कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणामों के तुरंत बाद सीबीआई निदेशक के चयन पर लेख केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने प्रवीण सूद को सीबीआई प्रमुख नियुक्त किया, जबकि विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने प्रक्रिया और नामों पर आपत्ति जताई। लेख में केंद्र सरकार द्वारा सीबीआई, ईडी और अन्य केंद्रीय एजेंसियों में नियुक्तियों के राजनीतिकरण और सुप्रीम कोर्ट के साथ लगातार टकराव पर प्रकाश डाला गया है।
यह लेख सीबीआई के 55 साल के इतिहास में अभूतपूर्व आंतरिक संघर्ष पर प्रकाश डालता है, जिसमें सीबीआई प्रमुख आलोक कुमार वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच रिश्वतखोरी के आरोप शामिल हैं। सरकार, सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) सभी इस विवाद के घेरे में हैं। यह लेख सीबीआई की स्वायत्तता, उसके संचालन के लिए कानूनी ढांचे की कमी और राजनीतिक हस्तक्षेप के मुद्दों पर गंभीर सवाल उठाता है।
यह लेख सीबीआई की कार्यशैली पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर केंद्रित है, जिसमें एजेंसी को "पिंजरे में बंद तोता" कहा गया है। यह दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के संदर्भ में सीबीआई की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर सवाल उठाता है। लेख में सीबीआई की संवैधानिक वैधता पर ऐतिहासिक विवाद और जांच एजेंसियों के राजनीतिक दुरुपयोग के आरोपों पर भी चर्चा की गई है, जिसमें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर आपत्ति भी शामिल है।
यह लेख सीबीआई डायरेक्टर के चयन में केंद्र सरकार द्वारा अपनाई जा रही विवादास्पद प्रक्रिया पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि सरकार कैसे अंतरिम डायरेक्टरों की नियुक्ति करके चयन समिति और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को दरकिनार करती है, जिससे सीबीआई की स्वतंत्रता और संवैधानिक आधार पर सवाल उठते हैं। लेख 2018 के आलोक वर्मा-राकेश अस्थाना विवाद और गुवाहाटी हाईकोर्ट के सीबीआई को असंवैधानिक घोषित करने के फैसले का भी उल्लेख करता है।
यह लेख सीबीआई में आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच हुए हाईप्रोफाइल विवाद और सरकार की भूमिका पर केंद्रित है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप, केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की निगरानी और अयोध्या विवाद पर सुनवाई टालने के फैसले पर भाजपा की प्रतिक्रिया का विश्लेषण किया गया है। लेखक संवैधानिक संस्थाओं पर सरकारी नियंत्रण और उनकी स्वतंत्रता के महत्व पर प्रकाश डालता है।
यह लेख सीबीआई की संवैधानिक बनावट पर सवाल उठाता है, विशेषकर कोलकाता पुलिस के साथ उसके टकराव के संदर्भ में। लेखक का तर्क है कि सीबीआई के पास संविधान सम्मत अधिकार नहीं हैं, जिससे वह केंद्र सरकार के एक उपकरण के रूप में कार्य करती है और संघीय व्यवस्था में तनाव पैदा करती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी सीबीआई को "पिंजड़े का तोता" कहा था, और गुवाहाटी हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित किया था, जिससे इसकी कानूनी स्थिति अधर में लटकी हुई है।
यह लेख राकेश अस्थाना को दिल्ली पुलिस कमिश्नर नियुक्त करने के केंद्र सरकार के फैसले पर केंद्रित है। यह नियुक्ति उनके रिटायरमेंट से चार दिन पहले हुई थी और सुप्रीम कोर्ट के मानदंडों का उल्लंघन करती है, जिसने पहले सीबीआई निदेशक पद के लिए उनकी दावेदारी खारिज कर दी थी। लेख में केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच शक्ति संघर्ष और अस्थाना के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कथित करीबी संबंधों पर भी प्रकाश डाला गया है।
केंद्र सरकार द्वारा ईडी प्रमुख एस. के. मिश्रा को तीसरी बार सेवा विस्तार दिए जाने पर नया विवाद खड़ा हो गया है, जबकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मामले में केंद्र को और विस्तार न देने की सलाह दे चुका था। सरकार ने अध्यादेश लाकर कार्यकाल बढ़ाया, जिसकी वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। यह विवाद ऐसे समय में गहराया है जब ईडी की कार्रवाई गैर-भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और नेताओं के खिलाफ तेज हो गई है, जिससे राजनीतिक घमासान छिड़ा हुआ है।
गुलाम नबी आजाद ने स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार धारा 370 को वापस नहीं लेगी, जिससे इसकी वापसी की लड़ाई कमजोर पड़ रही है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल करने और विधानसभा चुनाव कराने की मांग पर जोर दिया। लेख में नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी जैसे अन्य कश्मीरी दलों के बीच भी धारा 370 की वापसी और परिसीमन जैसे मुद्दों पर मतभेद उजागर किए गए हैं, जबकि सभी दल सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
यह लेख सीबीआई की राजनीतिक और संवैधानिक चुनौतियों पर प्रकाश डालता है, विशेष रूप से विभिन्न राज्यों द्वारा भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए दी गई सामान्य सहमति वापस लेने के संदर्भ में। यह दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट (डीएसपीईए), 1946 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाता है, जिस पर गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 2013 में सवाल उठाया था। लेख में मेघालय, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों के उदाहरण दिए गए हैं जिन्होंने सीबीआई को जांच से रोका है, और सीबीआई निदेशक के कार्यकाल विस्तार पर भी चर्चा की गई है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा की जांच रिपोर्ट में कहा है कि राज्य में 'शासक का कानून' चल रहा है और तृणमूल कांग्रेस के मंत्रियों व नेताओं को दोषी ठहराया है। कलकता हाईकोर्ट ने इस रिपोर्ट पर राज्य सरकार को फटकार लगाई है और सीबीआई जांच तथा फास्ट-ट्रैक कोर्ट में सुनवाई की सिफारिश की है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा के बीच इस मुद्दे पर राजनीतिक घमासान जारी है, जिसमें राज्यपाल और चुनाव आयोग भी शामिल हैं।