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युवाओं के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत

खंड - एक(1)

अभी हमारे देश, समाज की नसों में जहर घोलनेवाली सबसे ज्यादा गंभीर और खतरनाक समस्या है, युवाओं में बढ़ती नशे की लत । चिंताजनक स्थिति का कारण है, बच्चों का नशे की गिरफ्त में फंसना, जो किशोर और युवा की उम्र तक अपने परिवार और समाज के लिए अभिशाप बन जाते हैं । अभी कल के भविष्य को आज ही गर्त में धकेलने के लिए नशीली दवाओं के अवैध धंधेबाजों को सिर्फ दोषी नहीं ठहराया जा सकता । इसके लिए मां-बाप, पारिवारिक माहौल और शिक्षण संस्थान भी उतने ही दोषी हैं । युवाओं को आकाश में उड़ने का सब्जबग दिखानेवाले चाय-गुटका की दुकानों की तरह पसरे कोचिंग संस्थान युवाओं के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं । आईआईटी, एनआईटी जैसे शीर्ष राष्ट्रीय इंजीनियरिंग संस्थानों में क्वालिफाई कराने की ‘गारंटी’ देनेवाले टॉप कोचिंग कारोबारी आकाश और एलेन के अंदर कोटा में जाने का अवसर मिला । कोटा के विभिन्न कोचिंग केंद्रों से बच्चों की आत्महत्या और नशे के शिकार की रिपोर्ट प्रायः मिलती रहती है । इन केंद्रों में भीड़ पढ़ाई होती है । कुकुरमुत्ते की तरह फैले ये कोचिंग संस्थान विज्ञापनों के जरिए रेला जुटाते हैं और अपने तरीके से कोर्स चलाते हैं । अगर कोई बच्चा नहीं समझा और समझने के लिए भरपूर मेहनत करने के बावजूद परीक्षा में सफल नहीं हो पाया तो उस बच्चे की हताशा कोई शेयर नहीं करता । ज्यादातर निम्न और मध्य आय वर्ग के लोग अपने बच्चों को कोचिंग में भेजते हैं । कोचिंग संस्थानों के बड़े-बड़े झांसे में आकर वे अपनी गाढ़ी कमाई और बचत का पैसा लगाते हैं, इसलिए अपने बच्चों के प्रति कुछ ज्यादा ही उम्मीदें पाल लेते हैं । बच्चा कैसे पढ़ता है, कैसे रहता है, कैसे खाता है, इसकी चिंता किसी को नहीं । सराय, धर्मशाला की तरह होस्टल और मेस चलता है । बच्चा सफल हुआ तो मां-बाप और संस्थान दोनों उछाल देते हैं । पिछड़ा तो दोनों तरफ से बच्चे पर हमले होते हैं, वह किशोर अपनी हताशा और बौखलाहट से निजात पाने के लिए नशे में गम भुलाता है, फिर आत्महत्या की ओर प्रवृत्त होता है । कोटा में आकाश और एलेन दोनों ही कोचिंग केंद्रों के स्थानीय डायरेक्टरों का कहना है कि छात्रों के अभिभावक कुछ ज्यादा ही आशावान हो जाते हैं और उसके लिए अपने बच्चों पर दबाव बनाते हैं । उतना ही नहीं, पैसे देने के बाद अभिभावक मानकर चलते हैं कि अब तो उनके बच्चों को आईआईटी क्वालिफाई करवाना कोचिंग वालों की जिम्मेदारी है ।

यह तो हुई कोचिंग की बात, जिनका असली मकसद नयी पीढ़ी का कैरियर व्यवसाय चलाना है । इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है, शिक्षण संस्थानों में बच्चों और किशोरों में बढ़ती नशे की लत । इसका निदान सरकार, सामाजिक और मनोरोग काउंसिलिंग केंद्रों के पास नहीं है । इस जटिल समस्या का समाधान सिर्फ मां-बाप और स्कूल शिक्षक एक-दूसरे पर दोषारोपण के बजाए आपस में समन्वय से निकाल सकते हैं ।

