संविधान दिवस की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक खींचतान बढ़ गई है। दोनों दल संविधान दिवस को अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के प्रस्तावना में 'समाजवाद' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्दों को हटाने की याचिका खारिज करने का फैसला भी शामिल है। यह लेख बताता है कि कैसे संविधान और इसके महत्वपूर्ण दिन राजनीतिक दलों के बीच टकराव का बिंदु बन गए हैं, खासकर 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद।
भारत में धर्मान्तरण विरोधी कानूनों को लेकर कानूनी और राजनीतिक विवाद बढ़ रहा है। हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने जबरन या प्रलोभन देकर धर्मान्तरण रोकने के लिए कानून बनाए हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर सुनवाई कर रहा है, खासकर अनुसूचित जाति के दर्जे पर इसके प्रभाव को लेकर। केंद्र सरकार ने दलितों के धर्मान्तरण के बाद उनके एससी दर्जे पर विचार करने के लिए एक आयोग का गठन किया है, और सुप्रीम कोर्ट ने जबरन धर्मान्तरण को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा बताया है।
यह लेख 1975 के आपातकाल की "मीठी और कड़वी यादों" का विश्लेषण करता है। लेखक जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन, आपातकाल के दौरान की घटनाओं और उसके बाद भारतीय राजनीति में आए बदलावों पर प्रकाश डालता है, जिसमें भाजपा का उदय भी शामिल है। लेख आपातकाल के दौरान अनुशासन और व्यवस्था में सुधार को याद करने वाले आम लोगों की धारणाओं की तुलना प्रेस सेंसरशिप और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी जैसे कड़वे अनुभवों से करता है, और वर्तमान मोदी सरकार की नीतियों से समानताएं खींचता है।
यह लेख भाजपा सरकार द्वारा महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू को चुनावी राजनीति में घसीटने की आलोचना करता है। लेखक बताता है कि कैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांधी के 150वें जयंती समारोह और दांडी मार्च की वर्षगांठ पर परिवारवाद के मुद्दे को उठाया, और नेहरू को भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट न मिलने के लिए दोषी ठहराया। लेख में कहा गया है कि यह सब कांग्रेस को बदनाम करने और चुनावी लाभ लेने के लिए किया जा रहा है, जिससे ऐतिहासिक हस्तियों का अपमान हो रहा है।
यह लेख महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती के अवसर पर भाजपा सरकार द्वारा पंडित दीनदयाल उपाध्याय को एक बड़े राष्ट्रवादी विचारक के रूप में स्थापित करने के प्रयासों की आलोचना करता है। लेखक का तर्क है कि सरकार गांधी और शास्त्री के योगदान को कम करके आंक रही है, जबकि दीनदयाल उपाध्याय के हिंदुत्व-केंद्रित विचारों को जनता पर थोप रही है, जिससे भारतीयता की अवधारणा खतरे में है। लेख में दीनदयाल उपाध्याय की रहस्यमय मृत्यु की जांच न होने पर भी सवाल उठाया गया है।
यह लेख तसलीमा नसरीन के भारत में वीज़ा मुद्दों और उनके साथ हुए व्यवहार पर केंद्रित है, विशेषकर 'अतिथि देवो भव' परंपरा के विपरीत। लेखक तर्क देता है कि भारतीय राजनीतिक दल, वोट बैंक की राजनीति और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के कारण, तसलीमा के साथ बुरा व्यवहार कर रहे हैं, जिससे भारत की 'बीमार मानसिकता' और पाखंड उजागर होता है। इसमें पश्चिम बंगाल और केंद्र सरकारों की भूमिका, मुस्लिम कट्टरपंथियों के दबाव और भाजपा के अवसरवादी समर्थन पर प्रकाश डाला गया है।