यह लेख 27 जनवरी, 2020 को केंद्र सरकार, असम सरकार और विभिन्न बोडो उग्रवादी गुटों के बीच हुए ऐतिहासिक बोडो शांति समझौते पर केंद्रित है। यह असम में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध प्रदर्शनों के बीच इस समझौते के महत्व पर प्रकाश डालता है और सुझाव देता है कि उल्फा और नगा गुटों जैसे अन्य विद्रोही समूहों के लिए भी ऐसी ही शांति पहल की जानी चाहिए। लेख बोडो विद्रोह के इतिहास, पिछले समझौतों और सभी गुटों को मुख्यधारा में लाने की चुनौतियों पर भी चर्चा करता है।
यह लेख नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) से जुड़े विवादों का विश्लेषण करता है, विशेष रूप से असम के संदर्भ में। यह बताता है कि कैसे कोरोना महामारी ने विरोध प्रदर्शनों को धीमा कर दिया, लेकिन कानून के विवादास्पद प्रावधानों और असम समझौते के उपबंध-6 के कार्यान्वयन में देरी के कारण तनाव बना हुआ है। लेख डॉ. कफील खान जैसे सीएए विरोधी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और अदालती मामलों पर भी प्रकाश डालता है, साथ ही असम में 2021 के चुनावों से पहले केंद्र सरकार के सामने आने वाली चुनौतियों पर भी चर्चा करता है।
केंद्र सरकार ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) 2019 के नियमों को अधिसूचित कर दिया है, जिससे यह आगामी चुनावों में भाजपा के लिए एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन गया है। यह लेख सीएए के राजनीतिक निहितार्थों, विशेषकर पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय को लक्षित करने और गैर-भाजपा शासित राज्यों, विपक्षी दलों तथा सुप्रीम कोर्ट में इसके विरोध पर प्रकाश डालता है। सीएए के प्रावधानों और इसके कारण हुए ऐतिहासिक विवादों का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें भाजपा द्वारा वोटों के ध्रुवीकरण के उद्देश्य पर जोर दिया गया है।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने आगामी आम चुनाव से पहले नागरिकता संशोधन एक्ट (सीएए) के नियम जारी करने की घोषणा की है, जिससे लाभार्थियों को नागरिकता प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू हो सकेगी। यह लेख बताता है कि कैसे भाजपा के केंद्रीय मंत्री पश्चिम बंगाल के मतुआ समुदाय को लक्षित कर रहे हैं, जबकि गैर-भाजपा शासित राज्य जैसे तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल इसका विरोध कर रहे हैं। यह सीएए के प्रावधानों, इसके विवादास्पद इतिहास और विभिन्न राज्यों में इसकी राजनीतिक प्रतिक्रियाओं पर भी प्रकाश डालता है।
नागरिक संशोधन एक्ट (सीएए) 2019 को पारित हुए तीन साल हो गए हैं, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा नियम न बनाए जाने के कारण यह अभी तक लागू नहीं हो पाया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसके नियमों को तय करने के लिए सातवीं बार 6 महीने का अतिरिक्त समय मांगा है। इस एक्ट का विरोध पूरे देश में हुआ, खासकर मुसलमानों को इसके दायरे से बाहर रखने के कारण, और यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है।
यह लेख विवादित नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), 2019 के कार्यान्वयन में केंद्र सरकार की दिग्भ्रमित स्थिति का विश्लेषण करता है। यह बताता है कि कैसे सरकार सीएए के नियम बनाने में विफल रही है, जबकि नागरिकता कानून, 1955 का उपयोग करके पड़ोसी देशों के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान कर रही है। लेख असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के लंबित मुद्दों और सीएए के खिलाफ व्यापक विरोध और कानूनी चुनौतियों पर भी प्रकाश डालता है।
नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) 2019 के लागू होने के बाद राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर असम में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। वर्तमान एनआरसी कोऑर्डिनेटर हितेश देव सरमा ने अपने पूर्ववर्ती प्रतीक हाजेला पर अयोग्य व्यक्तियों को सूची में शामिल करने और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने का आरोप लगाते हुए पुलिस शिकायत दर्ज कराई है। यह विवाद सुप्रीम कोर्ट, असम सरकार और एनआरसी कोऑर्डिनेटर के बीच रस्साकसी को दर्शाता है, जिसमें सीएए विरोधी समूह भी हितेश देव सरमा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में शिकायत कर रहे हैं।
