समाज को ‘हाईजैक’ कर लिया है विवादित फिल्मों ने
24x7 अर्थात् चौबीस घंटे चलायमान टी वी चैनल देख रहे हों, पुनर्जीवित दूरदर्शन से टाईमपास कर रहे हों अथवा आकाशवाणी के एफएमएएम चैनल सुन रहे हों तो आपको हर कार्यक्रम या बुलेटिन से पहले और बाद में तथा बीच में भी बॉलीवुड सुपरस्टार अमिताभ बच्चन की आवाज सुनाई देगी । फिर बॉलीवुड स्टार शिल्पा शेट्टी की भी आवाज सुनाई देगी । आम आदमी के हित में सरकार की सामाजिक सरोकार वाली योजनाओं का लाभ जन-जन तक पहुंचाने के लिए ऐसे स्टारों की आवाज और स्टाईल में वैसे विज्ञापन प्रसारित किए जाते हैं ताकि हर तबके के लोगों पर उसका असर हो । उनमें शौचालय अपने घर में बनवाने के लिए गांव के लोगों को प्रेरित करने और कूड़ा फेंकने का सलीका शहरवासियों को सिखानेवाले विज्ञापन संदेशों पर ज्यादा जोर दिया जाता है । यह मुख्य रूप से स्वास्थ्य और नित्य कृत्य से जुड़ा है । अमिताभ बच्चन ‘पहलवानजी’ के प्रतीक माध्यम से शौचालय बनवाने के लिए जनहित सीख देते हैं और शिल्पा शेट्टी अपने पड़ोसी ‘शर्माजी’ के बहाने एपार्टमेंट में कूड़ा कूड़ेदान में ही फेंकने की सलाह देती हैं । अपने जमाने की बहुचर्चित सुपरस्टार स्वप्न सुंदरी लोकसभा सदस्य हेमा मालिनी पोलियो खुराक का संदेश देती हैं - ‘दो बूंद जिंदगी की’ । एक और सुपर स्टार विद्या बालन बहू-बेटी के रूप में गांव की काकियों को शौचालय बनवाने के लिए समझाती हैं । बॉलीवुड के संगीत और गायक सुपरस्टार कैलाश खेर का सूफी टाईप गायन की विज्ञापन रिकॉर्डिंग कई जन-कल्यानकारी स्वच्छता योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए सुनायी जाती है । अमिताभ बच्चन की डुगडुगी के साथ सुनायी जानेवाली सुबह आठ बजे की समाचार बुलेटिन कई लोगों को याद हो गयी हैं - ‘दरवाजा बंद बीमारी बंद पेड़ के नीचे.......।’ क्योंकि गांव-कस्बों के किसान और ऐसे लोग नौकरी या अन्य व्यवसाय के अलावे अपनी खेती-बाड़ी भी चलाते हैं, उनके बीच सबसे ज्यादा सुनी जानेवाली सवरे की यही बुलेटिन है । हिट स्टार की तरह हिट संगीत का भी इस्तेमाल किया जा रहा है । परिवार नियोजन की प्रेरणा महिलाओं को हिट विवाह गीत - ‘बन्नो तेरा मुखड़ा’ का धुन वाली पैरोडी से दी जा रही है । यूनिसेफ ने पोलियो, तपेदिक अभियान की सफलता के बाद अमिताभ बच्चन का अभियान एंबेसेडर का कार्यकाल दो साल के लिए बढ़ा दिया है । विश्व स्वास्थ्य संगठन न अमिताभ को हेपेटाइटिस जागरुकता अभियान का दक्षिण पूर्व एसिया एंबेसेडर नियुक्त किया हुआ है ।
इस चर्चा का मेरा मकसद भारत सरकार की स्वास्थ्य और परिवार नियोजन योजनाओं की समीक्षा करना नहीं है । जो विषय हमारे सामने है, उस संदर्भ में मेरा कहना ये है कि आम जनता को स्वस्थ और सभ्य सामाजिक जीवन-शैली अपनाने को प्रेरित करने के लिए बॉलीवुड स्टारों की जरूरत क्यों पड़ रही है? बॉलीवुड सितारों के माध्यम से ही जन-कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी और इसका लाभ उठाने के लिए आम लोगों को जागरुक करने के पीछे क्या कारण है? इसका सीधा जवाब है कि फिल्म सितारों का जनता के बीच किसी भी अन्य स्टार या सेलिब्रिटी से ज्यादा प्रभाव है । फिल्मी हीरो-हीरोइयों के पीछे जनता पागल है । खासकर जो स्टार मनोरंजन कला