यह लेख नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के विरोध प्रदर्शनों और सरकार की प्रतिक्रियाओं पर केंद्रित है। इसमें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सीएए विरोध प्रदर्शनकारियों के पोस्टर लगाने और संपत्ति क्षति वसूली के लिए अध्यादेश लाने के खिलाफ न्यायपालिका के हस्तक्षेप पर प्रकाश डाला गया है। लेख में भाजपा के एजेंडे और संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन पर भी सवाल उठाए गए हैं, साथ ही शाहीन बाग धरने और दिल्ली दंगों का भी उल्लेख है।
यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस दावे की आलोचना करता है कि भारत की वैश्विक चर्चा केवल सकारात्मक है। यह नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) की अधिसूचना पर अमेरिकी आलोचना, संयुक्त राष्ट्र महासभा में 'इस्लामोफोबिया' पर प्रस्ताव पारित होने में भारत की भूमिका, गुजरात में छात्रों पर हमले और चुनावी बांड जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं को उजागर करता है। लेखक तर्क देता है कि मोदी सरकार इन आलोचनाओं को आंतरिक मामला बताकर खारिज करती है और देशवासियों से छिपाती है।
यह लेख सीबीआई के 55 साल के इतिहास में अभूतपूर्व आंतरिक संघर्ष पर प्रकाश डालता है, जिसमें सीबीआई प्रमुख आलोक कुमार वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच रिश्वतखोरी के आरोप शामिल हैं। सरकार, सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) सभी इस विवाद के घेरे में हैं। यह लेख सीबीआई की स्वायत्तता, उसके संचालन के लिए कानूनी ढांचे की कमी और राजनीतिक हस्तक्षेप के मुद्दों पर गंभीर सवाल उठाता है।
यह लेख सीबीआई डायरेक्टर के चयन में केंद्र सरकार द्वारा अपनाई जा रही विवादास्पद प्रक्रिया पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि सरकार कैसे अंतरिम डायरेक्टरों की नियुक्ति करके चयन समिति और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को दरकिनार करती है, जिससे सीबीआई की स्वतंत्रता और संवैधानिक आधार पर सवाल उठते हैं। लेख 2018 के आलोक वर्मा-राकेश अस्थाना विवाद और गुवाहाटी हाईकोर्ट के सीबीआई को असंवैधानिक घोषित करने के फैसले का भी उल्लेख करता है।
यह लेख सीबीआई में आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच हुए हाईप्रोफाइल विवाद और सरकार की भूमिका पर केंद्रित है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप, केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की निगरानी और अयोध्या विवाद पर सुनवाई टालने के फैसले पर भाजपा की प्रतिक्रिया का विश्लेषण किया गया है। लेखक संवैधानिक संस्थाओं पर सरकारी नियंत्रण और उनकी स्वतंत्रता के महत्व पर प्रकाश डालता है।
यह लेख सीबीआई की संवैधानिक बनावट पर सवाल उठाता है, विशेषकर कोलकाता पुलिस के साथ उसके टकराव के संदर्भ में। लेखक का तर्क है कि सीबीआई के पास संविधान सम्मत अधिकार नहीं हैं, जिससे वह केंद्र सरकार के एक उपकरण के रूप में कार्य करती है और संघीय व्यवस्था में तनाव पैदा करती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी सीबीआई को "पिंजड़े का तोता" कहा था, और गुवाहाटी हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित किया था, जिससे इसकी कानूनी स्थिति अधर में लटकी हुई है।