यह लेख नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के विरोध प्रदर्शनों और सरकार की प्रतिक्रियाओं पर केंद्रित है। इसमें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सीएए विरोध प्रदर्शनकारियों के पोस्टर लगाने और संपत्ति क्षति वसूली के लिए अध्यादेश लाने के खिलाफ न्यायपालिका के हस्तक्षेप पर प्रकाश डाला गया है। लेख में भाजपा के एजेंडे और संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन पर भी सवाल उठाए गए हैं, साथ ही शाहीन बाग धरने और दिल्ली दंगों का भी उल्लेख है।
यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस दावे की आलोचना करता है कि भारत की वैश्विक चर्चा केवल सकारात्मक है। यह नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) की अधिसूचना पर अमेरिकी आलोचना, संयुक्त राष्ट्र महासभा में 'इस्लामोफोबिया' पर प्रस्ताव पारित होने में भारत की भूमिका, गुजरात में छात्रों पर हमले और चुनावी बांड जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं को उजागर करता है। लेखक तर्क देता है कि मोदी सरकार इन आलोचनाओं को आंतरिक मामला बताकर खारिज करती है और देशवासियों से छिपाती है।
यह लेख जनरल विपिन रावत की चीफ ऑफ डिफेन्स स्टाफ (सीडीएस) के रूप में नियुक्ति और उनके राजनीतिक बयानों पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे उनकी नियुक्ति से पहले नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध प्रदर्शनों पर दिए गए बयान ने विवाद खड़ा किया, और कैसे उनकी सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाकर 65 वर्ष की गई। लेख में यह भी चर्चा की गई है कि रावत का कार्यकाल विवादों से घिरा रहा है और उनकी नियुक्तियों को भाजपा सरकार के हितों से जोड़ा गया है।
यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेतृत्व की नीतियों का विरोध करने वालों के खिलाफ यूएपीए और देशद्रोह/राजद्रोह कानूनों के कथित दुरुपयोग की पड़ताल करता है। यह भीमा कोरेगांव हिंसा और नागरिकता (संशोधन) कानून के विरोध से जुड़े कई बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के मामलों पर प्रकाश डालता है, जिन्हें जमानत से वंचित किया गया है। लेख अदालतों की असहज स्थिति और सरकार की आलोचना को देशद्रोह के बराबर मानने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाता है।
यह लेख 2020 की शुरुआत में एनआरसी और सीएए को लेकर चल रहे विवादों पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे सीएए धार्मिक आधार पर गैर-मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता देता है, मुसलमानों को छोड़कर, जिससे देशव्यापी विरोध हुआ। केंद्र सरकार ने इन विरोधों को अनदेखा करते हुए एनपीआर को भी मंजूरी दी, जिससे जनता में भ्रम और संघीय व्यवस्था में तनाव बढ़ा।
यह लेख पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (दीदी) के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार और केंद्र की भाजपा सरकार के बीच बढ़ते तनाव का विश्लेषण करता है, खासकर कोलकाता नगर निगम और अन्य नगरपालिकाओं के आगामी चुनावों के संदर्भ में। राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर चिंता व्यक्त की है और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की है। लेख में एनआरसी और सीएए जैसे मुद्दों पर दोनों सरकारों के बीच मतभेद और अतीत में चुनाव के दौरान हुई हिंसा का भी जिक्र है।
चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर संसद में बीएलओ की मौतों और नागरिकता सत्यापन के अधिकार को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। विपक्ष और सरकार आमने-सामने हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट में भी एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाएं लंबित हैं। यह विवाद नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) से भी जुड़ा है, जिससे मामला और जटिल हो गया है।