से जनता के खून पसीने की कमाई करोड़ों में डकार जाते हैं, उनके पीछे लोग दीवाने हैं । फिल्म की सफलता का पैमाना है, कमाई, व्यवसाय । ऐसे निर्माताओं को इस बात की फिक्र नहीं रहती कि उनके किस कथानक, सीन का दर्शकों पर क्या असर पड़ रहा है । वे यह सोचने की जरूरत नहीं समझते कि दिल-दिमाग की खुराक पेट जैसी नहीं है कि बस खाए, पच गया और फिर यही सिलसिला चल रहा है । मन-मस्तिष्क पर गंदी, बीमार और अश्लील सोचवाली फिल्मों का तुरंत तथा सीधा असर पड़ता है । ऐसे दृश्य सिनेमा हॉल से बाहर निकलने के बावजूद काफी समय तक आंखों से नहीं हटते । दिमाग पर उस विकृत सोच का असर पड़ता है। अभी समाज में ज्यादा यही देखने को मिल रहा है ।
मनोरंजन की आड़ में मनोभंजन करनेवाली नोट बटोरो फिल्मों की दौड़ में ऐसी फिल्में कम चल रही हैं, जो स्वस्थ मनोरंजन के साथ कुछ अच्छी भावना मन में जगाए और कुछ सोचने को विवश करे ।
बॉलीवड फिल्म स्टारों के लिए समाज में इस दीवानगी से बड़े-बड़े व्यावसायिक घराने मुनाफा बटोर रहे हैं । स्टारों के जरिए सामनों की बिक्री इसी दोवानगी के चलते बढ़ती है । घटिया से घटिया उत्पाद स्टारों को इस्तेमाल करते दिखाकर कंपनियां मालामाल हो रही हैं । यह कोई जरूरी नहीं कि वो सामान घटिया हो, लेकिन उपभोक्ता उसकी क्वालिटी पर इसलिए विचार नहीं करते कि फिल्म स्टार के हाथ में है ।
करीना कपूर की त्वचा सौंदर्य का राज है लक्स, अमिताभ बच्चन नवरत्न तेल जड़ी-बूटियों से बना बताते हैं । ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं - बॉलीवुड गीतकार जावेद अख्तर का ‘डा-आर्थो’ और हसोड़ स्टार राजू श्रीवास्तव की ‘पेट सफा’ नयी एंट्री है । शाहरूख खान द्वारा एक शेविंग क्रीम को विज्ञापन में ‘नम्बर वन’ बताने के खिलाफ एक उपभोक्ता को भोपाल में कोर्ट में याचिका दायर करनी पड़ो । याचिका में उपभोक्ता ने कोर्ट को बताया कि इस क्रीम को लगाने से उनके चेहरे पर छाले हो गये, जिसका उन्होंने अस्पताल में उपचार कराया । कोर्ट ने शाहरूख खान को नोटिस जारी किया ।
यहां तक तो ठीक है । लेकिन फिल्म निर्माता जब समाज में तनाव और विद्वेष फैलानेवाले कथानक तैयार करके स्टारों के प्रभाव का इस्तेमाल बिक्री के लिए करते हैं, उस समय ये स्टार सिर्फ अपनी शान-शौकत, दौलत-शोहरत देखते हैं । भोले दर्शकों की जेबें उनके चमक-दमक पर लट्टू हो जाती हैं । स्टारों को यह सोचना जरूरी नहीं लगता कि समाज के प्रति भी उनकी जिम्मेदारी बनती है । दंगा, फसाद, राजनीति में लिपटा विवाद और सांप्रदायिक तथा बौद्धिक तनावों का समाज पर प्रतिकूल असर पड़ता है । ऐसे कथानकों की इन दिनों होड़ मची है । दर्शकों के निशाने पर सीधे स्टार हैं । निर्माता-निर्देशक दर्शकों के बीच नहीं जाते । सिर्फ फिल्म रिलीज के समय मीडिया के जरिए अपनी बात कह देते हैं । अब एक नया ट्रेंड चला है कि ‘डिस्क्लेमर’ लगा के कुछ भी तोड़-मरोड़ के परोस दीजिए और विवाद से निजात पा लीजिए । जबकि विवाद के लिए ही वो ब्यूह-रचना की जाती है । क्योंकि अभी ज्यादातर फिल्में सीरियल विवादों का बिग बाजार बनी हुई हैं ।
