यह लेख बताता है कि कैसे भारत के पड़ोसी देश, जैसे पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका, भारत की "पड़ोसी प्रथम" नीति के बावजूद चीन के करीब जा रहे हैं। इसमें भारत-चीन सीमा विवाद, अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध, भारत-पाकिस्तान तनाव (धारा 370 और कश्मीर), बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन और भारत-बांग्लादेश संबंधों में खटास जैसे विभिन्न भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर प्रकाश डाला गया है। लेख में पहलगाम आतंकी हमले और भारत की प्रतिक्रिया का भी उल्लेख है, जो क्षेत्रीय अस्थिरता को दर्शाता है।
यह लेख श्रीलंका के आगामी संसदीय चुनाव और महिंदा राजपक्षे के संभावित प्रधानमंत्री बनने के भारत-श्रीलंका संबंधों पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करता है। इसमें राजपक्षे की पिछली हार, भारत पर उनके आरोप, तमिल अल्पसंख्यकों के खिलाफ उनके अभियान और चीन व पाकिस्तान से उनकी बढ़ती नजदीकी पर प्रकाश डाला गया है। लेख में राष्ट्रपति सिरिसेना के सामने आंतरिक राजनीतिक चुनौतियों और तमिलों के लिए संघीय व्यवस्था की मांगों पर भी चर्चा की गई है।
यह लेख श्रीलंका में 5 अगस्त को होने वाले संसदीय चुनावों और भारत-श्रीलंका संबंधों पर उनके संभावित प्रभाव का विश्लेषण करता है। इसमें भारत-चीन तनाव के बीच चुनाव प्रचार में भारत और चीन से व्यापारिक संबंधों पर विरोधाभासी बयानों, रावण लीला के सरकारी आयोजन, और तमिल अल्पसंख्यकों के अधिकारों के मुद्दे पर राजपक्षा बंधुओं के रुख पर प्रकाश डाला गया है। लेख में 1987 के भारत-श्रीलंका समझौते और 13वें संविधान संशोधन के लंबित होने का भी उल्लेख है।
श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने भारत की खुफिया एजेंसी 'रॉ' द्वारा अपनी हत्या की कथित साजिश का खुलासा किया, जिसे बाद में उन्होंने ही 'गलत' बताया। इस घटना ने भारत-श्रीलंका संबंधों में जटिलताएँ पैदा कीं, जिसमें चीन की बढ़ती निकटता और तमिलनाडु का मुद्दा भी शामिल है। लेख इस पूरे प्रकरण को एक सुनियोजित राजनीतिक नाटक के रूप में देखता है, जिसका उद्देश्य आगामी चुनावों को प्रभावित करना हो सकता है।
यह लेख भारत-श्रीलंका संबंधों में तमिल मुद्दे के महत्व पर प्रकाश डालता है। श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने 13वें संविधान संशोधन को लागू करने की प्रतिबद्धता जताई है, जो तमिल अल्पसंख्यकों को सत्ता में भागीदारी का अधिकार देता है। भारत, विशेषकर विदेश मंत्री एस. जयशंकर, ने इस संशोधन के पूर्ण कार्यान्वयन और प्रांतीय चुनावों पर जोर दिया है, जबकि तमिल नेता इस वादे को लेकर संशय में हैं।
यह लेख भारत-श्रीलंका संबंधों के विवादास्पद पहलू पर केंद्रित है, जहाँ श्रीलंकाई राजनेता अपनी आंतरिक उथल-पुथल के लिए भारतीय खुफिया एजेंसियों को दोषी ठहराते हैं। इसमें 2019 के ईस्टर संडे हमलों के बाद श्रीलंका में उत्पन्न राजनीतिक अराजकता, राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना द्वारा भारतीय खुफिया अलर्ट की कथित उपेक्षा, और उसके बाद के आंतरिक राजनीतिक संघर्षों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। लेख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की श्रीलंका यात्रा और लिट्टे के इतिहास के संदर्भ में इन घटनाओं का भी उल्लेख है।