जिस वक्त मैं लिखने की तैयारी में था, उस समय संसद का बजट सत्र चल रहा था 17वीं लोकसभा का पहला सत्र । केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्रालय की संसद में पेश रिपोर्ट के अनुसार देश में 16 करोड़ लोग शराब का और 3.1 करोड़ लोग गांजा का सेवन करते हैं । सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्री थावरचंद गहलोत ने राज्यसभा में उठाए गए सवाल के जवाब में कहा कि गांजा, हसीस और ब्राउन सुगर का सेवन करनेवाले ज्यादातर किशोर उम्र के लड़के हैं। इस संबंध में किए गए एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए मंत्री ने कहा कि 10 से 75 वष की उम्र के लोगों में नशे की लत पायी गयी । मंत्रालय की रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जतायी गयी कि बच्चे और किशोर ज्यादा नशे का सेवन करनेवाले मिले । ये लोग युवा होते-होते इस तरह गांजा, हेरोइन, अफीम की लत की चपेट में आ जाते हैं कि हर समय उनको इसकी जरूरत पड़ती है । सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्रालय ने राष्ट्रीय स्तर पर घर-घर और स्कूल -कॉलेज में भी जाकर सर्वेक्षण के आधार पर 2018 के अंत में यह रिपोर्ट तैयार की। यह रिपोर्ट औसतन है । कोई जरूरी नहीं कि सर्वेक्षण करनेवाले हर घर में या हर स्कूल-कॉलेज में गए हों । ऐसा भी नहीं माना जा सकता कि सबों ने नशे की गोलियां और धुआं उड़ानेवाले गांजा, स्मैक, सुई लेने की बात स्वीकार कर ली हो । शराब पीना तो लोगों की नियमित दिनचर्या में शामिल है । लेकिन नशा सेवन के सभी पहलुओं के एक साथ सर्वेक्षण से राष्ट्रीय औसत प्रवृत्ति का मोटामोटी जायजा मिल जाता है ।

यह अहम सवाल एक ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए भाजपा सदस्य आर. के. सिन्हा ने उठाया । उनके साथ-साथ कई अन्य सदस्यों ने भी इस सामाजिक संकट पर चिंता जतायी । केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री गहलोत ने राज्य सभा को बताया कि तकरीबन 3.1 करोड़ गांजा, स्मैक नशेड़ी युवाओं और उससे भी ज्यादा किशोरों की हालत ऐसी देखने को मिली कि उन्हें तत्काल मानसिक चिकित्सा तथा काउंसिलिंग जैसी सहायता की जरूरत है । अध्ययनकर्ताओं ने अपने सैंपल सर्वेक्षण में लगभग 6000 स्कूल छात्रों और 9000 कॉलेज छात्रों के नमूने लिये । अध्ययन के पहले चरण की यह रिपोर्ट है, जिसमें घर-घर सर्वेक्षण में तो सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कवर किया गया । लेकिन स्कूल कॉलेजों में फिलहाल दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु जैसे बड़े व्यावसायिक और शैक्षणिक, मेट्रो शहरों का अभी नहीं किया गया है । स्कूल कॉलेज छात्रों के आंकड़े में श्रीनगर, चंडीगढ़, लखनऊ और रांची को शुरूआती दौर में लिया गया है ।

लोकसभा में ऐसे मामले कोई सदस्य नहीं उठाते । उन सदस्यों को और उनकी पार्टियों को सिर्फ राजनीतिक विषयों और युवाओं को राजनीति में लाने से मतलब है । 2019 लोकसभा चुनाव में बड़ी संख्या में युवाओं के जीतने की वाववाही महिला उम्मीदवारों की तरह हुई । भाजपा ने इसका ज्यादा श्रेय लिया । लेकिन भाजपा समेत किसी पार्टी को इससे मतलब नहीं है कि जिन युवाओं की पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीतिक दांव खेलने की नहीं है, उनका जीवनयापन कैसे होगा और नशे की लत वाले युवाओं तथा उनके परिवारजनों पर क्या गुजर रही है । घर से नशा लेकर स्कूल कॉलेज पहुंचनेवाले छात्रों की संख्या अपेक्षाकृत कम है । पारिवारिक कलह, मां-बाप के बीच तनावपूर्ण संबंध और दोनों के नौकरी में होने, अलग-अलग रहने के कारण बच्चों के लिए समय न निकाल पाने जैसे प्रतिकूल माहौल बच्चों को नशे की ओर ले जाने में सहायक होते हैं । स्कूल कॉलेज के शिक्षकों का बच्चों के साथ स्नेहपूर्ण बर्ताव और उनके प्रति संवेदनशील होने की ज्यादा अपेक्षा की बात तो बाद में आती है । प्रारंभिक परवरिश और बचपन से लेकर युवा होने तक का पाठ सिखाने की जिम्मेदारी निभाने में मां-बाप ही पहले असफल साबित हो रहे हैं ।

जुलाई के अंत में राज्यसभा में ही राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी जहां देश भर के बच्चे पढ़ते हैं । सदस्यों ने दलगत भावनाओं से ऊपर उठकर इस सोचनीय मुद्दे पर चर्चा की। कांग्रेस के टी. सुब्बाराम रेड्डी ने दिल्ली का रोंगटे खड़े करनेवाला आंकड़ा बताया कि 25000 बच्चे नशे की लत के शिकार हैं । उन्होंने कहा कि 83 प्रतिशत नशेड़ी शिक्षित हैं और पूरा उत्तर बिहार में नशे का अवैध व्यापार मासूम बच्चों की जिंदगी बर्बाद कर रहा है । चर्चा में यह बात भी सामने आयी कि राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने हाल में इस समस्या पर विचार किया । ऐसे बच्चे पूर्ण युवा होने तक कहां जाएंगे और अपने परिवार, समाज, देश के किस काम के लायक रह जाएंगे, यह गहन विचार का विषय है ।

