद हुए थे । भारत को आखिरकार विजय हासिल हुई थी और उसी समय से हर साल यहां कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है । १०ए००० से १८ए००० फीट की ऊंचाई पर जहां यह जंग लड़ी गयी, वहीं से मैं गुजर रहा हूँ ।
२०२२ में जब कारगिल में हर जगह मैं जाना चाहता था, मगर कड़ी चौकसी थी । खार्मू मिलिटरी स्टेशन से जानकारी मिली कि कुछ रास्ते सुरक्षा कारणों से बंद हैं । सबसे खूबसूरत मनमोहक प्राकृतिक झांकी दिखानेवाला पर्यटकों का चहेता १८ए००० फीट की ऊंचाई पर स्थित खारडुंग.ला पर तो लगता है, मेघ और पहाड़ घाटियों के साथ झूम रहे हैं ।
वर्ष २०२५ कारगिल विजय दिवस के समय पर्यटकों के लिए अच्छी जानकारी सेना की ओर से दी गयी कि बटालिक में इंडस(सिंधु) व्यूप्वाइंट और युद्धक्षेत्र को भी पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है ।
दो रोचक अनुभव मैं पाठकों से साझा करना चाहता हूँ, जो १७.०८.२०२२ का सियाचिन युद्ध स्मारक का है, जो नुब्रा घाटी में नदियों के मधुर मिलन चर्चा में ध्यान से उतर गया । हुंडर की ये जगह बोगोलांग तुरतुक है ।
बोगोलांग तुरतुक १९७१ का भारत.पाक युद्ध क्षेत्र है, जहां सियाचीन युद्ध.स्मारक है । यहीं पर भारत और पाकिस्तान की सीमा समाप्त होती है और थांग खालसार अंतिम भारतीय गांव है । उस जगह एक बुजुर्ग गुलाम हुसैन को कई पर्यटकों ने घेर रखा है । गुलाम हुसैन के बारे में पता चलता है कि ये १९७१ भारत.पाक युद्ध के एकमात्र जीवित चश्मदीह गवाह हैं । उसी युद्ध के बाद पूर्वी पाकिस्तान नया आजाद मुल्क बांग्लादेश के रूप में पैदा हुआ । गुलाम हुसैन बता रहे है कि किस प्रकार भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान को पछाड़ने के लिए मोर्चाबंदी की । पर्यटक अपने मोबाईल से गुलाम हुसैन की बातेंए फोटो रिकार्ड कर रहे हैं । हुसैन सुबह से दोपहर तक रोज हर पर्यटक टोली को आँखों देखा विवरण बताते हैं । बदले में सभी १००.५० रूपये उनके हाथ में थमा देते हैं । इसी से गुलाम हुसैन का खर्चा चलता है । वहां सारी चायए फलए जूस की दुकानें इसी सीमावर्ती गांव के लोगों की हैं ।
जूस बेचनेवाली फातिमा बताती है कि वो १२वीं तक पढ़ी है । उसके अब्बाजान पहले बांग्लादेश में थे । चेरी जैसा दीखनेवाला यहां का खुबानी फल पेड़ों से तोड़तोड़कर लोग खा रहे हैं। यह फल पकते ही सड़ने लगता है, इसलिए लद्दाख से बाहर नहीं भेजा जाता । वहीं एक आंगन में पेड़ से खुबानी फल तोड़कर मैं खा रहा था और साथी पर्यटकों की तरह झोले में डाल भी रहा था । उसी दौरान एक लड़की ने बड़े प्रेम और आदर से मुझे अपने घर के अंदर आकर चौकी पर बैठने का आग्रह किया । घर के पीछे नए कमरे निर्माण का काम चल रहा था । फातिमा के परिवारजन मुझसे ऐसे मिलेए मानो पहले से घनिष्ठ परिचय हो और काफी दिनों बाद मुलाकात हो रही हो । फातिमा ने अपने नए मेहमान को पानी पिलाया और चाय बनाने अंदर गयी । अब्बा अल्ला को प्यारे हो चुके हैं । उसकी खाला(मौसी) और शौहर से सामने मेहमान सैलानियों को खुबानी फल पेड़ से तोड़तोड़कर खाते देखते बात हो रही है । फातिमा चाय रखते हुए कहती है. ‘कुछ मेहमान ऐसे भी हैं जो बरसात के मौसम में आने के बाद जाड़े के महीनों तक यहीं रह जाते हैं । बर्फबारी और बर्फ की चादर से ढंकी घाटीए पहाड़ी का लुत्फ कंपकंपी ठिठुरन में उठाते हैं । कड़ाके की सर्द मौसम में ज्यादातर होटल बंद रहते हैं । उस समय सैलानी होम.स्टे करते हैं ।’ फातिमा बताती है. ‘मेरे पास दो ही कमरे थे, जो मेहमाननवाजी के लिए कम पड़ते थे । इसलिए तीन कमरे और बनवा रही हूँ, पर्यटन विभाग से मदद मिली है । आसपास ऐसे और भी मकान हैं, जो होम.स्टे के लिए पूरे साल मेहमानों की खातिरदारी के लिए तैयार रखे जाते हैं । इन मकानों में मेहमानों के स्वाद और रूचि का ख्याल करके हम खुद बना के अपने घर जैसा खाना खिलाते हैं ।’ मुझ जैसे अनजान मेहमान का मजहबए जात से बेखबर फातिमा ने कहा. ‘आप थक गए होंगेए थोड़ी देर लेट जाइए और रात होने से पहले अपने होटल लौट जाइएए वर्ना पहाड़ी रास्ते में दिक्कत होगी ।’
