यह लेख नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के विरोध प्रदर्शनों और सरकार की प्रतिक्रियाओं पर केंद्रित है। इसमें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सीएए विरोध प्रदर्शनकारियों के पोस्टर लगाने और संपत्ति क्षति वसूली के लिए अध्यादेश लाने के खिलाफ न्यायपालिका के हस्तक्षेप पर प्रकाश डाला गया है। लेख में भाजपा के एजेंडे और संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन पर भी सवाल उठाए गए हैं, साथ ही शाहीन बाग धरने और दिल्ली दंगों का भी उल्लेख है।
सुप्रीम कोर्ट बिहार में निर्वाचन आयोग की विशेष गठन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रहा है, जहाँ लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। कोर्ट ने आयोग से हटाए गए नामों का विवरण और कारण स्पष्ट करने को कहा है, साथ ही मतदाताओं को अपील का उचित अवसर देने का निर्देश दिया है। यह विवाद आधार कार्ड को पहचान पत्र के रूप में मानने और नागरिकता से जुड़े घुसपैठिया अभियान तक फैला हुआ है, जिसके राष्ट्रीय प्रभाव हो सकते हैं।
यह लेख बताता है कि जम्मू-कश्मीर में धारा 370 अब एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है, खासकर आगामी विधानसभा चुनावों के संदर्भ में। नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी जैसे स्थानीय दलों ने पहले इसे वापस लाने के लिए संघर्ष किया था, लेकिन अब उनके रुख में बदलाव आया है और वे चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। कांग्रेस भी राज्य का दर्जा बहाल करने और चुनाव कराने पर जोर दे रही है, जबकि सुप्रीम कोर्ट में धारा 370 से संबंधित याचिकाएं लंबित हैं।
यह लेख मणिपुर में राष्ट्रीय खेल यूनिवर्सिटी की स्थापना के केंद्र सरकार के फैसले की आलोचना करता है। लेखक तर्क देता है कि मणिपुर के लोग इस परियोजना में दिलचस्पी नहीं रखते क्योंकि वे लंबे समय से आफ्सपा के तहत सुरक्षा बलों की ज्यादतियों और मानवाधिकार उल्लंघनों से पीड़ित हैं। लेख में मणिपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति विवाद और फर्जी मुठभेड़ों की सीबीआई जांच का भी उल्लेख है, जो राज्य की गंभीर स्थिति को उजागर करता है।
यह लेख मणिपुर में भारत सरकार की नीतियों की आलोचना करता है, विशेषकर आसियान देशों के साथ व्यापार बढ़ाने के प्रयासों की, जबकि मणिपुर के लोग खुद को भारत से कटा हुआ महसूस करते हैं। इसमें सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) के तहत सेना द्वारा कथित न्यायेत्तर हत्याओं और फर्जी मुठभेड़ों का जिक्र है, जिनकी सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया है। लेखक नागा शांति समझौते की गोपनीयता और मणिपुर के लोगों के प्रति केंद्र सरकार के अविश्वास पर भी प्रकाश डालता है, यह तर्क देते हुए कि व्यापार से पहले लोगों का विश्वास जीतना आवश्यक है।
यह लेख उल्फा शांति वार्ता के मध्यस्थ रेबती फूकन के लापता होने के इर्द-गिर्द घूमता है, जिससे वार्ता की स्थिति पर सवाल उठते हैं। सुप्रीम कोर्ट में उनके बेटे कौशिक द्वारा दायर याचिका के बावजूद केंद्र और असम सरकार फूकन के ठिकाने के बारे में जानकारी देने में विफल रही हैं। लेख में परेश बरूआ के साथ फूकन के संबंधों और खुफिया एजेंसियों की कथित संलिप्तता पर भी प्रकाश डाला गया है, जिससे असम में शांति प्रक्रिया की जटिलताएँ उजागर होती हैं।