सांसद आर. के. सिन्हा ने कहा कि गांवों तक भी नशे की लत पहुंची हुई है और बड़ी संख्या में बच्चे नशे की चपेट में आ चुके हैं । सांसदों ने नशा व्यापारियों के लिये मौत की सजा की मांग की ।

उसी समय केंद्रीय गृह मंत्रालय ने रिपोर्ट दी कि 532 किलोग्राम हेरोइन बरामद होने के मामले की जांच का जिम्मा राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंपा गया है । इतना विशाल हेरोइन जखीरा चंडीगढ़ में भारत-पाक सीमा के अट्टारी चेकपोस्ट पर पकड़ाया । नशीली दवा व्यापार पर अंकुश के लिए तैनात अधिकारियों के अनुसार हेरोइन और अफीम सबसे ज्यादा युवाओं तक पहुंचती हैं । हरियाणा सरकार ने राज्य को नशीली दवा मुक्त रखने के लिए चलाए गए अभियान के अंतर्गत आठ महीने में 305 मामले दर्ज किए और नशीली दवा रखने के जुर्म में 521 लोगों को गिरफ्तार किया । यह 30 जुलाई को हरियाणा पुलिस से प्राप्त रिपोर्ट है । अधिकारियों ने तहकीकात के बाद पाया कि नशीली दवा का काला धंधा करनेवाले घर से लेकर कालेज, कोचिंग संस्थान इलाके तक पेशेवर दलालों के जरिए नशीली दवा पहुंचाने का उपाय निकाल लेते हैं। उसके एवज में मोटी रकम वसूलते हैं ।

‘उड़ता पंजाब’ फिल्म में वही दिखाया गया है कि धंधेबाजों के एजेंट किस प्रकार भोले-भाले युवाओं को जबरन ड्रग एडीक्ट बनाते हैं । पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ऐसी फिल्मों पर एतराज किया है, क्योंकि यह युवाओं को बरगलानेवाला है ।

स्वतंत्रता दिवस के समय नशीली दवा निरोध अधिकारियों ने पंजाब के विभिन्न हिस्सों से 220 किलोग्राम हेरोइन और अफीम बरामद किए ।

आखिर ऐसी नौबत आयी क्यों? इस सवाल का जवाब तब खोजा जाता है, जब नशीली दवाओं के शिकार युवाओं को काउंसिलिंग के जरिए भी सुधारना कठिन हो जाता है । इस राष्ट्रीय सामाजिक समस्या पर गंभीरतापूर्वक समय रहते विचार किया जाता तो आज ऐसी अराजक स्थिति पैदा नहीं होती । किशोरों और युवाओं के भटकाव के लिए कुछ हद तक उन्हें भी दोषी माना जा सकता है । क्योंकि वे उस उम्र तक मानसिक रूप से अपना भला-बुरा सोचने लायक परिपक्व हो चुके रहते हैं । तभी तो वोट डालने की उम्र 18 वर्ष रखी गयी ताकि वे देश का भविष्य सोच-विचार कर तय करें । उनसे सरकार और संस्था,ं वोट डालने की अपील करती है । इसी तरह नशा न अपनाने की अपील भी सरकार और सामाजिक संस्थाओं की ओर से बार-बार की जाए तो उसका असर हो सकता है । युवा लोगों का जब अपना ही भविष्य चौपट होने के कगार पर है तो वे देश के कर्णधार क्या बनेंगे । सरकार का दायित्व नशीली दवा बरामदगी और उसके कारोबारियों की धरपकड़ तक सीमित है । शिक्षण, कोचिंग संस्थाओं का काम नशाखोरी की शिकायत वाले छात्रों के अभिभावकों को जानकारी देने तक सीमित है । किसी के बहकावे में या अपने तनाव से राहत पाने के उम्मीद में नशा करनेवाले युवा से बातचीत तब होती है, जब मामला काबू से बाहर चला जाता है । उसके पहले अभिभावक और शिक्षक युवाओं के प्रति संवेदनशील नहीं होते । संवादहीनता से उत्पन्न स्थिति उन्हें जब महसूस होती है तबतक बहुत देर हो चुकी रहती है ।