१८.०८.२०२२ को यात्रा के तीसरे दिन सुबह पेंगोंग लेक के किनारे बैठा हूँ । निर्मल स्वच्छ धारा को निहारते हुए बाबा नाजार्नुज की पंक्ति याद आ रही है. ‘मालिश फिजूल है पुलकित अंग.अंग में बेतवा किनारे ।’
ये जगह ही ऐसी है, जहां से सारे सैलानी गदगद पुलकित होकर लौटते हैं । मैं कुछ ज्यादा ही गदगद महसूस कर रहा हूँ । अभी समय में तनाव का माहौल है । २०२० में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में वास्तविक नियंत्रण रेखा के निकट डेमचोक और डेपसांग पर भारत.चीन के बीच हुई झड़प में २० भारतीय सैनिक मारे गये थे । २ साल गुजर जाने के बावजूद तनातनी बरकरार है और द्विपक्षीय वार्ताओं में सहमति नहीं बन पा रही है । मैं यह २०२२ की स्थिति बता रहा हूँ ।
मगर फातिमा की मेहमाननवाजी का अपनापन और घाटियों की चित्ताकर्षक हरियाली ने सारे तनावों को मनबहलावों में बदल दिया है ।
यात्रा के समापन के समय प्राकृतिक समावेश समन्वय के साथ.सवाथ सामाजिक समन्वय सद्भाव का यह विवरण देखिए । पेंगोंग लेक से आगे बढ़ते हुए मैं माथो गांव पहुंचा हुआ हूँ । ये लद्दाख लोकसभा सीट से २०१९ में जीते जाम्यांग त्सेरिन नामग्याल का गांव है । टैक्सी स्टैंड के पास चाय की दुकान पर सत्संग हो रहा है । टैक्सी चालक गुलाम कादिर की ही चाय दुकान है । मेरी बगल में लेह पहाड़ी विकास स्वायत्त परिषद के पार्षद नुर्बू बैठे हैं । २ साल बाद २०२४ में होनेवाले लोकसभा चुनाव की चर्चा है । सबलोग एक ही बात कह रहे हैं कि भाजपा के टिकट पर जीते जाम्यांग नामग्याल इस बार जीत नहीं पाएंगेए जिन्होंने थुप्स्तान छेवांग को हराया था । जाम्यांग त्सेरिन ने अपने राजनीतिक स्वार्थ से लद्दाख में सामाजिक सद्भाव बिगाड़ दिया । जाम्यांग के गांव के लोग कहते हैं । हम मजहबी आधार पर गुटों में बंटे जरूर हैं, मगर आपस में भाईचारा बनाए रखते हैं । लद्दाख बौद्ध संघ के अध्यक्ष रिग्जिन जोरा हमारे सबसे लोकप्रिय नेता हैं, जिन्होंने सभी लद्दाखियों को एक सूत्र में बांधे रखा है । उन्होंने हमारे अवतारी नेता कुशोक बाकुला के आदर्श को कायम रखा हुआ है । लेह हवाई अड्डा का नाम ही है. कुशोक बाकुला अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा ।
२०२४ लोकसभा चुनाव में हाजी हनीफा जान निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सभी समुदायों के समर्थन से जीते । गत वर्ष अक्टूबर में लेह से दिल्ली तक सोनम वांगचुक की पदयात्र में बड़ी संख्या में शामिल लद्दाखियों के साथ हनीफा जान थे । लद्दाख भवन में धरना में भी संसद सदस्य हनीफा जान अपनी जगह.जमीन की प्राकृतिक विरासत बचाने के लिए सोनम वांगचुक के साथ बैठे ।
लद्दाख बौद्ध संघ(एलबीए) और लद्दाख मुस्लिम संघ(एलएमए) की गठन ही लद्दाखियों के अधिकारों के लिए हुआ था । एलबीए का गठन कुशोक बाकुला ने किया, जिनके प्रति दोनों समुदायों की श्रद्धा है । आज मुस्लिम समुदाय के भी दो गुट हैं । सुन्नी गुट के प्रमुख अब्दुल कय्यूम हैं और शिया गुट के अशरफ अली हैं । लद्दाख मुस्लिम संघ की स्थापना अकबर लद्दाखी ने की । संयोगवश दोनों नेताओं से मेरी मुलाकात दिल्ली में हो चुकी है, जो आज इस दुनिया में नहीं हैं ।
वहां से निकलकर हम आ जाते हैं सोनम वांगचुक के पास । उस समय उन्होंने केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय से वार्ता के लिए बुलावे के बाद अनशन स्थगित कर दिया था । सब एक स्वर से कहते हैं. हम विकास के विरोधी नहीं है, मगर अपने पर्यावरण की रक्षा के लिए कृतसंकल्प हैं । इसीलिए हम लेह और कारगिल जिलों के लिए अलग.अलग लोकसभा सीटों की मांग केंद्र से कर रहे हैं । पर्यटक हमारे अन्नदाता हैं, यहां का जो प्राकृतिक सौन्दर्य देखकर आप मस्ती और तन्दुरूस्ती महसूस करते हैं, वही तो लद्दाख की पूंजी है । गलवान घाटी अगर आप जाते तो और मजा आताए जहां सीमा सड़क संगठन का नियंत्रण रेखा के पास मुध.न्योका एयरफील्ड बनाने का काम चल रहा है ।
