सारंगी
बलुआही घाट के किनारे स्थित मंदिर कई मायने में गांव के अन्य मंदिरों से विशिष्ट और अद्भुत है । घाट से सटा हुआ श्मशान है । गांववालों का कहना है कि उस मंदिर से सारंगी की आवाज आती रहती है । गांव से बाहर सुनसान या श्मशान के आसपास वाले मंदिर से कोई आवाज आती है तो उसे लोग भुतहा कहते हैं । डर के मारे शाम से उस रास्ते से आवाजाही बंद हो जाती है । दिन को भी लोग प्रायः उधर जाने से परहेज करते हैं ।
लेकिन बलुआही घाट मंदिर की कहानी बिल्कुल उससे उलट है । मंदिर के पीछेवाला रास्ता जंगल जैसा है । उधर से रात भर आना.जाना लगा रहता है । सांरगी की आवाज कानों में पड़ते ही राहगीर बटोही निर्भय हो जाता है । अगर पहले से किसी भूत.प्रेत की आशंका से मन में डर की भावना रहती है तो सारंगी की धुन भय खतम कर देती है । थके.मांदे लोग रात में मंदिर में बिल्कुल निश्चिन्त होकर सो भी जाते हैं । उस मंदिर में रखी सारंगी की कथा कुछ इस प्रकार है । सारंगी पर कबीर पद गा.गाकर भीख मांगनेवाले गेरूआ अंगवस्त्रधारियों को गांव में लोग गुदरिया बबाजी कहते हैं । ऐसे ही एक गुदरिया ने घाट से गुजरते समय एक ग्रामीण को नदी के बीचोबीच तेज लहर में देखा । उसकी नाव भंवर के मुहाने पर थी और नियंत्रित नहीं हो पा रही थी ।
गुदरिया ने किनारे नाव बांधने के लिए खूंटे से बंधी रस्सी खोली । फिर अपनी सबसे प्रिय चीज और जीविका सारंगी के दोनों हिस्से से रस्सी बांधकर इस हिसाब से फेंका ताकि नाव में ही गिरे । भंवर में नाचती डगमगाती नाव में पानी भर चुका था । लेकिन मौत से जूझ रहे उस ग्रामीण ने तुरंत लपक लिया । रस्सी का दूसरा छोर पकड़कर गुदरिया ने धीरे-धीरे नाव को किनारे की तरफ खींचना शुरू किया । लहर की ताकत के आगे रस्सी हाथ से छूट गयी तो गुदरिया अपनी जान की परवाह न कर नदी में कूद पड़ा । डूबते को गुदरिया ने भंवर को चीरते हुए एक हाथ से ही किनारे की ओर उछाल दिया । तबतक शाम को काम से लौटकर नदी पार करनेवाले लोग नाव के इंतजार में किनारे जुट गए थे । डूबता आदमी तो बच गया । मगर एक हाथ से बैलेंस नहीं रहने के कारण गुदरिया को भंवर ने अपनी चपेट में लेकर अतल गहराई में ढकेल दिया । गुदरिया को बचाने नदी में कूदे दो.तीन युवकों को गुदरिया और नाव का कोई अता.पता नहीं चला ।
जिस व्यक्ति की जान गुदरिया बबाजी ने बचायी, उसे अगले दिन सुबह उस तट पर एक पेड़ के तने से अटकी सारंगी दिखी । ग्रामीण ने सारंगी को एक देवदूत की संजीवनी समझकर सिर से लगाया और उसी क्षण गुदरिया बबाजी की स्मृति में मंदिर निर्माण का संकल्प ले लिया । उसने अपनी सारी जमीन जायदात बेचकर मंदिर में लगा दिया और अपना जीवन मंदिर को समर्पित कर दिया । फिर गांव के लोगों ने स्वेच्छा से चंदा देकर मंदिर बनवाया । मंदिर में मूर्ति के साथ प्राणप्रतिष्ठा करके सारंगी भी स्थापित की गयी । बुढ़ापे की अंतिम सीढ़ियां गिन रहे ये ग्रामीण दामोदर ने मंदिर के प्रबंधन संचालन से खुद को अलग रखा है । रोज सुबह सारंगी को माथे से लगाते हैं, पोंछपाछकर रखते हैं । सुबह से लेकर रात.विरात जो भी सारंगिया उधर से गुजरते हैं, उन्हें भोजन कराते हैं और उनके विश्राम की व्यवस्था करते हैं । सारंगी से धुन चौबीसो घंटे निकलती रहती है.
आतम में परमातम दरसै परमातम में झांईं झांईं में परछाईं दरसै लखे कबीरा साईं बंजर होते पिछवाड़े में
घास लता उग आए पौधा पालना अच्छा है कुत्ता.बिल्ली के बजाए