आईआईटी, खड़गपुर के एक विभागाध्यक्ष ने बातचीत के क्रम में बताया कि लड़के जरूरत से ज्यादा महात्वाकांक्षा पाल लेते हैं और मां-बाप भी बड़ी-बड़ी उम्मीदें लगा लेते हैं । लेकिन वास्तविकता ये है कि शिक्षक लोग उन छात्रों से बात करने कक्षा से इतर मिलने-जुलने का समय नहीं निकालते । शिकायत खबर पाकर वर्किंग पिता जब संस्था में पहुंचते हैं, तब मिलकर काउंसिलिंग करते हैं । उसके पहले पिता अपने युवा बच्चे के लिए समय नहीं निकाल पाते । युवा क्या करे, वो अपनी भावना किसके साथ शेयर करे । तनाव की स्थिति में कोई तो नहीं होता, जो उसके प्रति संवेदनशील हो । उसकी भावनाओं को समझें । शहरों के ज्यादातर परिवारों में मां-बाप दोनों वर्किंग है, दोनों में से किसी के पास बच्चे के लिए समय नहीं होता । जब वह बच्चा युवा होता है, और मनोरोगी हो जाता है, तब मनोवैज्ञानिक चिकित्सक की सलह पर मां-बाप समय निकालते हैं । उसमें भी युवक-युवतियां झगड़ा देखती हैं । नौकरी में आने के बाद युवाओं के मां-बाप से बढ़ती दूरी का एक कारण यह भी है । आईआईटी खड़गपुर कैंपस में एक और बात का पता चला जो शिक्षक आईआईटीियन नहीं है, उन्हें छात्र योग्य नहीं मानते और उनका सम्मान भी नहीं करते । वैसे शिक्षकों का रोब छात्रों पर नहीं चलता और अनुशासनात्मक कार्रवाई का मामला बन जाता है ।

लगभग सभी युवा पढ़ाई और नौकरी की तैयारी के दौरान आईएएस बनने का सपना देखता है । अब तो हालत यह हो गई है कि आई.आई.टी जैसे उच्च संस्थान से डिग्री लेनेवाले युवा भी इंजीनियर या प्रोफेसर बनना नहीं चाहते । वे आईएएस की तैयारी में दिल्ली के मुखर्जीनगर कोचिंग जाल में फंस जाते हैं । निकल गए तो बल्ले-बल्ले, कोचिंग वाले अखबारों में तस्वीर और रैंक छपाते हैं, ताकि फंसाने का सिलसिला जारी रहे । जो पिछड़ गए वो फिर किसी अन्य नौकरी में एडजस्ट नहीं कर पाते और ताउम्र हीन भावना या कुंठा के शिकार हो जाते हैं । विस्थापितों की कालोनी मुखर्जीनगर में कोचिंग छात्रों के पैसे से कोचिंग संस्थानों की तरह मालामाल होनेवाले एक मकानमालिक ने बताया - ये लड़के, मां-बाप से पढ़ने के नाम पर पैसा मंगाते हैं और यहां सारा पैसा मस्ती में नशे में उड़ाते हैं । लुभावने विज्ञापनों के जरिए कोचिंग संस्थाओं ने अभिभावकों और छात्रों का आत्मविश्वास कमजोर कर दिया है । उन्हें लगता है कि कोचिंग के बिना किसी भी क्षेत्र में सफलता नहीं मिलेगी ।