लद्दाख में तो सड़कें चौड़ी हो भी नहीं सकती । जान का जोखिम हमेशा बना रहता है । पता नहीं किधर से चट्टान गिरे या कोई नीचे से समर्थन वापस ले ले । इसकी परवाह न करते हुए मोटरसाइकिलियों की देखादेखी टैक्सी चालक भी ध्यान रखते हैं कि पर्यटक संतुष्ट होकर लौटें ।
तनाव वाली गलवान घाटी का रास्ता ज्यादा संकरा है । खड़ी ढलानों से गुजरना ज्यादा जोखिम भरा है । फिर भी सैनिकों और पर्यटकों के लिए सुरक्षित मार्ग बनाने का काम जारी है । ३०.०७.२०२५ को दुखद समाचार मिला कि गलवान के चारबाग में दुरबुक और योंगटास से गुजरते हुए सेना के काफिले पर विशाल चट्टान गिरने से एक लेफ्टिनेंट कर्नल भानुप्रताप सिंह समेत दो जवान शहीद हो गए ।
उस दिन ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर संसद में १६ घंटे की बहस का जवाब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह दे रहे थे । लेकिन पर्यटकों के लिए अच्छी खबरें २०२५ में ही आयी । दुनिया की सबसे ऊंची चोटी १३ए७१० फीट पर बने न्योमा एयरफील्ड दिवाली के बाद चालू हो जाएगा । सेना सूत्रों के अनुसार अभी तो वहां भारी लड़ाकू विमान उतरेंगेए कुछ महीने बाद पर्यटकों के लिए भी जगह बनायी जाएगी ।
कश्मीर घाटी में पर्यटकों का डल लेक के बाद सबसे प्रिय जगह पहलगाम में आतंकी हमले के जवाब में सेना का जब अप्रील.मई में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चल रहा था, उसी समय कैलाश मानसरोवर यात्रा पर भारत.चीन के बीच सहमति बन रही थी । गलवान घाटी झड़प के कारण २०२० से यह तीर्थयात्रा.सह.पर्यटक यात्रा बंद थी । इसमें यात्रियों का जत्था छोटी.छोटी टुकड़ियों में उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे और सिक्किम के चोलाए नाथू.ला दर्रे से गुजरता है । यह रास्ता पर्यटक रूट के ही नाम से प्रसिद्ध है ।
जुलाई, २०२५ में सिक्किम से भी आनंद का समाचार मिला । पर्यटक मस्ती का डोकलाम प्वाइंट छुम्बी घाटी में है, जो एक ही साथ भुटानए चीन और भारत का त्रि.जंक्शन माना जाता है । ८ साल की रस्साकसी के बाद भारत ने अपने सुरक्षा हित और भुटान के समर्थन में चीन से सहमति बनायी है । जून, २०१७ में चीन ने भुटान के दावे वाले डोकलाम प्वाइंट पर सड़क बनाने का प्रयास किया था ।
२०२४ में भुटान घूमने के दौरान हमने सैलानियों की टोली के साथ हर घाटीए पहाड़ी में भारत की हवा देखी । जहां भी जाइए कोई.न.कोई भारतीय मिल जाएंगे ।
लोकमत दीपावली विशेषांक के लिए सामग्री
सैर और सुकून की धरोहर है लद्दाख पहाड़ी लद्दाख पहाड़ी की नुब्रा घाटी के पानामिक गांव में उस मनोरम जगह पर खड़ा हूँ, जहां नुब्रा नदी शियोक नर से मिलतो है । पानामिक गांव से होते हुए नारी नुब्रा नदी धीरे-धीरे बहती आती है । जबकि शियाक नर उफन रहा है । इसकी उछलती किल्लोल मचाती लहरें दोनों तरफ कंक्रोट पत्थरों से लदे तटों को थपेड़ों से अपना रास्ता बनाने के प्रयास में जुटी हैं । स्थानीय मान्यता के अनुसार नुब्रा नदी नारी है और शियोक नर पुरूष है । जब से नुब्रा नदी ने अपने बहाव का रास्ता बदल लिया है, शियोक बेचैन है । यह अपनी प्रिया से मिलने के लिए चट्टानों और बड़े-बड़े पत्थरों को तोड़ता हुआ दूर-दराज तक बस्तियों में पहुंच जाता है । टैक्सी ड्राइवर नर्बू बताते हैं कि अभी हमलोग सुमूर गांव से निकलकर हुंडर होते हुए आगे बढ़ रहे हैं, ये इलाके नुब्रा घाटी के हिस्से हैं । इन गांवों में शियोक(पुरूष नर) उत्पात मचाता है । बरसात और जाड़े के महीनों में प्रायः शांत रहता है । लेह में सिंधु नदी से मिलने के बाद जंस्कार को साथ लेते हुए सभी छोटी-बड़ी नदियों का शियोक के साथ संगम होता है । कहते हैं, तुरतुक बॉर्डर पर ग्लेसियर वाटरफॉल के पास सियाचिन युद्ध स्मारक के लिए दुर्गा ब्रिज बनने के समय से शियोक नाराज है । शियोक समूचे लद्दाख को छूनेवाला नर है, अब इसका कुछ बस्तियों से तलाक हो गया है । १६-१७/०८/२०२२ को १८,००० फीट की ऊंचाई से मैं अपनी आंखों और मस्तिष्क को सुकून दे रहा हूँ ।