इस सेलिब्रिटी मॉल में प्रतिद्वंद्विता और एक-दूसरे को पछाड़ने की आपाधापी में अजीबोगरीब परिस्थितियों के दौर से बॉलीवुड गुजर रहा है । बॉलीवुड दिग्भ्रमित है और समाज को अपने मतलब के हिसाब से हिलोरने का दावा करनेवाले निर्माताओं को जनता की नब्ज समझना कठिन हो रहा है । केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड अपनी दकियानूसी सोच से उबर नहीं पा रहा है । सेंसर में मतलब की राजनीति ज्यादा और समाज की सच्ची तस्वीर पेश करनेवाली सोच कम मायने रखती है ।
हिंसा, मारधाड़, सेक्स, अश्लील देह-प्रदर्शन वाली फिल्मों से जनता की ऊब को कुछ निर्माताओं ने समझा । जब वैसी फिल्में हिट हुई तो नचनियां छविवाले निर्माता की सोच बदली । लेकिन व्यावसायिक फिल्मों की उत्तेजक सीन इतनी गहराई तक बॉलीवुड को लील चुकी है कि संतुलन बनाना कठिन हो रहा है ।
एक ओर सरकार शारीरिक स्वास्थ्य के लिए स्टारों का इस्तेमाल कर रही है, दूसरी ओर बीमार मानसिकता प्रचारित करनेवाली फिल्मों पर कोई अंकुश नहीं है । राजनीति और इससे जुड़े विषयों वाली फिल्म लोगों के बौद्धिक सोच को प्रभावित कर रही हैं । यह अच्छी शुरूआत मानी जा सकती है, क्योंकि इससे समाज के लगभग सभी पंथियों की सोच उजागर हो जाती है ।
नोबेल पुरस्कार विजेता विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन पर बनी डोक्यूमेंट्री को लेकर हालिया विवाद बहुत सारी कलई खोलता है । सेंसर बोर्ड को चलती कार में बलात्कार का सीन सेंसर करने लायक नहीं लगता, जिसका असर समाज के किशोर वर्ग पर झट से पड़ता है । उस सेंसर बोर्ड ने परिपक्व बौद्धिक समुदाय की सोच जबरन बदलने और उन पर अपनी राजनीति प्रेरित सोच थोपने की मुहिम छेड़ रखी है । मौके और विषय के हिसाब से रंगत बदली जाती है । अमर्त्य सेन जैसे अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व को भारत की नरेंद्र मोदी सरकार के जरिए परिभाषित होने की जरूरत नहीं है । निर्देशक सुमन घोष निर्मित अमर्त्य सेन पर केंद्रित डोक्यूमेंट्री ‘दि ऑर्गुमेंटेटिव इंडियन’ में से ‘गाय, गुजरात, हिंदू, हिंदुत्व’ शब्दों पर सेंसर बोर्ड ने कैंची मार दी । सुमन घोष ने अपना विरोध प्रकट करते हुए कहा कि देश में जो कुछ भी हो रहा है, उसे वह समझते हैं । ‘उड़ता पंजाब’ और ‘लिपस्टिक अंडर माई बुका’ जैसी फिल्मों पर विवाद हुआ । लेकिन उन्होंने इस बात की कल्पना नहीं की थी कि बिना किसी पटकथा के तैयार वृत्तचित्र(डोक्यूमेंट्री) के साथ भी ऐसा ही बर्ताव होना है । करीब एक घंटे की इस फिल्म में अमर्त्य सेन को अपने छात्रों और ओनेर्ल यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर कौशिक बसु के साथ बेतकल्लुकी से बातचीत करते दिखाया गया है । इस फिल्म की न्यूयॉर्क और लंदन में स्क्रीनिंग हो चुकी थी । 14 जुलाई को कोलकाता में रिलीज केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड की आपत्तियों के कारण रुक गयी । निर्देशक सुमन घोष को मजबूरन चार शब्द - ‘गाय, गुजरात, हिन्दू, हिन्दूत्व’ हटाकर फेसबुक पर टेलर डालनी पड़ी । सेंसर बोर्ड ने डिक्टैट जारी कर दिया कि इन शब्दों को हटाएं तभी ‘दि आर्गुमेंटेटिव इंडियन’ को रिलीज की क्लीन चिट मिल सकती है । भारत सरकार के इस पूर्वाग्रह ग्रसित रवैए की देश के अंदर ही नहीं, दुनिया भर में निंदा हुई । क्योंकि विश्व के प्रसिद्ध विशिष्ट व्यक्तियों में शुमार होने वाले अमर्त्य सेन के कुछ बोलने का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असर पड़ता है । यह विवाद सीधे तौर पर सरकार की संकीर्ण कुंद सोच के साथ-साथ कथनी और करनी में फर्क भी उजागर करता है । एक ओर ‘मेकिंग इंडिया’ की बात दुनिया भर में की जाती है, दूसरी ओर नरेंद्र मोदी सरकार अपने एजेंडे के हिसाब से राजनीतिक संस्थाओं की तरह कला, संस्कृति और बौद्धिक संपदा की मौलिकता के साथ ‘विनाशिंग इंडिया’ की नीति अपना रही है । अमर्त्य सेन फिल्मकार नहीं हैं । उनसे बातचीत के आधार पर तैयार फिल्म की आत्मा इसलिए नष्ट करने की कोशिश की गयी, क्योंकि विचारों से दक्षिणपंथी होने के बावजूद अमर्त्य सेन ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार नहीं किया । जिस ‘गाय’ को लेकर अपने ही संघी गोरक्षकों के कृत्य को लेकर प्रधानमंत्री को संसद के मानसून सत्र में जुलाई में सफाई देनी पड़ी, उसी ‘गाय’ शब्द के उच्चारण मात्र से भाजपा सरकार ने अमर्त्य सेन जैसे मनीषी चिंतक पर अंकुश लगाने की नीति अपना ली । समाज की तस्वीर पेश करने का अभी साहित्य से ज्यादा सशक्त जरिया फिल्म बना हुआ है । अभिव्यक्ति का इससे तगड़ा माध्यम मीडिया भी नहीं है । इस पर राजनीतिक कारणों से रोक लगाना और उसी बहाने बुद्धिजीवियों के विचारों पर लगाम लगाना फासीवादी सोच का परिचायक है । इस अघोषित इमर्जेंसी को आम वोटर नहीं, बुद्धिजीवी समझ रहे हैं । नोटबंदी के नकारात्मक प्रभाव पर बनी सुवेंदु घोष की फिल्म ‘शन्योता’ को भी काफी हील-हुज्जत के बाद रिलीज की गयी ।
इमर्जेंसी की ज्यादती नरेंद्र मोदी सरकार की मेकिंग इंडिया की प्रमुख सेलिब्रिटी है । इस पर कथित रूप से बनवायी गयी फिल्म ‘इंदु सरकार’ की रिलीज के खिलाफ कांग्रेस कार्यकत्ताओं के प्रदर्शन को भाजपा ने अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ दिया । कांग्रेस के कंधे पर बंदूक रखकर अपना अपराध-बोध उजागर किया । भाजपा समेत तमाम गैर-कांग्रेसी सरकारें इस बात की प्रचार करते नहीं थकी कि प्रधानमंत्री इंदिरा के इमर्जेंसी के दौरान किशोर कुमार के मशहूर गीत ‘पब्लिक है, सब जानती है’ पर प्रतिबंध लगा दिया था । आज इमर्जेंसी को भुनाने के लिए भाजपा ने उल्टे कांग्रेस के खिलाफ यह कहकर प्रदर्शन किया कि कांग्रेस ‘अभिव्यक्ति की आजादी खतम करना चाहती है ।’ मधुर भंडारकर की बनायी इस फिल्म में 1975 से 1977 के बीच 21 महीने की इमर्जेंसी काल में संजय गांधी और इंदिरा गांधी को ज्यादती का किरदार दिखाया गया है । इस तरह के क्रिया-कलाप फिल्म उद्योग की कलात्मक छवि बिगाड़ रहे हैं । फिल्म उद्योग को भारत-चीन रिश्ते से तो नहीं, मगर भारत-पाक रिश्ते प्रभावित करते हैं । भारत में अब फिल्म के चलने का आधार नोटों में आंका जा रहा है, इसमें चीन सहयोगी है । आमिर खान की दंगल फिल्म भारत में तो हिट हुई ही, चीन में दंगल ने 1200 करोड़ का बिजनेस किया । भारत-चीन युद्ध पर बनी सलमान खान की ‘ट्यूबलाईट’ फ्लॉप हुई । पाकिस्तानी फिल्म स्टार अली जफर ने जुलाई में पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ से बातचीत के दौरान एक दिल दुखानेवाली बात कही - ‘भारतीय फिल्मों में पाकिस्तानी एक्टरों के रोल पर रोक है । 2013 में जब मैं बॉलीवुड फिल्म ‘चश्मे बद्दूर’ की शूटिंग के दौरान भारत में था तो हमेशा यह बात ध्यान में रहती थी कि यह मेरा देश नहीं है । जबकि मैं पंजाबी हूं, लाहौर में पैदा हुआ ।’ 2008 में अली जब ‘तेरे बिन लादेन’ फिल्म पर काम कर रहे थे, उसी समय मुंबई में आतंकी हमला हुआ ।
