दार्जीलिंग में गोरखालैंड की मांग को लेकर 104 दिनों से चल रहा बंद केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के आश्वासन पर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) ने समाप्त कर दिया है। हालांकि, बंद समाप्त होने के बाद भी दार्जीलिंग में शांति और सुव्यवस्था कायम नहीं हो पाई है, और भाजपा तथा तृणमूल कांग्रेस के बीच गोरखालैंड मुद्दे पर गतिरोध बना हुआ है। बिमल गुरुंग के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी है, और केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित त्रिपक्षीय वार्ता भी मुश्किल लग रही है।
दार्जीलिंग और डूआर्स में अलग गोरखालैंड राज्य के लिए अनिश्चितकालीन बंद जारी है, जिसका नेतृत्व गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) कर रहा है। लेख केंद्र की भाजपा और राज्य की तृणमूल कांग्रेस सरकारों की राजनीतिक अवसरवादिता पर प्रकाश डालता है, जो चुनावी लाभ के लिए गोरखालैंड के वादे करती हैं लेकिन आंदोलन को हल करने के लिए बातचीत से बचती हैं। यह आंदोलन की गंभीरता और नेताओं की चुप्पी के कारण बढ़ती हिंसा को दर्शाता है।
दार्जीलिंग में गोरखालैंड राज्य आंदोलन अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता खो रहा है, क्योंकि हाल के चुनावों में उम्मीदवारों ने इस मुद्दे को अपने एजेंडे से हटा दिया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को कमजोर करके और नेताओं को विभाजित करके आंदोलन को सफलतापूर्वक बैकफुट पर धकेल दिया है। इससे गोरखालैंड के भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं, क्योंकि बाहरी हस्तक्षेप और आंतरिक फूट ने गोरखा राजनीतिक एकता को खंडित कर दिया है।
यह लेख गोरखालैंड राज्य आंदोलन के उतार-चढ़ाव का विश्लेषण करता है, विशेषकर सुभाष घीसिंग और बिमल गुरूंगा के नेतृत्व में हुए बदलावों पर केंद्रित है। यह आंदोलन के वर्तमान स्थिति, जीजेएम में फूट, और पश्चिम बंगाल सरकार के रुख पर प्रकाश डालता है। लेख केंद्र और राज्य सरकार के बीच मतभेदों और आंदोलन के भविष्य की अनिश्चितता को भी दर्शाता है।
यह लेख 2019 के लोकसभा चुनावों में गोरखालैंड और नगालैंड के मुद्दों के चुनावी प्रभाव का विश्लेषण करता है। यह बताता है कि कैसे भाजपा और तृणमूल कांग्रेस जैसे प्रमुख राजनीतिक दल इन क्षेत्रीय स्वायत्तता की मांगों को संबोधित करने में विफल रहे हैं, जिससे मतदाताओं के बीच असंतोष पैदा हुआ है। लेख में दार्जिलिंग और नगालैंड में विभिन्न राजनीतिक खिलाड़ियों की रणनीतियों और उनके संभावित चुनावी परिणामों पर प्रकाश डाला गया है।
यह लेख गोरखालैंड राज्य आंदोलन के कमजोर पड़ने का विश्लेषण करता है। इसमें भाजपा सांसद राजू बिस्टा के बदलते रुख, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) की भूमिका, और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) व भाजपा की राजनीतिक रणनीतियों पर प्रकाश डाला गया है। लेख बताता है कि कैसे राष्ट्रीय दल इस आंदोलन का चुनावी लाभ उठा रहे हैं, जिससे गोरखालैंड की मांग हाशिए पर जा रही है।
यह लेख गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) द्वारा चलाए जा रहे हिंसक आंदोलन और केंद्र व राज्य सरकार के साथ उनकी वार्ताओं का विश्लेषण करता है। यह आंदोलन में गुटबाजी, मदन तमांग की हत्या, और जीजेएम के अव्यावहारिक प्रस्तावों पर प्रकाश डालता है, यह सुझाव देते हुए कि आंदोलन अपने पतन की ओर बढ़ रहा है। लेख में नागालैंड और असम के अन्य अलगाववादी आंदोलनों का भी उल्लेख है।