यहाँ से थांग खालसार गांव नजर आ रहा है, जो भारत-पाक सीमा का अंतिम भारतीय गांव है । इस रास्ते में सैलानियों का तांता लगा है । तुरतुक बॉर्डर के त्याक्षी से निकलकर थांग, यलुन्खा, गाशी गांव से गुजरते हुए टैक्सी ड्राइवर नर्बू ने एक संगीत बजा रखा है । चारों तरफ व्याप्त मनभावन शीतलता के बीच मन को शांति प्रदान करनेवाले इस संगीत के बारे में पता चलता है कि यह हब्बा खातुन के गीत हैं ।
समूचे जम्मू व कश्मीर की सबसे लोकप्रिय सूफी शायर सह लोकगायिका हब्बा खातुन जन-मन कण-कण में रची बसी हैं । कहते हैं, नदियों की कलकल हिलोरों और घाटियों में निरंतर बहनेवाली मस्त हवाओं की सांय-सांय में हब्बा खातुन की आवाज सुनाई देती है । हब्बा खातुन महलों का सुख त्यागकर इसी जगह कुटी बनाकर रहती थीं, जहां नदियों का मिलन होता है । उन्हें लद्दाख की मीराबाई कहा जाता है । किवदंती के अनुसार नुब्रा नदी ने हब्बा खातुन को कुटी समेत अपने आगोश में ले लिया । घाटियों में गूंजती हब्बा की आवाज से बेचैन रूहों / अतृप्त आत्माओं को शांति मिलती है । जनश्रुति के अनुसार हब्बा खातुन एक खास किस्म के बने साज के साथ शायरी गाती थी, जिसमें से डमरू और सारंगी की जुगलबंदी निकलती थी ।
नुर्बू ने आकाशवाणी के लेह केंद्र से प्रसारित होती हब्बा खातुन की तन्मय करनेवाली पंक्तियां सुनायी - रूह कभी भटकती नहीं
इन्सान का भ्रमजाल है भटकाव मिट्टी किसी को दफन नहीं करती उसमें जुगनू है नर्गिस का नूर पहाड़, नदियां, घाटी, पेड़ सब तो टिके हैं इसी जमीं पर जमीन्दोज होना जन्नत को पाने जैसा है रिश्ते बिरादर चले जाते हैं फातिहा पढ़कर रूह कभी कहीं नहीं जाती
साथ नहीं छोड़ती जनम-जनम तक
नदियों के मिलन की यह लोक कथा अन्यत्र भी वैसी पहाड़ियों में सुनने को मिली है, जहां बौद्ध समुदाय के लोगों की आबादी ज्यादा है । २०२४ में भुटान पर्यटन के दौरान भी नदियों के प्रेम-मिलन और बिछुड़न से धारा में विचित्र बदलाव की कहानी मैंने सुनी । पड़ोसी देश भुटान को छूनेवाली कुछ नदियों का प्रवेश बागडोगरा, दार्जीलिंग और बांग्लादेश तक है । भुटान में भी जब पुरूष नर प्रिया नदी से बिछुड़ता है तो प्रलय मचाता है । चीन और भुटान की सीमा से लगा भारतीय पहाड़ी राज्य सिक्किम में यदा-कदा आनेवाली विनाशकारी बाढ़ के विषय में इसी से मिलती-जुलती दंतकथा प्रचलित है । सिक्किम में बौद्धों की आबादी ज्यादा है, लेकिन वहां की कहानी लद्दाख और भुटान से उल्टी है । सिक्किम में भारत-चोन व्यापारिक क्षेत्र नाथू-ला के निकट से गुजरनेवाली और पर्यटन स्थलों की रौनक बढानेवाली धाराओं में पुरूष नर को जब अपनी प्रिया नदी से मिलने में निर्माण साईट बाधक बनते हैं, तो जलप्लावन की नौबत आ जाती है ।
ये बातें सोचते लद्दाख की शाश्वत निश्छल नैसर्गिक छटाओं को निहारते घाटी के नीचे आ जाते हैं । टैक्सी जहां रूकती है, वो जगह नुब्रा का समतल क्षेत्र है। नदी यहां से थोड़ी दूर है, बलुवाही जमीन पर सैलानी बैक्ट्रियन कैमल की सवारी का लुत्फ उठा रहे हैं। बैक्टियन कैमल अर्थात् पीठ पर दो कूबड़ वाला ऊंट, जिसके बीच में ऐसा खांचा रहता है, जिसमें बैठकर पर्यटक ऊंट सवारी का आनंद लेते हैं । बैक्टियन कैमल के नाम से परिभाषित इस ऊंट के साथ एक इतिहास जुड़ा है, जो लद्दाख पर भी लागू होता है । मध्य एसिया(सेंट्रल एसिया) के एक प्रांत का नाम है बैक्ट्रिया, जो अब अफगानिस्तान का हिस्सा है । ऐतिहासिक मान्यता ये है कि अफगानिस्तान से सदियों पहले लोग बैक्टियन ऊंट(कैमल) पर ही