यह लेख मणिपुर में भारत सरकार की नीतियों की आलोचना करता है, विशेषकर आसियान देशों के साथ व्यापार बढ़ाने के प्रयासों की, जबकि मणिपुर के लोग खुद को भारत से कटा हुआ महसूस करते हैं। इसमें सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) के तहत सेना द्वारा कथित न्यायेत्तर हत्याओं और फर्जी मुठभेड़ों का जिक्र है, जिनकी सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया है। लेखक नागा शांति समझौते की गोपनीयता और मणिपुर के लोगों के प्रति केंद्र सरकार के अविश्वास पर भी प्रकाश डालता है, यह तर्क देते हुए कि व्यापार से पहले लोगों का विश्वास जीतना आवश्यक है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मणिपुर में जातीय संघर्ष के बाद शांति स्थापित करने का प्रयास किया, जिसमें उन्होंने विभिन्न समुदायों से मुलाकात की और न्यायिक आयोग के गठन की घोषणा की। लेख बताता है कि राज्य सरकार और हाईकोर्ट के कथित पक्षपातपूर्ण रवैये ने हिंसा को बढ़ावा दिया, खासकर मेइती समुदाय को एसटी दर्जा देने के हाईकोर्ट के आदेश के कारण। मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं, जबकि अमित शाह ने शांति समिति बनाकर समाधान का प्रयास किया।
यह लेख मणिपुर में हालिया हिंसा का विश्लेषण करता है, जिसमें मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के मणिपुर हाईकोर्ट के आदेश और कूकी समुदाय के विरोध को मुख्य कारण बताया गया है। यह राज्य सरकार की नीतियों, मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की भूमिका और केंद्र-राज्य मतभेदों पर सवाल उठाता है। लेख में मणिपुर के जातीय संघर्षों के ऐतिहासिक संदर्भ और राजनीतिक आयामों पर भी प्रकाश डाला गया है।
यह लेख मणिपुर विधानसभा चुनाव 2022 की विशिष्टताओं का विश्लेषण करता है, जो अन्य राज्यों से भिन्न हैं। इसमें दलबदल, मुख्यमंत्री एन. वीरेन सिंह की राजनीतिक रणनीति, कांग्रेस का जनाधार बचाने की चुनौती, और AFSPA जैसे क्षेत्रीय मुद्दों पर राष्ट्रीय दलों की चुप्पी पर प्रकाश डाला गया है। लेख में उग्रवाद, सेना की कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट के दलबदल संबंधी निर्णयों के प्रभाव को भी रेखांकित किया गया है।
मणिपुर में भाजपा की पूर्ण बहुमत से सत्ता में वापसी ने पूर्वोत्तर में शांति की नई आशा जगाई है। भाजपा एकमात्र पार्टी थी जिसने चुनाव में आफ्प्सा हटाने का वादा नहीं किया, जबकि अन्य दलों ने किया। चुनाव परिणामों से पता चलता है कि मणिपुर के मतदाता शांति और मजबूत सरकार चाहते हैं, और उनके लिए आफ्प्सा का मुद्दा चुनावी प्राथमिकता नहीं है।
यह लेख नगालैंड शांति वार्ता में गतिरोध पर केंद्रित है, जिसका मुख्य कारण नेशनल सोसलिस्ट कांउसिल ऑफ नगालिम (आईएम) की अलग झंडे और संविधान की मांग है। नगालैंड विधानसभा ने केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर एनएससीएन(आईएम) से बातचीत करने का आग्रह किया है। लेख में 2015 के फ्रेमवर्क डील और 2021 की मोन जिले की फायरिंग जैसी घटनाओं का भी जिक्र है, जो शांति प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।
यह लेख पूर्वोत्तर भारत में शांति प्रक्रिया, विशेषकर यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम (उल्फा) के साथ हुए त्रिपक्षीय शांति समझौते पर केंद्रित है। यह समझौता 40 वर्षों की हिंसा के बाद एक नए युग की शुरुआत का प्रतीक है, जिसमें उल्फा के संस्थापक सदस्य भारतीय संवैधानिक ढांचे में शामिल होने पर सहमत हुए हैं। लेख में नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (एनएससीएन-आईएम) जैसे अन्य उग्रवादी समूहों और पूर्वोत्तर में हुए अन्य शांति समझौतों का भी उल्लेख है, साथ ही परेश बरुआ के नेतृत्व वाले उल्फा (स्वाधीन) गुट की चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला गया है।