तिगमांशू धूलिया की आजाद हिन्द फौज पर बनी फिल्म ‘राग देश’ का जिक्र करना आवश्यक है, जिसका सेंसर बोर्ड ने गर्मजोशी से स्वागत किया । इसका कारण राजनीतिक के साथ-साथ कलात्मक भी है, क्योंकि यह नसीरूद्दीन शाह के थिएटर ग्रुप ‘मोरले’ का हिस्सा है । कुणाल कपूर इसमें शाहनवाज खान बने हैं। एक तो ये है कि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की ‘आजाद हिन्द फौज’ को लेकर कांग्रेस और भाजपा दोनों का दागदार चरित्र जनता जान चुकी है । दूसरे फिल्मों से ऊबे दर्शक थिएटर स्टाईल की ओर स्वस्थ और जीवंत दृश्य देखने के लिए आकर्षित हो रहे हैं । फिल्म में काफी कुछ कैमरे में दिखा दिया जाता है, जैसा वास्तव में होता नहीं है ।
एक बात और, कितनो अच्छी तस्वीर ‘मॉम’ में श्रीदेवी ने सौतेली मां के रूप में पेश की । लेकिन निर्माता ने कार में बलात्कार और सड़क पर फेंककर बूट से नाली में गिराने की घटना से समाज का कितना नुकसान किया उसका सबूत रिलीज होने के कुछ दिन बाद ही मिला, जब उत्तर प्रदेश के एक गांव से वैसी ही घटना की खबर आयी । इसका अन्य विकल्प सोचा जा सकता था ।
तमिलनाडु का हिन्दी विरोध लंदन में नजर आया । बॉलीवुड संगीतकार ए. आर. रहमान ने 8 जुलाई को अपने लंदन शो में जब तमिल गीत गाए तो हिन्दी भाषी उस कन्सर्ट के सारे श्रोता बाहर निकल गए । फिल्मों के साथ ऐसा होना नहीं चाहिए । क्योंकि संगीत, कला को किसी भाषा, धर्म, समुदाय की सीमा से बांधा नहीं जा सकता ।
राजनीतिक और सामाजिक विषयों का लेकर बनी फिल्मों में विवादित पहलू को तरजीह देने से बचा जा सकता है । लेकिन फिल्म निर्माण जान-बूझकर वैसे पहलू को उछालते हैं, जिससे विवाद और सामाजिक तनाव भड़के । ऐसी फिल्मों के पीछे निर्माताओं के भागने के कारण अब हाल ये हो गया है कि फिल्में नहीं चलती, विवाद चलते हैं । प्रेम कहानियों पर आधारित फिल्मों से ऊब के कारण राजनीतिक और सामाजिक फिल्मों का चलन शुरू हुआ । दर्शक जब इसकी ओर दौड़े तो नयापन लाने के लिए अन्य सृजनात्मक थीम तलाशने के बजाए निर्माता इसी के पीछे हाथ धो के पड़ गए । सभी निर्माता चाहते हैं कि विवाद बढ़े और सेंसर बोर्ड इसमें सहायक साबित हो रहा है । दर्शक नया कुछ चाहते हैं, इसीलिए इस आंधी में मन को सुकून देनेवाली फिल्मों की दर्शकों को तलाश रहती है । पुलिस की अच्छी छवि तो विरले ही देखने को मिलती है । राजनीति, शिक्षा, धर्म जैसे समाज के रोजमर्रे की जिंदगी के नकारात्मक पहलू का ही आईना फिल्म बन गया है । ‘दंगल’ के हिट होने का पुत्र प्रधान समाज के लिए सबसे असरदार पहलू है, गीता के साथ छेड़खानी करनेवाले लड़के के मां-बाप का शिकायत लेकर गीता के पिता के पास आना । ‘मॉम’ में पुलिस की दोनों छवि है । ‘महाबली’ अपवाद है, जिसमें सभी भारतीय भाषा के फिल्म निर्माताओं को प्रभावित किया है । आमिर खान के समाज के बीच विशिष्ट छाप का कारण उनका ‘बेटी बचाओ’ अभियान भी है ।