बैठकर माल-असबाब लेकर खूनखराबा से बचने के लिए भागकर आए और लद्दाख में ही बस गए । लद्दाख से अफगानिस्तान का रूट वाया पाकिस्तान सीधा है । १९९९ के कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने अफगान मुजाहिदीनों को आगे करके कारगिल में भारतीय सीमा के अंदर तक घुसपैठ कराया था । यह बैक्ट्रियन कैमल लद्दाख की खासियतों में भी खास है । ऐसा कैमल भारत तो क्या, दुनिया के किसी भी हिस्से में नहीं मिलता है । यहां तक की लद्दाख की भी अन्य बर्फीली घाटियों में याक तो हर जगह चरते-विचरण करते मिलेंगे । लेकिन बैक्ट्रियन कैमल नुब्रा घाटी की अपनी विशिष्टता है । इसकी बनावट राजस्थानी ऊंटों से भिन्न है । बैक्ट्रियन कैमल की ऊंचाई कम है, क्योंकि इसकी टांगें रेगिस्तानी ऊंटों जितनी लंबी नहीं है । राजस्थान के पर्यटक स्थल जैसलमर में ऊंट सवारी का आनंद ले चुके पर्यटकों को बैक्ट्रियन कैमल पर चढ़कर घूमने में ज्यादा मजा आता है । मैं खुद भी उनमें शामिल हूँ, साथी कैमल सवारों ने अपना अनुभव साझा किया । ५० रूपए की पर्ची कटाइए और अपनी बारी का इंतजार कीजिए । कैमल के मुंह से निकलते झाग और नाक में मक्खियां भिनभिना रही हैं । थोड़ी बदबू जैसी भी है, मगर उसस घिन नहीं लगती । वो कैमल अपने रखवाले को देह में कपड़े पर मुंह रगड़ता रहता है । जितनी देर सवारी नहीं आती, मालिक रस्सी ढीली किए कैमल को सहलाता रहता है । घूमने के समय कड़ी धूप नहीं अखरती । लद्दाख की सबसे रोचक पर्यटन स्थल नुब्रा घाटी का यह अंतिम प्वाइंट है । घाटियों, नदियों को साथ लेकर चलनेवाले लेक के बीच समरसता और समन्वय का भी अद्भुत संगम है । लद्दाखियों में बौद्ध मुस्लिम समुदायों में सामाजिक, सांस्कृतिक सद्भाव तथा बिरादर जैसा भाईचारा लद्दाख पहाड़ी की थाती है । इस रोमांचक यात्रा संस्मरण के अगले पड़ावों की ओर बढ़ने से पहले तारीख बताना जरूरी है । पहाड़ी इलाकों की सैर में प्रायः पर्यटक जुलाई-अगस्त में ही निकलते हैं । टैक्सी, होटल, गस्ट हाउस की बुकिंग करने/करवाने वाले पर्यटन ऑपरेटर भी वही समय उपयुक्त बताते हैं । लेकिन लद्दाख घूमने का २०२२ का अगस्त महीना वहां के मस्त मौसम और रम्य आवोहवा के साथ-साथ राजनीतिक दृष्टि से भी माएने रखती थी । वहां सबसे ज्यादा गौर करने और सराहने वाली बात हमको ये लगी कि किसी भी तरह की राजनीति से लद्दाखवासियों का सामाजिक जीवन प्रभावित नहीं होता । बहुजन हिताय से जुड़े हर मुद्दे पर सबके सब एकजुटता और आपसी मेलजोल का वातावरण बनाए रखत हैं ।
सुधी सजग पाठकों को याद दिला दें कि लद्दाख में अलग राज्य आंदोलन ०५/०८/२०१९ में धारा-३७० खतम करके जम्मू व कश्मीर को दो यूटी(संघ शासित क्षेत्र) में विभाजन के पहले से चल रहा है ।
मैं जिस समय लद्दाख में हूं, वो लद्दाख को जम्मू व कश्मीर से काटकर अलग यूटी बनाए जाने का तीसरा वर्ष था । कश्मीर में धारा-३७० वापसी का आंदोलन गर्म था और उसके समानान्तर इस धारा को हटाना कश्मीरियों के हित में बताए जाने क सरकारी आयोजन के भी ज्यादा दिन नहीं गुजरे थे ।
लद्दाख के पर्यावरण विशेषज्ञ मैगसेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक का स्थानीय सिविल सोसायटी संगठनों के समर्थन से जत्थेवार अनशन चल रहा है । लद्दाख को संविधान की ६ठी अनुसूची के अंतर्गत जनजातीय क्षेत्र का दर्जा पूर्ण राज्य का दर्जा के साथ देने की मांग को लेकर सोनम वांगचुक का शांतिपूर्ण आंदोलन २०१९ लोकसभा चुनाव के पहले से जारी है । लद्दाख के दोनों जिले - लेह और कारगिल के लोगों ने मिलकर वांगचुक के नेतृत्व में इस अहिंसक संघर्ष को जनान्दोलन का रूप दे दिया है । बौद्धों के वर्चस्व वाले लेह का जनसंगठन लेह अपेक्स बॉडी(सठ एलएबी) और मुस्लिम बहुल आबादी वाले कारगिल का सिविल सोसायटी संगठन(कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस) इस आन्दोलन में साथ हैं । केंद्र से वार्ता करने के लिए बने प्रतिनिधिमंडल में दोनों समुदायों से दोनों संगठनों के सदस्य शामिल हैं । इनके संयुक्त समर्थन से २०१९ आम चुनाव में लद्दाख लोकसभा सीट से लद्दाखियों की मांगें पूरी करवाने के लिए आवाज उठाने के वायदे पर जाम्यांग त्सेरिन नामग्याल चुनाव जीते ।