नौकरी में आने के बाद भी असंतोष और तनाव युवाओं का पीछा नहीं छोड़ता । पुलिसकर्मियों और सेना के जवानों की आत्महत्या अथवा अपने अफसर को गोली मार देने का कारण तो अब किसी से छिपा नहीं है । लेकिन अब युवा आईपीएस, आईएएस अफसरों की आत्महत्या की खबरें भी आ रही हैं। दांपत्य जीवन में उनका अहम टकराता है, अगर पत्नी भी अच्छी नौकरी में हो । मनवांछित पोस्टिंग, दायित्व न मिलना भी एक कारण है । वे सरकारी अधिकारी हैं और सरकार के हिसाब से चलना पड़ता है । उनकी पारिवारिक समस्या से सरकार को मतलब नहीं है । जब हादसा हो जाता है तो फेंका-फेंकी चलता है । समाज का सबसे ज्यादा ऊर्जावान और उपयोगी वर्ग है युवा । उनकी सृजन और कुछ कर गुजरने की आकांक्षा तथा क्षमता दोनों ही विनाश के कगार पर है । आसमान में उड़ने की दुनिया में रहनेवाले युवा को जमीनी सच्चाई की योजना समय से नहीं होती और अपनी जिंदगी से खिलवाड़ करते हैं । जो लोग आकाशवाणी का समाचार बुलेटिन सुनते हैं, उन्होंने केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की युवाओं से बाईक चलाते समय हेलमेट पहनने की अपील जरूर सुनी होगी । इस वर्ष मंत्रालय को जुर्माना बढ़ाना पड़ा है । परिवहन मंत्री ने संसद में कहा कि सड़क दुर्घटना में जान गंवानेवाले सबसे ज्यादा 18 से 35 वर्ष की उम्र के युवक हैं । सड़कों पर मस्ती में स्टाईल मारनेवाले लहरिया कट और बाईक सवार युवा तो मौत की ही सवारी करते हैं । पैकेज प्रलोभन में विदेश जानेवाले युवाओं की सनक पर विराम लगा है । इस बीच प्रतिभा पलायन में कमी आयी है । केंद्र सरकार ने इस पर रोक लगाने के लिए भांति-भांति के व्यावसायिक और तकनीकी प्रशिक्षण की योजना शुरू की है । इस वर्ष आम बजट में 400 करोड़ की ‘भारत में पढ़ो’ योजना विदेशी छात्रों को ही भारतीय शिक्षा प्रणाली में आकर्षित करने की है । मगर इसके लिये यह भी जरूरी है कि सत्ता परिवर्तन के साथ ही कालेजों और विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम न बदला जाए । इतिहास और समाज शास्त्र को ऐसा न मरोड़ा जाए कि युवावर्ग दिग्भ्रमित हो जाए । अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम राजनीतिक किया जा रहा है । नागपुर विश्वविद्यालय में राष्ट्रनिर्माण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(आरएसएस) की भूमिका पर एक चैप्टर जोड़ने पर विवाद है । दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व स्नातक पाठ्यक्रम में बदलाव को लेकर भी विवाद छिड़ा हुआ है । त्रिपुरा यूनिवर्सिटी के कुलपति विजय कुमार लक्ष्मीकांत राव धरूयरकर ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का झंडा फहराकर इसे भारतीय संस्कृति का प्रतीक बताया । मां-बाप के स्नेह और सान्निध्य से वंचित एक किशोर ने अपनी पीड़ा राष्ट्रपति को बतायी । बिहार के भागलपुर जिले के एक 15-वर्षीय लड़के ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर अपना जीवन समाप्त करने की अनुमति मांगी । उसके मां-बाप दो जगह नौकरी करते हैं और जब मिलते हैं तो आपस में झगड़ते हैं । स्नेह और पढ़ाई के माहौल से वंचित उस लड़के ने ऐसी जिंदगी समाप्त करनी चाही । राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से लड़के का पत्र प्रधानमंत्री को भिजवा दिया गया और प्रधानमंत्री कार्यालय ने जांच के आदेश दिए । इससे उस बच्चे की युवावस्था तो बेहतर नहीं होगी । बिहार के ही शेखपुरा जिले में प्रथम श्रेणी में मैट्रिक पास करनेवाली एक लड़की कंचन कुमारी के युवा सपने लड़की होने की वजह से काल में समा गये । उसके दोनों गुर्दे खराब थे । सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों ने कंचन के मां-बाप को बहुत समझाया कि एक किडनी से भी काम चलता है । यह बच्ची बड़ी होकर परिवार और जिले का नाम रोशन करेगी । लेकिन सिर्फ लड़की होने की वजह से मां-बाप नहीं पसीजे । दोनों में से कोई अपना गुर्दा देने को तैयार नहीं हुए और कंचन कुमारी की जिंदगी समय से पहले समाप्त हो गयी । ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान से उस गरीब बच्ची को क्या मिला? केंद्र के साथ राज्यों में भी खेल से जुड़ा युवा मंत्रालय है, जो खेल पर ही ज्यादा जोर देता है । अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के दिन 12 अगस्त को हर साल पुरस्कार वितरण होता है । एक बार फिर नशीली दवा, हिंसा और बलात्कार की ओर लौटते हैं । युवाओं में हिंसा और बलात्कार की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है । दिल्ली के निर्भया बलात्कार कांड तो भुलानेवाला नहीं है । लेकिन युवाओं के मानसिक विकृति के लिये किसे दोष दें । फिल्म, इंटरनेट, टीवी सीरियल के फायदे तो लोग उंगलियों में गिना देते हैं । मगर उसका नुकसान कोई नहीं सोचते । हैदराबाद से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार 9 साल की बच्ची से बलात्कार करके उसे मार देनेवाले एक 28 वर्षीय युवक को कोर्ट ने फांसी की सजा दी । क्या यही निदान है इस सामाजिक बुराई का? सोशल मीडिया के जरिए ‘वर्ल्ड कनेक्टिविटी की दुहाई देनेवाले युवाओं को जकड़ती ‘अनसोशल’ बुराइयों की बात नहीं करते ।

अब चलिए उत्तर पूर्व, जहां हिंसा और नशीली दवाओं के मिले-जुले कारोबार में इस क्षेत्र का समूचा युवा वर्ग लिप्त है । मणिपुर-म्यांमार खुली सीमा के रास्ते दक्षिणपूर्व एसिया से खुलेआम हथियारों की तरह उग्रवादियों के पास नशीली दवा पहुंचती है । ‘लुक-ईस्ट’ योजना का एक पहलू यह भी है । असम के उग्रदवादी गुट यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट(उल्फा) समेत विभिन्न उग्रवादी गुटों के प्रभाव वाले गांवों में अफीम की खेती होती है । हिंसा और नशा पूर्वोत्तर की प्रमुख फसल है । वहां के युवा इस फसल से ‘लाभान्वित’ होकर हिंसा और नशा में भूमिगत रहते हैं । आजादी और संप्रभुता वाली अलगाववादी गतिविधियों में मस्त रहते हैं । इसकी जानकारी सुरक्षा बलों को न हो, ऐसा नहीं माना जा सकता ।

