यह लेख दक्षिण भारत में भाजपा की स्वीकार्यता की कमी का विश्लेषण करता है, विशेषकर केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में 2021 के विधानसभा चुनावों के संदर्भ में। इसमें केरल में कथित 'नकद डील' विवाद, भाजपा की चुनावी हार और क्षेत्रीय दलों के प्रभुत्व पर प्रकाश डाला गया है। लक्षद्वीप में प्रशासक प्रफुल पटेल के विवादास्पद आदेशों के कारण स्थानीय विरोध का भी उल्लेख है, जो भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे के खिलाफ है।
केंद्र सरकार ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) 2019 के नियमों को अधिसूचित कर दिया है, जिससे यह आगामी चुनावों में भाजपा के लिए एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन गया है। यह लेख सीएए के राजनीतिक निहितार्थों, विशेषकर पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय को लक्षित करने और गैर-भाजपा शासित राज्यों, विपक्षी दलों तथा सुप्रीम कोर्ट में इसके विरोध पर प्रकाश डालता है। सीएए के प्रावधानों और इसके कारण हुए ऐतिहासिक विवादों का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें भाजपा द्वारा वोटों के ध्रुवीकरण के उद्देश्य पर जोर दिया गया है।
यह लेख केंद्र-राज्य संबंधों में बिगड़ती स्थिति और भाजपा विरोधी विपक्षी एकता के प्रयासों पर केंद्रित है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन की आत्मकथा के विमोचन समारोह में ममता बनर्जी और के. चंद्रशेखर राव जैसे प्रमुख गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों की अनुपस्थिति ने क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच मतभेदों को उजागर किया। लेख में आईएएस कैडर नियमों में संशोधन, जीएसटी, कोरोना टीकाकरण और सीमा सुरक्षा बल के अधिकार जैसे मुद्दों पर केंद्र सरकार के खिलाफ राज्यों के विरोध को भी रेखांकित किया गया है।
यह लेख भारत के संघीय ढांचे पर बढ़ते दबावों की पड़ताल करता है, विशेषकर राज्यों द्वारा स्थानीय निवासियों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण और जीएसटी मुआवजे को लेकर केंद्र-राज्य विवाद के संदर्भ में। मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों द्वारा स्थानीय नौकरी आरक्षण के फैसलों को उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाने के बाद बाहरी लोगों के लिए नौकरी खोलने के केंद्र के कदम के विपरीत बताया है। वहीं, जीएसटी परिषद की बैठक में केंद्र द्वारा राज्यों को मुआवजा देने से इनकार करने और उन्हें कर्ज लेने का सुझाव देने पर गैर-भाजपा शासित राज्यों ने इसे संघीय व्यवस्था के खिलाफ "विश्वासघात" करार दिया है।
यह लेख वाम दलों, विशेषकर सीपीएम के घटते जनाधार और कांग्रेस के साथ उनके 'इंडिया' गठबंधन में शामिल होने से उत्पन्न चुनौतियों का विश्लेषण करता है। सीपीएम अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने और केरल व पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कांग्रेस के साथ चुनावी रणनीतियों के टकराव को लेकर चिंतित है। लेख में कांग्रेस की आंतरिक संगठनात्मक कमजोरियों और विभिन्न राज्यों में उसके चुनावी प्रदर्शन पर भी प्रकाश डाला गया है।
केरल, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच कुलपति नियुक्तियों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद केरल के राज्यपाल ने कई कुलपतियों से इस्तीफा मांगा, जिस पर राज्य सरकार ने विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया। यह विवाद संवैधानिक प्रमुखों और निर्वाचित सरकारों के बीच अधिकारों के टकराव को दर्शाता है, जिसमें भाई-भतीजावाद और यूजीसी मानदंडों के उल्लंघन के आरोप शामिल हैं।
यह लेख महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती के अवसर पर भाजपा सरकार द्वारा पंडित दीनदयाल उपाध्याय को एक बड़े राष्ट्रवादी विचारक के रूप में स्थापित करने के प्रयासों की आलोचना करता है। लेखक का तर्क है कि सरकार गांधी और शास्त्री के योगदान को कम करके आंक रही है, जबकि दीनदयाल उपाध्याय के हिंदुत्व-केंद्रित विचारों को जनता पर थोप रही है, जिससे भारतीयता की अवधारणा खतरे में है। लेख में दीनदयाल उपाध्याय की रहस्यमय मृत्यु की जांच न होने पर भी सवाल उठाया गया है।
यह लेख पूर्वोत्तर भारत में नई शिक्षा नीति (एनईपी) के कार्यान्वयन और क्षेत्र में उग्रवाद पर इसके संभावित प्रभाव पर केंद्रित है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने गुवाहाटी में एक सम्मेलन में एनईपी को पूर्वोत्तर के विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया, विशेषकर स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने पर जोर दिया। लेख मणिपुर में हालिया उग्रवादी हमले का विवरण देता है और तर्क देता है कि एनईपी युवाओं को राष्ट्रवाद की ओर प्रेरित करके और बेहतर अवसर प्रदान करके अलगाववादी हिंसा का मुकाबला कर सकती है।
यह लेख भाजपा विरोधी विपक्षी दलों की एकता के प्रयासों में आ रही चुनौतियों का विश्लेषण करता है। इसमें महाराष्ट्र के राजनीतिक घटनाक्रम और पश्चिम बंगाल पंचायत चुनावों के नतीजों का उल्लेख किया गया है, जो विपक्षी एकता के प्रयासों को प्रभावित कर रहे हैं। विभिन्न क्षेत्रीय दलों और नेताओं के बीच मतभेद और कांग्रेस के साथ उनके असहज संबंधों को भी उजागर किया गया है, जिससे बेंगलुरु में होने वाली दूसरी विपक्षी बैठक की राह मुश्किल दिख रही है।
यह लेख अवैध विदेशी घुसपैठियों और मतदाता सूची से जुड़े विवाद पर केंद्रित है, विशेषकर बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घुसपैठियों को निकालने का वादा दोहराया है, जबकि सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार से इस अभियान की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) और बंगला-भाषी अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के आरोपों पर जवाब मांग रहा है। बिहार में आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण को लेकर भी विवाद गहरा गया है, जिसमें लाखों मतदाताओं को संदिग्ध नागरिकता के नोटिस जारी किए गए हैं।