यह लेख संविधान दिवस की 70वीं वर्षगांठ के अवसर पर संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और स्वतंत्रता पर बढ़ते खतरों पर केंद्रित है। इसमें जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने, पूर्वोत्तर राज्यों की चिंताओं, राज्यसभा को दरकिनार कर बिल पारित करने, आरटीआई संशोधन, और न्यायपालिका व सीबीआई की स्थिति जैसे कई विवादास्पद मुद्दों पर चर्चा की गई है। लेखक सरकार की कार्यप्रणाली और संवैधानिक मर्यादाओं के कथित उल्लंघन पर चिंता व्यक्त करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय और राज्य सूचना आयोगों में रिक्त पदों को भरने में केंद्र और राज्य सरकारों के लचर रवैये पर चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने सरकार को तीन हफ्ते के भीतर रिक्तियों और लंबित मामलों का विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है, चेतावनी दी है कि सूचना आयोग निष्क्रिय हो सकते हैं। लेख में आरटीआई अधिनियम को कमजोर करने के सरकारी प्रयासों और मुख्य सूचना आयुक्त की हालिया विवादास्पद नियुक्ति पर भी प्रकाश डाला गया है।
यह लेख केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) को कमजोर करने के केंद्र सरकार के प्रयासों पर प्रकाश डालता है। इसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा CIC में रिक्त पदों पर नियुक्तियों में देरी पर सरकार से जवाब मांगने, आरटीआई संशोधन बिल, 2018 के माध्यम से CIC को सरकारी नियंत्रण में लाने की कोशिशों और सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्यालू द्वारा इन प्रयासों का विरोध करने का उल्लेख है। लेख में प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री से संबंधित आरटीआई मामलों का भी जिक्र है, जो सरकार की मंशा को उजागर करते हैं।
यह लेख केंद्रीय और राज्य सूचना आयोगों में मुख्य सूचना आयुक्तों और सूचना आयुक्तों के रिक्त पदों के कारण आरटीआई आवेदनों के बढ़ते लंबित मामलों पर प्रकाश डालता है। यह तर्क देता है कि केंद्र और राज्य सरकारें जानबूझकर इन नियुक्तियों में देरी कर रही हैं, जिससे सूचना का अधिकार अधिनियम कमजोर हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद, सरकारें पारदर्शिता और जवाबदेही को कमजोर करते हुए, नियुक्तियों को टालने की अपनी नीति जारी रखे हुए हैं।
यह लेख 2019 के सूचना अधिकार (संशोधन) विधेयक की आलोचना करता है, जो केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) की स्वायत्तता को कमजोर करता है। लेखक का तर्क है कि सरकार ने सीआईसी के कार्यकाल, वेतन और भत्ते को नियंत्रित करने का अधिकार अपने हाथ में लेकर इसे एक सरकारी संस्था बना दिया है। यह संशोधन आरटीआई अधिनियम, 2005 के मूल उद्देश्य और सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता को खतरे में डालता है।
यह लेख 2019 में आरटीआई एक्ट में हुए संशोधनों की आलोचना करता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'पारदर्शिता' नीति के कारण आरटीआई की आवश्यकता कम हो गई है, लेकिन लेखक इस दावे को खारिज करते हुए संशोधनों के माध्यम से केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) की स्वतंत्रता को कमजोर करने पर प्रकाश डालता है। लेख में बताया गया है कि कैसे इन संशोधनों ने सीआईसी के संवैधानिक दर्जे और सूचना आयुक्तों के कार्यकाल व वेतन-भत्तों को केंद्र सरकार के नियंत्रण में ला दिया है, जिससे आरटीआई कानून का मूल उद्देश्य प्रभावित हुआ है।
यह लेख 2019 में सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के विवादों और उपयोग पर केंद्रित है। इसमें सुप्रीम कोर्ट की आरटीआई के कथित दुरुपयोग (ब्लैकमेल और वसूली) पर चिंता, सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में देरी, और आरटीआई अधिनियम (संशोधन) विधेयक 2019 के माध्यम से केंद्रीय सूचना आयोग की स्वायत्तता को कमजोर करने पर प्रकाश डाला गया है। लेख में ईवीएम और भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को आरटीआई के दायरे में लाने जैसे महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णयों का भी उल्लेख है।