वही हाल कश्मीर का है, जहां के युवा हिंसा और नशा के दीवाने हैं । कश्मीर में आतंकवादी हिंसा के साथ-साथ नशीली दवा भी पाकिस्तान से आता है । कश्मीर में तनाव स्थायी भाव है । धारा-370 निरस्त होने के बाद 10 अगस्त को राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने तारिक अहमद लोन नामक 28 वर्षीय युवक को 2700 करोड़ रूपये मूल्य की 532 किलो हेरोइन की पाकिस्तान से कथित तस्करी के सिलसिले में पकड़ा । अफीम, गांजा, हेरोइन, चरस के शिकार सबसे ज्यादा सेना और अर्द्धसैनिक बलों के जवान हैं । तनाव और अशांति के माहौल में ड्यूटी जवानों की दिनचर्या में शामिल है । इससे राहत पाने के लिए उनकी जवानी परिवार से काफी समय तक दूर रहकर नशाखोरी में गुजरती है । मुठभेड़ों के बाद हथियार, उग्रवादी के पकड़ाने की खबर तो मिलती है । किसी भी धरकपड़ अभियान में नशीली दवाओं के धंधे को कुछ नहीं बिगड़ता । कुछ वर्ष पहले सेना के ट्रक में भरे गांजा, चरस म्यांमार-मणिपुर सीमा पर पकड़ाया । युवा सैनिकों की जानकारी में चल रहे इस धंधे की खपत लगातार असामान्य वातावरण में जीने को मजबूर पूर्वोत्तर के ज्यादातर युवा के बीच हैं ।

गुवाहाटी के अखबार ‘असम ट्रिब्यून’ की रिपोर्ट के अनुसार पूर्वोत्तर क्षेत्र के सीमाशुल्क कमिश्नर कार्यालय ने शिलांग में विशाल नशा जखीरा पकड़ा । उसमें 1.37 किलो हेरोइन, 12.6 किलो अफीम, 1.6 किलो कोकेन, 2300 किलो गांजा और सैकड़ों किलो अन्य नशीले पदार्थ शामिल हैं। गांजा, अफीम की खेती पर छापा पड़ने की रिपोर्ट शायद ही कभी मिली हो । सैनिकों से ऐसी ‘देशसेवा’ कराने के लिए कौन जिम्मेवार है? क्या सिर्फ सैनिक दोषी हैं, जो अपनी जिंदगी में चैन और सुकून नहीं देख पाते?

कश्मीर में मोर्चे पर तैनात किए जानेवाले युवा सैनिकों को देश के लिए प्राण न्योछावर करने के बाद केंद्र और राज्य सरकारों से तात्कालिक संवेदना के साथ-साथ मोटी रकम भी मिल जाती है । पूर्वोत्तर के जवानों के परिवारों की किस्मत में वो भी नहीं ।

और बात समाप्त करते-करते युवाओं का एक पुण्य सामाजिक काम, जिसकी कितनी भी सराहना की जाये कम होगी । मध्य प्रदेश के ग्रामीण युवाओं ने चंदा करके जुटाए गए 10 लाख रूपये से मकान बनवाकर एक शहीद सैनिक की पत्नी को रक्षा बंधन का तोहफा 15 अगस्त, 2019 को दिया । सीमा सुरक्षा बल के ये जवान मोहनलाल सुमेर 27 वर्ष पहले त्रिपुरा मे शहीद हो गए थे । वे इंदौर जिले के बेतमा गांव के रहनेवाले थे । बिना किसी सरकारी उत्साहवर्धन और आह्वान के स्वतःस्फूर्त प्रेरणा से गांव के युवाओं ने समाजभक्ति का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसके सामने सारी राजनीतिक ‘देशभक्ति’ लंगड़ाती है ।

नौकरी

इलाके के बड़े जमीन्दार और पूर्व पंचायत प्रमुख राम बुझावन बाबू के दालान पर शाम को बैठकी जमती है । चाय, पान, खैनी का दौर चलता रहता है । गांव और आसपास के टोले के पांच-सात लोगों का हर समय आना-जाना लगा रहता है । उनमें से एक हैं दिगंबरजी, जो सबसे पहले आते हैं और सबसे बाद में जाते हैं । प्रायः रात को रह भी जाते हैं । ये राम बुझावन बाबू के करीबी लगुओं-फगुओं में से हैं । कोर्ट-कचहरी या पंचैती वगैरह में कहीं जाने के समय भी दिगंबरजी साथ रहते हैं ।

राम बुझावन बाबू के पुत्र बड़े सरकारी अधिकारी हैं । जमीन्दार साहब ने अपने एकाध बटाईदारों और करीबियों के बेटों की नौकरी लगवायी है । वे लोग उनकी सेवा में लगे रहते हैं । बैठकी के दौरान राम बुझावन बाबू को सुनते रहने के लिए जुटनेवाले ज्यादा वही लोग हैं, जिनकी गांव में इसलिए धाक है कि बुझावन बाबू के नजदीकी हैं । थाना, ब्लॉक वाले भी उनसे अच्छे से बात करते हैं ।