१५ अगस्त, २०२२ को लेह में सिंधु नदी के तट पर स्थित होटल नेचर रेजिडेंसी के रूम नं. २०३ से निकलकर मैं सिंधु की धारा से बिल्कुल सटकर बैठा । कलकल ध्वनि को आंखों और कानों में संचय करते हुए वहीं से नाश्ता चाय लेकर निकला हूं । पेंगोंग लेक की दूरी लेह शहर से १५५ किलोमीटर है और १४,००० फीट की ऊंचाई पर स्थित है । यहां से होते हुए कारगिल, निम्बू पहुंचना है । कारगिल में शहीद स्मारक के अलावे अन्यत्र जाना मुश्किल है । संयोग से वहां भी स्वतंत्रता दिवस के कारण जोश और उत्साह का माहौल है । २६ जुलाई को कारगिल में आयोजित शहीदों को श्रद्धांजलि और विजय दिवस समारोह के कारण भी ठंडी में गर्मी का एहसास है । १९९९ में ०३ मई से २६ जुलाई तक चले भारत-पाकिस्तान युद्ध में जंग का मैदान कारगिल का तोलोलिंग टाइगर हिल और बटालिक सेक्टर था, जिसमें ५२७ भारतीय सैनिक शहीद हुए थे । भारत को आखिरकार विजय हासिल हुई थी और उसी समय से हर साल यहां कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है । १०,००० से १८,००० फीट की ऊंचाई पर जहां यह जंग लड़ी गयी, वहीं से मैं गुजर रहा हूँ । २०२२ में जब कारगिल में हर जगह मैं जाना चाहता था, मगर कड़ी चौकसी थी । खाम मिलिटरी स्टेशन से जानकारी मिली कि कुछ रास्ते सुरक्षा कारणों से बंद हैं । सबसे खूबसूरत, मनमोहक प्राकृतिक झांकी दिखानेवाला पर्यटकों का चहेता १८,००० फीट की ऊंचाई पर स्थित खारडुंग ला पर तो लगता है, मेघ और पहाड़ घाटियों के साथ झूम रहे हैं ।
वर्ष २०२५ कारगिल विजय दिवस के समय पर्यटकों के लिए अच्छी जानकारी सेना की ओर से दी गयी कि बटालिक में इंडस (सिंधु) व्यूप्वाइंट और युद्धक्षेत्र को भी पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है । दो रोचक अनुभव मैं पाठकों से साझा करना चाहता हूँ, जो १७/०८/२०२२ का सियाचिन युद्ध स्मारक का है, जो नुब्रा घाटी में नदियों के मधुर मिलन चर्चा में ध्यान से उतर गया। हुंडर की ये जगह बोगोलांग तुरतुक है । बोगोलांग तुरतुक १९७१ का भारत-पाक युद्ध क्षेत्र है, जहां सियाचीन युद्ध-स्मारक है । यहीं पर भारत और पाकिस्तान की सीमा समाप्त होती है और थांग खालसार अंतिम भारतीय गांव है। उस जगह एक बुजुर्ग गुलाम हुसैन को कई पर्यटकों ने घेर रखा है । गुलाम हुसैन के बारे में पता चलता है कि ये १९७१ भारत-पाक युद्ध के एकमात्र जीवित चश्मदीह गवाह हैं । उसी युद्ध के बाद पूर्वी पाकिस्तान नया आजाद मुल्क बांग्लादेश के रूप में पैदा हुआ । गुलाम हुसैन बता रहे है कि किस प्रकार भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान को पछाड़ने के लिए मार्चाबंदी की । पर्यटक अपने मोबाईल से गुलाम हुसैन की बातें, फोटो रिकार्ड कर रहे हैं । हुसैन सुबह से दोपहर तक रोज हर पर्यटक टोली को आंखों देखा विवरण बताते हैं । बदले में सभी १००-५० रूपये उनके हाथ में थमा देते हैं । इसी से गुलाम हुसैन का खर्चा चलता है । वहां सारी चाय, फल, जूस की दुकानें इसी सीमावर्ती गांव के लोगों की हैं । जूस बेचनेवाली फातिमा बताती है कि वो १२वीं तक पढ़ी है । उसके अब्बाजान पहले बांग्लादेश में थे । चरी जैसा दीखनेवाला यहां का खुबानी फल पेड़ों से तोड़तोड़कर लोग खा रहे हैं। यह फल पकते ही सड़ने लगता है, इसलिए लद्दाख से बाहर नहीं भेजा जाता । वहीं एक आंगन में पेड़ से खुबानी फल तोड़कर मैं खा रहा था और साथी पर्यटकों की तरह झोले में डाल भी रहा था । उसी दौरान एक लडकी ने बड़े प्रेम और आदर से मुझे अपने घर के अंदर आकर चौकी पर बैठने का आग्रह किया । घर के पीछे नए कमरे निर्माण का