यह लेख भारत-श्रीलंका संबंधों में तमिल मुद्दे की जटिलता पर प्रकाश डालता है। यह 18 मई, 2009 को श्रीलंका सरकार द्वारा मनाए गए 'विजय दिवस' और तमिलों द्वारा मनाए गए 'मातम दिवस' के विरोधाभास को दर्शाता है, जो ईलम युद्ध की समाप्ति और लिट्टे के खात्मे का प्रतीक है। लेख में श्रीलंका में तमिलों की दुर्दशा, मानवाधिकार उल्लंघन और आतंकवाद रोक कानून (पीटीए) के तहत राजनीतिक कैदियों की निरंतर हिरासत पर प्रकाश डाला गया है, साथ ही भारत और तमिलनाडु की राजनीति पर इसके प्रभावों का भी उल्लेख है।
श्रीलंका में आगामी राष्ट्रपति चुनाव भारत-श्रीलंका संबंधों को प्रभावित करने वाले अप्रिय मुद्दों से घिरे हैं। वर्तमान राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, और महिंदा राजपक्षे के भाई गोटाबाया राजपक्षे एक मजबूत उम्मीदवार हैं। लेख बताता है कि कैसे विभिन्न श्रीलंकाई राजनीतिक दलों ने भारत को अपनी आंतरिक राजनीतिक उथल-पुथल और सत्ता संघर्ष में मोहरा बनाया है, खासकर तमिल मुद्दे और भारतीय खुफिया एजेंसी 'रॉ' से जुड़े आरोपों के संदर्भ में। भारत इस चुनाव पर करीब से नजर रख रहा है क्योंकि इसके परिणाम द्विपक्षीय संबंधों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकते हैं।
यह लेख भारत-श्रीलंका संबंधों में तमिल मुद्दे के महत्व पर प्रकाश डालता है। इसमें श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे के भारत दौरे और 13वें संविधान संशोधन को पूरी तरह लागू करने पर असहमति का जिक्र है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने भी प्रधानमंत्री मोदी से कच्छाथीवू द्वीप और श्रीलंकाई तमिलों के अधिकारों का मुद्दा उठाने का आग्रह किया था, जो भारत-श्रीलंका संबंधों में तमिल फैक्टर की जटिलता को दर्शाता है।
यह लेख श्रीलंका में 2018 के राजनीतिक संकट का विश्लेषण करता है, जिसमें राष्ट्रपति सिरिसेना द्वारा प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर महिंदा राजपक्षा को नियुक्त किया गया था। इसमें भारत और चीन की भूमिका पर भी प्रकाश डाला गया है, विशेष रूप से 'रॉ' पर सिरिसेना द्वारा लगाए गए हत्या की साजिश के आरोपों और दोनों देशों के श्रीलंका में प्रभाव की होड़ पर। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद विक्रमसिंघे की वापसी और राजपक्षा के इस्तीफे के साथ यह संकट समाप्त हुआ।
यह लेख श्रीलंका के नए राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षा के भारत दौरे और भारत-श्रीलंका संबंधों पर केंद्रित है। इसमें राजपक्षा परिवार के राजनीतिक प्रभाव, श्रीलंका की आंतरिक उथल-पुथल, चीन से बढ़ती नजदीकी और तमिल अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर भारत की भूमिका का विश्लेषण किया गया है। लेख में श्रीलंका की राजनीति में सिंहली राष्ट्रवाद और बौद्ध परंपरा के महत्व को भी रेखांकित किया गया है।
महिंदा राजपक्षा के भारत दौरे पर दिए गए बयान ने तमिल भावनाओं को आहत किया है, खासकर राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई पर तमिलनाडु में चल रही बहस के बीच। लेख श्रीलंका में लिट्टे के खिलाफ 2009 के सैन्य अभियान, मानवाधिकार उल्लंघन और भारत-श्रीलंका संबंधों पर इसके प्रभाव पर प्रकाश डालता है। यह तमिलनाडु की राजनीति में लिट्टे के भावनात्मक महत्व और विभिन्न भारतीय सरकारों की प्रतिक्रियाओं की भी पड़ताल करता है।
तमिलनाडु में लिट्टे, प्रभाकरन, राजीव गांधी हत्या और कांग्रेस–द्रमुक/टीवीके गठजोड़ को जोड़ते हुए यह लेख क्षेत्रीय राजनीति और भारत-श्रीलंका संबंधों की पृष्ठभूमि की समीक्षा करता है।