‘इंदू सरकार’ की ओर फिर लौटना पड़ रहा है । कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही फिल्म को राजनीतिक का जरिया बनाकर इसकी कलात्मक छवि बिगाड़ी है । सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्रगान गाने और उस समय खड़े होने का संदेश देने के लिए सिनेमा हॉलों की मदद लेनी पड़ी । फिल्म शुरू होने से पहले बजाने का सिलसिला शुरू हुआ । क्योंकि फिल्म समाप्त होने के बाद राष्ट्रगान बजाने के समय दर्शक निकल जाते थे । उसी सुप्रीम कोर्ट को ‘इंदू सरकार’ पर रोक लगाने की याचिका खारिज करनी पड़ी । खुद को संजय गांधी की ‘जैविक’ बेटी बताकर प्रिया सिंह पॉल ने यह याचिका लगाकर दरअसल कांग्रेस का नुकसान और निर्माता को मालामाल किया । निर्माताओं को फिल्म से जुड़े विवाद और फसाद कोर्ट में जाने का इंतजार रहता है । मीडिया के जरिए दर्शकों की उत्सुकता बढ़ती है और उसी से निर्माताओं की कमाई बढ़ती है । दर्शक इस विवाद की गिरफ्त से मुक्ति पाने के लिए छटपटा रहे हैं । प्रायः विवादित फिल्मों के निर्माताओं के मुंह से ही सेंसर बोर्ड के बारे में जानकारी दर्शकों तक पहुंचती है । प्रकाश झा ने भी ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ पर कैंची मारने के कारण सेंसर बोर्ड को एक सदी पहले के एजेंडे पर चलनेवाली संस्था बताते हुए कहा कि आज सेंसर बोर्ड की जरूरत ही नहीं है । उन्होंने श्याम बेनेगल कमिटी का हवाला दिया, जिसमें सेंसर बोर्ड में आचूलमूल परिवर्तन करके इसे स्वतंत्र संस्था बनाने की अनुशंसा की गयी है । मगर निर्माताओं की ‘प्रोगेसिव’ सोच को क्या हो गया है? इनकी जवाबदेही क्या समाज के सिर्फ अप्रिय सत्य पर मनमाना लेप चढ़ाकर प्रदूषित दिमाग की बोली लगानी है?
मसाला फिल्मों के नचनियां स्टार समाज में दीवानगी जगाते हैं और फिर जनभावना का शोषण करके जनप्रतिनिधि बन जाते हैं । संसद में घुसने के बावजूद ये बॉलीवुड से बाहर नहीं निकलते । राजनीतिक दलों के जनता से सरोकार कम होते जाने का सबसे ज्यादा फायदा फिल्मस्टार उठा रहे हैं। कानून का शासन के कबाड़ा का आलम ये है कि संसद ‘ला मेकर’ की जगह ‘फिल्ममेकर’ का जमावड़ा होता जा रहा है ।
चलते-चलते इतिहास के गर्त में पड़े एक भूले-भटके अध्याय की याद आ गयी है और वो हैं कालजयी श्रृत्विक घटक । पैसे और चकाचौंध के अभाव में श्रृत्विक घटक को फिल्म जगत के इतिहास ने उन्हें ‘महान’ फिल्मकारों के समान जगह नहीं दी । सत्यजित रे जैसे निर्देशक-निर्माता ने घटक को फिल्म निर्देशन का गुरू बताया था । 1950 के दशक में पूर्वी पाकिस्तान(आज का बांग्लादेश) से आकर बंगाल में फिल्म की निर्माण थीम माटी और सामाजिक यथार्थ से जोड़नेवाले श्रृत्विक घटक ‘ओपार बांग्ला’ जैसी फिल्मों की प्रसिद्धि जीते-जी नहीं देख पाए । 1976 में घटक की गरीबी में असामयिक मौत के बाद दर्शकों ने उनका नाम जाना । ऐसे ही निर्देशक थे, घटक के समकालीन राजन तरफदार । सत्यजित रे और मृणाल सेन की तरह इन निर्देशकों के पास फिल्म चलाने के गुर नहीं थे । श्रृत्विक घटक और राजन तरफदार दोनों ही मुफलिसी के कारण कम फिल्म बना पाए । घटक का नाम तो फिर भी लोग याद कर लेते हैं । मगर 1987 में मृत्यु के 100 साल बाद भी राजन बीती कहानी हैं । उनकी अंतिम फिल्म ‘नागपाश’ को जाने माने फिल्मकार गौतम घोष अमर प्रोडक्शन बताते हैं ।