यह लेख दक्षिण भारत में भाजपा की स्वीकार्यता की कमी का विश्लेषण करता है, विशेषकर केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में 2021 के विधानसभा चुनावों के संदर्भ में। इसमें केरल में कथित 'नकद डील' विवाद, भाजपा की चुनावी हार और क्षेत्रीय दलों के प्रभुत्व पर प्रकाश डाला गया है। लक्षद्वीप में प्रशासक प्रफुल पटेल के विवादास्पद आदेशों के कारण स्थानीय विरोध का भी उल्लेख है, जो भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे के खिलाफ है।
यह लेख महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती के अवसर पर भाजपा सरकार द्वारा पंडित दीनदयाल उपाध्याय को एक बड़े राष्ट्रवादी विचारक के रूप में स्थापित करने के प्रयासों की आलोचना करता है। लेखक का तर्क है कि सरकार गांधी और शास्त्री के योगदान को कम करके आंक रही है, जबकि दीनदयाल उपाध्याय के हिंदुत्व-केंद्रित विचारों को जनता पर थोप रही है, जिससे भारतीयता की अवधारणा खतरे में है। लेख में दीनदयाल उपाध्याय की रहस्यमय मृत्यु की जांच न होने पर भी सवाल उठाया गया है।
यह लेख सुप्रीम कोर्ट में अल्पसंख्यक दर्जे की परिभाषा से संबंधित याचिकाओं पर केंद्रित है। केंद्र सरकार ने पहले इस मामले पर चुप्पी साधी, फिर राज्य सरकारों को अल्पसंख्यक दर्जा तय करने का अधिकार देने का हलफनामा दायर किया। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम की धारा 2(सी) को चुनौती दी है, जिसमें उन राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग की गई है जहां उनकी आबादी कम है।
यह लेख उन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा दिए जाने के कानूनी और संवैधानिक मुद्दे पर केंद्रित है जहाँ उनकी आबादी कम है। इसमें सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं, विशेषकर अश्विनी उपाध्याय और देवकी नंदन ठाकुर द्वारा, और कोर्ट के विभिन्न पीठों के रुख पर चर्चा की गई है, जिसमें अल्पसंख्यक पहचान को राज्य स्तर पर निर्धारित करने पर जोर दिया गया है। केंद्र सरकार के बदलते हलफनामों और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने का भी उल्लेख है।
यह लेख हिंदू बहुल राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने के मामले में केंद्र सरकार के टालमटोल रवैये पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी पर केंद्रित है। वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर केंद्र सरकार ने बार-बार अपना रुख बदला है, जबकि भाजपा मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाती रही है। लेख कश्मीरी पंडितों की असुरक्षा और सरकार के दोहरे मापदंडों पर भी प्रकाश डालता है।
यह लेख मणिपुर केंद्रीय यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. आद्या प्रसाद पांडेय के खिलाफ चल रहे छात्र-शिक्षक आंदोलन पर केंद्रित है। कुलपति पर वित्तीय हेराफेरी और कैंपस में हिंदुत्व एजेंडा थोपने का आरोप है, जिसके कारण चार महीने से शैक्षणिक गतिविधियां ठप्प हैं। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के हस्तक्षेप के बावजूद, कुलपति ने अपने पद पर बने रहने और मंत्रालय के आदेशों को चुनौती देने का प्रयास किया, जिससे स्थिति और बिगड़ गई।
यह लेख भाजपा और विपक्षी दलों के 'इंडिया' गठबंधन के बीच 'भारत' बनाम 'इंडिया' नाम को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद पर केंद्रित है। इसमें एनसीईआरटी द्वारा स्कूल की पाठ्यपुस्तकों से 'इंडिया' हटाकर 'भारत' करने के प्रस्ताव, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान और जी-20 शिखर सम्मेलन के निमंत्रण पत्र में 'प्रेसिडेंट ऑफ भारत' के इस्तेमाल जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई है। विपक्षी दल इसे भाजपा का हिन्दुत्व एजेंडा थोपने और इतिहास को बदलने का प्रयास मान रहे हैं।
यह लेख धर्म के राजनीतिकरण और सोशल मीडिया के माध्यम से सांप्रदायिक असहजता फैलाने पर केंद्रित है। यह भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति, तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों की बदलती रणनीति और पूर्वोत्तर, गोवा, तमिलनाडु, केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में हाल की घटनाओं का विश्लेषण करता है। लेखक सोशल मीडिया पर अफवाहों और नफरत भरे भाषणों के नकारात्मक प्रभाव पर भी प्रकाश डालता है।