राम बुझावन बाबू अपनी एकतरफा बैठकी चर्चा में वैसी बातों का प्रसंग जरूर उठाते हैं, जिसमें उन्होंने किसी को उपकृत किया हो और किसी पर एहसान किया हो । लगभग हमेशा वे वैसे लगुओं-फगुओं की मौजूदगी में सुनाते हैं कि किस प्रकार सेवा के प्रतिफल में उनके बेटों को राम बुझावन बाबू के प्रसादात् नौकरी मिली ।

काफी दिन तक कृतज्ञता के भाव से दिगम्बर जी एहसानमंद होने के कारण झेलते रहते हैं । दिगम्बरजी को अपने बेटे की सिपाही की नौकरी राम बुझावन बाबू की कृपा से लगने की बात गाहे-बगाहे सुननी पड़ती है । अन्य ग्रामीणों के सामने और अकेले में भी बार-बार एक ही एहसान दुहराए जाने से दिगंबरजी का मन खिन्न हो जाता है । न उनके लिए संबंध निभाते बनता है, न तोड़त । वे एहसान फरामोश और कृतध्न के रूप में प्रचारित नहीं होना चाहते । यह असंतोष कहां बोलें, किससे बोलें ।

राम बुझावन बाबू के मैनेजर से दिगम्बरजी की अंतरंग बातचीत होती रहती है । रामबुझावन बाबू के व्यवहार से दुखी रहनेवाले मैनेजर दिगम्बरजी का दर्द समझते हैं ।

राम बुझावन बाबू की गैरमौजूदगी में मैनेजर के पास आखिर एक दिन दिगम्बरजी का आंसू भरा दर्द फूट पड़ता है - ‘जब हमको लग जाएगा कि राम बुझावन बाबू से दिल टूट गया है और इनसे संबंध निभाना हमसे पार नहीं लगनेवाला है, तो अपना बेटा को बोलेंगे पहले तू नौकरी छोड़ ।’

जान और जगह

खेत बाढ़ से जलमग्न है । कमर से ऊपर तक पानी के नीचे खड़ी फसल है । मकानों के अंदर पानी बहने से गांव के लोग फूस और खपरैल की छत पर शरण लेने जाते हैं तो चूहे, सांप को जान बचाना मुश्किल हो जाता है । भारी वर्षा से बढ़ते जलस्तर के कारण छत भी गिर जाती है । लोग तटबधों और खेतों में इक्का-दुक्का विशाल जामुन, पीपल के पेड़ों पर शरण लेने को मजबूर हैं । यही पेड़ सांप और चूहे दोनों की आश्रयस्थली है । ऊपर बिल्ली और नेवला भी है । सांप भूखा है और बिल्ली भी भूखी है । दोनों के मुंह के पास चूहा है । पानी की लहर भी मुंह से सट रही है । सांप आंखें बंद किए पड़ा है । बिल्ली की भी वही हालत है । मगर बेचैन चूहा जगा है । पेड़ की डाल पर ऊपर-नीचे कर रहा है । सांप को चेताए बिना रहा नहीं जाता है - ‘ए चूहे ज्यादा उछल कूद मत कर, तेरे को निगलने में मुझे कितना समय लगेगा, ऊपर बिल्ली भी बैठी है । एक झपट्टे में तेरी जान चली जाएगी ।

चूहा जरा भी डरे बिना ढिठाई से कहता है - ‘तू और बिल्ली दोनों मेरी तरह अपनी जान बचाने के लिए पेड़ पर है । तेरे मुंह उठाने से पहले मैं ऊपर चढ़ जाऊंगा । तू ऊपर चढ़ेगा तो चारों तरफ पेड़ से चिपके और सांप गिरने के डर से तुझे आगे नहीं बढ़ने देंगे ।’

विषम परिस्थिति का तत्वबोध सांप को चूहा कराता है - ‘आपस में लड़ोगे तो नीचे पानी में गिरोगे । सांप तेज धार में अपनी जान बचाएगा या चूहा खाएगा । अगर किसी तरह वापस पेड़ के पास आ भी गए तो फिर आश्रय के लिए पेड़ पर जगह भी नहीं मिलेगी । आस-पास दूसरा पेड़ नहीं । पेड़ के नीचे बहकर आ रहे कितने सांप चूहों को जान के लाले पड़े हैं । बारिश से बचने के लिए तूने टहनियों से ढंका घोंसला हड़पा । जरा सा ससरे तो जगह और जान दोनों जा सकती है । ऊपर पानी नीचे पानी । फन उठा के थोड़ा आगे भी देख । हम दोनों के जान के दुश्मन ये इन्सान तेज बहाव में मरने के डर से टूटे तटबंध के पास एक इंच जगह के लिए झगड़ रहे हैं । ये रात भर जगते हैं, हमलोग सोते हैं ।’

सांप को जवाबी चेतावनी चूहा देता है - ‘और हां, ऊपर मोटी डाल पर बैठे नेवले को मैंने दो-बार तेरी ओर देखके आंखें बंद करते देखा है । हमले के लिए झपटा तो तरी वाली गत का डर है । तेरे को बिल्लो को दिखाई दे गयी, लेकिन नेवला नजर नहीं आया ।’