काम चल रहा था । फातिमा के परिवारजन मुझसे ऐसे मिले, मानो पहले से घनिष्ठ परिचय हो और काफी दिनों बाद मुलाकात हो रही हो । फातिमा ने अपने नए मेहमान को पानी पिलाया और चाय बनाने अंदर गयी । अब्बा अल्ला को प्यारे हो चुके हैं । उसकी खाला(मौसी) और शौहर से सामने मेहमान सैलानियों को खुबानी फल पेड़ से तोड़तोड़कर खाते देखते बात हो रही है । फातिमा चाय रखते हुए कहती है - ‘कुछ मेहमान ऐसे भी हैं जो बरसात के मौसम में आने के बाद जाड़े के महीनों तक यहीं रह जाते हैं । बर्फबारी और बर्फ की चादर से ढंकी घाटी, पहाड़ी का लुत्फ कंपकंपी ठिठुरन में उठाते हैं । कड़ाके की सर्द मौसम में ज्यादातर होटल बंद रहते हैं । उस समय सैलानी होम-स्टे करते हैं । फातिमा बताती ह - ‘मेरे पास दो ही कमरे थे, जो मेहमाननवाजी के लिए कम पड़ते थे । इसलिए तीन कमरे और बनवा रही हूँ, पर्यटन विभाग से मदद मिली है । आसपास ऐसे और भी मकान हैं, जो होम-स्टे के लिए पूरे साल मेहमानों की खातिरदारी के लिए तैयार रखे जाते हैं । इन मकानों में मेहमानों के स्वाद और रूचि का ख्याल करके हम खुद बना के अपने घर जैसा खाना खिलाते हैं ।’ मुझ जैसे अनजान मेहमान का मजहब, जात से बेखबर फातिमा ने कहा - ‘आप थक गए होंगे, थोड़ी देर लेट जाइए और रात होने से पहले अपने होटल लौट जाइए, वर्ना पहाड़ी रास्ते में दिक्कत होगी ।’ १८.०८.२०२२ को यात्रा के तीसरे दिन सुबह पेंगोंग लेक के किनारे बैठा हूं। निर्मल स्वच्छ धारा को निहारते हुए बाबा नाजार्नुज की पंक्ति याद आ रही है - ‘मालिश फिजूल है पुलकित अंग-अंग में बेतवा किनारे ।’
ये जगह ही ऐसी है, जहां से सारे सैलानी गदगद पुलकित होकर लौटते हैं । मैं कुछ ज्यादा ही गदगद महसूस कर रहा हूँ । अभी समय में तनाव का माहौल है । २०२० में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में वास्तविक नियंत्रण रेखा के निकट डेमचोक और डेपसांग पर भारत-चीन के बीच हुई झड़प में २० भारतीय सैनिक मारे गये थे । २ साल गुजर जाने के बावजूद तनातनी बरकरार है और द्विपक्षीय वार्ताओं में सहमति नहीं बन पा रही है । मैं यह २०२२ की स्थिति बता रहा हूँ ।
मगर फातिमा की मेहमाननवाजी का अपनापन और घाटियों की चित्ताकर्षक हरियाली ने सारे तनावों को मनबहलावों में बदल दिया है यात्रा के समापन के समय प्राकृतिक समावेश समन्वय के साथ-सवाथ सामाजिक समन्वय सद्भाव का यह विवरण देखिए । पेंगोंग लेक से आगे बढ़ते हुए मैं माथो गांव पहुंचा हुआ हूँ। ये लद्दाख लोकसभा सीट से २०१९ में जीते जाम्यांग त्सेरिन नामग्याल का गांव है । टैक्सी स्टैंड के पास चाय की दुकान पर सत्संग हो रहा है । टैक्सी चालक गुलाम कादिर की ही चाय दुकान है । मेरी बगल में लेह पहाड़ी विकास स्वायत्त परिषद के पार्षद नुर्बू बैठे हैं । २ साल बाद २०२४ में होनेवाले लोकसभा चुनाव की चर्चा है । सबलोग एक ही बात कह रहे हैं कि भाजपा के टिकट पर जीते जाम्यांग नामग्याल इस बार जीत नहीं पाएंगे, जिन्होंने थुप्स्तान छेवांग को हराया था । जाम्यांग त्सेरिन ने अपने राजनीतिक स्वार्थ से लद्दाख में सामाजिक सद्भाव बिगाड़ दिया । जाम्यांग के गांव के लोग कहते हैं । हम मजहबी आधार पर गुटों में बंटे जरूर हैं, मगर आपस में भाईचारा बनाए रखते हैं । लद्दाख बौद्ध संघ के अध्यक्ष रिग्जिन जोरा हमारे सबसे लोकप्रिय नेता हैं, जिन्होंने सभी लद्दाखियों को एक सूत्र में बांधे रखा है । उन्होंने हमारे अवतारी नेता कुशोक बाकुला के आदर्श को कायम रखा हुआ है । लेह हवाई अड्डा का नाम ही है - कुशोक बाकुला अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा । २०२४ लोकसभा चुनाव में हाजी हनीफा जान निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सभी समुदायों के समर्थन से जीते । गत वर्ष अक्टूबर में लेह से दिल्ली तक सोनम वांगचुक की पदयात्रा में बड़ी संख्या में शामिल लद्दाखियों के साथ हनीफा जान थे । लद्दाख भवन में धरना में भी संसद सदस्य हनीफा जान अपनी जगह-जमीन की प्राकृतिक विरासत बचाने के लिए सोनम वांगचुक के साथ बैठे । लद्दाख बौद्ध संघ(एलबीए) और लद्दाख मुस्लिम संघ(एलएमए) की गठन हो लद्दाखियों के अधिकारों के लिए हुआ था । एलबीए का गठन कुशोक बाकुला ने किया, जिनके प्रति दोनों समुदायों की श्रद्धा है। आज मुस्लिम समुदाय के भी दो गुट हैं । सुन्नी गुट के प्रमुख अब्दुल कय्यूम हैं और शिया गुट के अशरफ अली हैं । लद्दाख मुस्लिम संघ की स्थापना अकबर लद्दाखी ने की । संयोगवश दोनों नेताओं से मेरी मुलाकात दिल्ली में हो चुकी है, जो आज इस दुनिया में नहीं हैं । वहां से निकलकर हम आ जाते हैं सोनम वांगचुक के पास । उस समय उन्होंने केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय स वार्ता के लिए बुलावे के बाद अनशन स्थगित कर दिया था । सब एक स्वर से कहते हैं - हम विकास के विरोधी नहीं है, मगर अपने पर्यावरण की रक्षा के लिए कृतसंकल्प हैं । इसीलिए हम लेह और कारगित जिलों के लिए अलग-अलग लोकसभा सीटों की मांग केंद्र से कर रहे हैं । पर्यटक हमारे अन्नदाता हैं, यहां का जो प्राकृतिक सौन्दर्य देखकर आप मस्ती और तन्दुरूस्ती महसूस करते हैं, वही तो लद्दाख की पूंजी है । गलवान घाटी अगर आप जाते तो और मजा आता, जहां सीमा सड़क संगठन का नियंत्रण रेखा के पास मुध-न्योका एयरफील्ड बनाने का काम चल रहा है । लद्दाख में तो सड़कें चौड़ी हो भी नहीं सकती । जान का जोखिम हमेशा बना रहता है । पता नहीं किधर से चट्टान गिरे या कोई नीचे से समर्थन वापस ले ले । इसकी परवाह न करते हुए मोटरसायकिल युवकों की देखादेखी टैक्सी चालक भी ध्यान रखते हैं कि पर्यटक संतुष्ट होकर लौटें । तनाव वाली गलवान घाटी का रास्ता ज्यादा संकरा है । खड़ी ढलानों से गुजरना ज्यादा जोखिम भरा है। फिर भी सैनिकों और पर्यटकों के लिए सुरक्षित मार्ग बनाने का काम जारी है । ३०.०७.२०२५ को दुखद समाचार मिला कि गलवान के चारबाग में दुरबुक और योंगटास से गुजरते हुए सेना के काफिले पर विशाल चट्टान गिरने से एक लेफ्टिनेंट कर्नल भानुप्रताप सिंह समेत दो जवान शहीद हो गए । उस दिन ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर संसद में १६ घंटे की बहस का जवाब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह दे रहे थे ।
लेकिन पर्यटकों के लिए अच्छी खबरें २०२५ में ही आयी । दुनिया की सबसे ऊंची चोटी १३,७१० फीट पर बने न्योमा एयरफील्ड दिवाली के बाद चालू हो जाएगा । सेना सूत्रों के अनुसार अभी तो वहां भारी लड़ाकू विमान उतरेंगे, कुछ महीने बाद पर्यटकों के लिए भी जगह बनायी जाएगी ।
कश्मीर घाटी में पर्यटकों का डल लेक के बाद सबसे प्रिय जगह पहलगाम में आतंकी हमले के जवाब में सेना का जब अप्रील-मई में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चल रहा था, उसी समय कैलाश मानसरोवर यात्रा पर भारत-चीन के बीच सहमति बन रही थी । गलवान घाटी झड़प के कारण २०२० से यह तीर्थयात्रा-सह-पर्यटक यात्रा बंद थी । इसमें यात्रियों का जत्था छोटी-छोटी टुकड़ियों में उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे और सिक्किम के चोला, नाथू ला दर्रे से गुजरता है। यह रास्ता पर्यटक रूट के ही नाम से प्रसिद्ध है । जुलाई, २०२५ में सिक्किम से भी आनंद का समाचार मिला । पर्यटक मस्ती का डोकलाम प्वाइंट छुम्बी घाटी में है, जो एक ही साथ भुटान, चीन और भारत का त्रि-जंक्शन माना जाता है । ८ साल की रस्साकसी के बाद भारत ने अपने सुरक्षा हित और भुटान के समर्थन में चीन से सहमति बनायी है । जून, २०१७ में चीन ने भुटान के दावे वाले डोकलाम प्वाइंट पर सड़क बनाने का प्रयास किया था ।
२०२४ में भुटान घूमने के दौरान हमने सैलानियों की टोली के साथ हर घाटी, पहाड़ी में भारत की हवा देखी। जहां भी जाइए, कोई-न-कोई भारतीय मिल जाएंगे ।