यह लेख विवादित नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), 2019 के कार्यान्वयन में केंद्र सरकार की दिग्भ्रमित स्थिति का विश्लेषण करता है। यह बताता है कि कैसे सरकार सीएए के नियम बनाने में विफल रही है, जबकि नागरिकता कानून, 1955 का उपयोग करके पड़ोसी देशों के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान कर रही है। लेख असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के लंबित मुद्दों और सीएए के खिलाफ व्यापक विरोध और कानूनी चुनौतियों पर भी प्रकाश डालता है।
यह लेख सीबीआई की कार्यशैली पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर केंद्रित है, जिसमें एजेंसी को "पिंजरे में बंद तोता" कहा गया है। यह दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के संदर्भ में सीबीआई की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर सवाल उठाता है। लेख में सीबीआई की संवैधानिक वैधता पर ऐतिहासिक विवाद और जांच एजेंसियों के राजनीतिक दुरुपयोग के आरोपों पर भी चर्चा की गई है, जिसमें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर आपत्ति भी शामिल है।
संविधान दिवस की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक खींचतान बढ़ गई है। दोनों दल संविधान दिवस को अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के प्रस्तावना में 'समाजवाद' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्दों को हटाने की याचिका खारिज करने का फैसला भी शामिल है। यह लेख बताता है कि कैसे संविधान और इसके महत्वपूर्ण दिन राजनीतिक दलों के बीच टकराव का बिंदु बन गए हैं, खासकर 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद।
यह लेख संविधान दिवस की 70वीं वर्षगांठ के अवसर पर संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और स्वतंत्रता पर बढ़ते खतरों पर केंद्रित है। इसमें जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने, पूर्वोत्तर राज्यों की चिंताओं, राज्यसभा को दरकिनार कर बिल पारित करने, आरटीआई संशोधन, और न्यायपालिका व सीबीआई की स्थिति जैसे कई विवादास्पद मुद्दों पर चर्चा की गई है। लेखक सरकार की कार्यप्रणाली और संवैधानिक मर्यादाओं के कथित उल्लंघन पर चिंता व्यक्त करता है।
यह लेख जनरल विपिन रावत की चीफ ऑफ डिफेन्स स्टाफ (सीडीएस) के रूप में नियुक्ति और उनके राजनीतिक बयानों पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे उनकी नियुक्ति से पहले नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध प्रदर्शनों पर दिए गए बयान ने विवाद खड़ा किया, और कैसे उनकी सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाकर 65 वर्ष की गई। लेख में यह भी चर्चा की गई है कि रावत का कार्यकाल विवादों से घिरा रहा है और उनकी नियुक्तियों को भाजपा सरकार के हितों से जोड़ा गया है।
यह लेख मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता की आवश्यकता पर केंद्रित है। इसमें संसद में पेश किए गए प्राइवेट मेम्बर बिलों और सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई का उल्लेख है, जो नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र चयन समिति के गठन की मांग करते हैं। लेख न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सरकारी प्रभाव के आरोपों पर भी प्रकाश डालता है।