यह लेख म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली की अनिश्चितता पर केंद्रित है, जहाँ सैनिक सरकार ने आपातकाल और मार्शल लॉ लगाकर जनता के दमन को जारी रखा है। लेखक बताता है कि कैसे 2021 के तख्तापलट के बाद आंग सान सू की को जेल में डाल दिया गया और सेना ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ बाधित हुईं। अंतरराष्ट्रीय दबाव और प्रतिबंधों के बावजूद, सेना अपनी तानाशाही परंपरा को कायम रखे हुए है, जिससे देश में लोकतंत्र की वापसी की उम्मीदें धूमिल हो गई हैं।
यह लेख म्यांमार में सैन्य जुंटा द्वारा लोकतंत्र के दमन और मिन ओंग हलेंग के नेतृत्व में सत्ता पर कब्ज़े का विश्लेषण करता है। इसमें 2026 के छद्म चुनावों, आंग सान सू की की कैद, और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं पर प्रकाश डाला गया है। लेख बताता है कि कैसे सेना ने नागरिक अधिकारों को कुचला और विपक्ष को खत्म किया, जिससे देश में लोकतंत्र की बहाली की उम्मीदें धूमिल हो गईं।
म्यांमार में सैनिक तख्तापलट के एक साल बाद भी लोकतंत्र बहाली के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं। सेना प्रमुख मिन औंग हलांग ने नवंबर 2020 के चुनावों में धांधली का आरोप लगाकर आंग सान सू की की लोकतांत्रिक सरकार को अपदस्थ कर दिया और उन्हें जेल में डाल दिया, जबकि अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने चुनावों को निष्पक्ष बताया था। भारत, चीन और आसियान जैसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव के बावजूद, सेना सू की को रिहा करने या लोकतंत्र बहाल करने के लिए तैयार नहीं है, जिससे भारत की पूर्वोत्तर सीमा पर सुरक्षा और कूटनीतिक संबंध प्रभावित हो रहे हैं।
यह लेख 2025 में भारत के पड़ोसी देशों, विशेषकर म्यांमार, बांग्लादेश और नेपाल में हुई राजनीतिक उथल-पुथल का विश्लेषण करता है। इसमें म्यांमार में सैन्य जुंटा द्वारा कराए गए दिखावटी चुनावों, आंग सान सू की की नजरबंदी, बांग्लादेश में छात्र विद्रोह के बाद शेख हसीना का पलायन और नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता पर प्रकाश डाला गया है। लेखक भारत के लिए इन क्षेत्रीय घटनाओं के निहितार्थों और चीन के बढ़ते प्रभाव पर भी चर्चा करता है।
यह लेख म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के पलायन और हिंसा पर औंग सान सूकी की चुप्पी की आलोचना करता है। इसमें सूकी के नोबेल शांति पुरस्कार को वापस लेने की अंतरराष्ट्रीय मांगों और इस मुद्दे पर भारत, बांग्लादेश और चीन की भूमिका पर भी चर्चा की गई है। लेख में नोबेल पुरस्कारों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया गया है, खासकर उन विजेताओं के संदर्भ में जिन पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगे हैं।
यह लेख रोहिंग्या संकट पर केंद्रित है, जिसमें भारत पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव, म्यांमार की नेता औंग सान सू की की चुप्पी और चीन की कूटनीतिक चालों का विश्लेषण किया गया है। चीन इस संकट का उपयोग म्यांमार और बांग्लादेश में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करने और भारत को क्षेत्र से अलग-थलग करने के लिए कर रहा है। भारत ने रोहिंग्या को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया है, जबकि कुछ भारतीय राजनीतिक दल उनके समर्थन में हैं।
यह लेख रोहिंग्या शरणार्थी मुद्दे पर भारत सरकार और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरोधाभासी रुख का विश्लेषण करता है। केंद्र सरकार रोहिंग्या को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानती है, जबकि ममता बनर्जी इसे मानवीय मुद्दा बताती हैं और केंद्र पर राजनीति करने का आरोप लगाती हैं। लेख में बांग्लादेश की भूमिका और भारत के विभिन्न राज्यों जैसे असम, जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश में शरणार्थियों और घुसपैठियों से जुड़ी वोट बैंक की राजनीति पर भी प्रकाश डाला गया है।