यह लेख 27 जनवरी, 2020 को केंद्र सरकार, असम सरकार और विभिन्न बोडो उग्रवादी गुटों के बीच हुए ऐतिहासिक बोडो शांति समझौते पर केंद्रित है। यह असम में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध प्रदर्शनों के बीच इस समझौते के महत्व पर प्रकाश डालता है और सुझाव देता है कि उल्फा और नगा गुटों जैसे अन्य विद्रोही समूहों के लिए भी ऐसी ही शांति पहल की जानी चाहिए। लेख बोडो विद्रोह के इतिहास, पिछले समझौतों और सभी गुटों को मुख्यधारा में लाने की चुनौतियों पर भी चर्चा करता है।
उल्फा चेयरमैन अरविंद राजखोवा ने 15 अगस्त तक केंद्र सरकार के साथ अंतिम शांति समझौते की उम्मीद जताई है, दावा किया है कि वार्ता अंतिम चरण में है। हालांकि, लेख इस बात पर प्रकाश डालता है कि उल्फा के विद्रोही गुट उल्फा(आई) के परेश बरुआ शांति वार्ता के खिलाफ हैं और केंद्र या असम सरकार ने राजखोवा के बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। यह असम में उग्रवाद के जटिल इतिहास और शांति प्रक्रिया में आने वाली चुनौतियों पर भी चर्चा करता है, जिसमें हाल ही में एक छात्र की गिरफ्तारी भी शामिल है।
यह लेख पूर्वोत्तर भारत में शांति प्रक्रिया, विशेषकर यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम (उल्फा) के साथ हुए त्रिपक्षीय शांति समझौते पर केंद्रित है। यह समझौता 40 वर्षों की हिंसा के बाद एक नए युग की शुरुआत का प्रतीक है, जिसमें उल्फा के संस्थापक सदस्य भारतीय संवैधानिक ढांचे में शामिल होने पर सहमत हुए हैं। लेख में नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (एनएससीएन-आईएम) जैसे अन्य उग्रवादी समूहों और पूर्वोत्तर में हुए अन्य शांति समझौतों का भी उल्लेख है, साथ ही परेश बरुआ के नेतृत्व वाले उल्फा (स्वाधीन) गुट की चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला गया है।
यह लेख असम के तिनसुकिया जिले में पांच बंगालियों की हत्या के बाद की स्थिति का विश्लेषण करता है, जिसमें उल्फा (आई) पर संदेह है। यह राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 के कारण असम में बढ़ती जातीय हिंसा और राजनीतिक तनाव को उजागर करता है। लेख उल्फा शांति वार्ता की अनिश्चित स्थिति और केंद्र व राज्य सरकारों की भूमिका पर भी प्रकाश डालता है।
यह लेख उल्फा शांति वार्ता के मध्यस्थ रेबती फूकन के लापता होने के इर्द-गिर्द घूमता है, जिससे वार्ता की स्थिति पर सवाल उठते हैं। सुप्रीम कोर्ट में उनके बेटे कौशिक द्वारा दायर याचिका के बावजूद केंद्र और असम सरकार फूकन के ठिकाने के बारे में जानकारी देने में विफल रही हैं। लेख में परेश बरूआ के साथ फूकन के संबंधों और खुफिया एजेंसियों की कथित संलिप्तता पर भी प्रकाश डाला गया है, जिससे असम में शांति प्रक्रिया की जटिलताएँ उजागर होती हैं।