सदमा

महेश प्रसाद संपन्न किसान हैं । इन्होंने बहुत सारी गायें, भैंसें पाल रखी हैं। न ये दूध बेचते हैं, न बैल खरीदते हैं । बड़े मवेशी घर के लिए दो-तीन चरवाहे महेश प्रसाद हमेशा रखते हैं । बछड़ों को दूध पिलाने से हट्टे-कट्टे बैलों को सामने की डगर से आते-जाते लोग देखते रहते हैं । सबसे ज्यादा दूध देनेवाली दो गायें बड़ी नखरे वाली हैं । एक ही चरवाहे को दूहने देती है, जो सबसे पुराना है । दूध-दही खूब खाने को मिलने के बावजूद चरवाहे मालिक के कड़े मिजाज के कारण ज्यादा दिन नहीं टिकते । एकमात्र मोती राम है, जो टिका रह गया । सहूलियत के लिए बेटे को भी ले आया । मोती राम को गाय-गोबर से लेकर मवेशियों को पानी पिलाने और चारा-घास लाने मांड़-भूसा मिलाकर बैलों का भोजन सानी बनाने में आसानी हुई ।

शहर में नौकरी कर रहे मालिक के बड़े पुत्र ने पुराने चरवाहे मोतीराम के लड़के को देखा तो अपने साथ लिये चले गए । उन्हें घर के नौकर की जरूरत थी । दुर्योगवश मोतीराम का बेटा एक-डेढ़ साल बाद बीमार पड़ गया । बीमारी ऐसी कि काफी इलाज के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका । मई का महीना था । मालिक महेश प्रसाद का छोटा लड़का बिट्टू कॉलेज से गर्मी की छुट्टी में गांव आया, तो उसे यह समाचार सुनकर बहुत दुख हुआ । मोतीराम ने उसे गोद में खेलाया था । मोतीराम श्राद्ध आदि कर्म के लिए अपने घर गया हुआ था । बिट्टू उसके घर ढाढ़स देने चला गया । पिता ने उस रास्ते से जाते-आते देख लिया था । लौटते ही उन्होंने बिट्टू से पूछ दिया - ‘मोतिया के घर गए थे क्या?’

मोती के घर में उसकी मां-बहन को रोते देखकर लौटे बिट्टू ने पिता की ओर देखे बिना धीरे से कहा - ‘हां’ ।

पिता ने बड़े सहज भाव से पुत्र को समझाने के अंदाज में कहा - ‘अरे इन रैयतों को बेटा-बेटी के मरने से कोई सदमा नहीं होता । फिर जन्मा लेंगे । राशन दे दो, पैसे दे दो, श्राद्ध के लिए अपनी बिरादरी को खिलाने के लिए मदद कर दो, बस । सब सदमा खतम । बिट्टू को पिता से कुछ कहते नहीं बना, मन हल्का करने के लिए वो खेत की ओर निकल गया । संवेदनशील बिट्टू कई रात को सो नहीं पाया । उसने खुद को सपने में ‘मोतिया’ के परिवारजनों के साथ गले लगकर रोते देखा ।

तीन समाज-गीत

- शशिधर खान

(9)

देखिए तो माओ फाईट कब तक चले, आपस में लेफ्ट-राईट कब तक चले सड़कों पे काले हुए खून के थक्के खलिहानों तक रेड-लाईट कब तक चले बड़ी-बड़ी सुर्खियां दबकती फिरी आखिर में शार्ट-बाईट कब तक चले मारामारी में सारी ठेकेदारी गयी देखते हैं नया साईट कब तक चले आसपास गूंज रहे रोज धमाके तो भी सब ‘ऑललाईट’ कब तक चले अमन-चैन का हक हमें भी चाहिए दहशत में सिविल राईट कब तक चले

(2)

बहुत हुआ खेल इस कस्बे में आग का आइए बनाएं जरा नक्शा तो बाग का सीधी बातों को मोड़ देते हैं लपेट-लाग का सरोकार की फांस में है लबादा वोतराग का बिगड़े हालातों में न काम भागम-भाग का दागियों को सबसे ज्यादा फिक्र है बेदाग का गबरू की सहन है गहन बुझता चराग का भीतर विवेक सोया बाहर शोर भगवती-जाप का अमृत रस में घोला है विष काले नाग का बहारों की टीस को है तलब रंगराग का

(3)

तनाव से मुक्ति के लिए प्रकृति से प्यार करें अनजान बच्चों को गुदगुदाएं दुलार करें मिलने-जुलने का वक्त दिनचर्या में बढ़ाएं बड़ा अच्छा लगने लगेगा, थोड़ा इंतजार करें हंसने-बोलने से मन में गांठ नहीं होती बैठकी जमाने का भी चलिए कारोबार करें गलियारे से झांकने के बाहर है दुनिया सड़क के देश, समाज से जरा अभिसार करें कांति खोती नदी भी दे सकती है शांति पूनम की रात चांदनी से आंखें चार करें