नौकरी
इलाके के बड़े जमीन्दार और पूर्व पंचायत प्रमुख राम बुझावन बाबू के दालान पर शाम को बैठकी जमती है । चाय, पान, खैनी का दौर चलता रहता है । गांव और आसपास के टोले के पांच-सात लोगों का हर समय आना-जाना लगा रहता है। उनमें से एक हैं दिगंबरजी, जो सबसे पहले आते हैं और सबसे बाद में जाते हैं । प्रायः रात को रह भी जाते हैं । ये राम बुझावन बाबू के करीबी लगुओं-फगुओं में से हैं । कोर्ट-कचहरी या पंचैती वगैरह में कहीं जाने के समय भी दिगंबरजी साथ रहते हैं ।
राम बुझावन बाबू के पुत्र बड़े सरकारी अधिकारी हैं । जमीन्दार साहब ने अपने एकाध बटाईदारों और करीबियों के बेटों की नौकरी लगवायी है । वे लोग उनकी सेवा में लगे रहते हैं । बैठकी के दौरान राम बुझावन बाबू को सुनते रहने के लिए जुटनेवाले ज्यादा वही लोग हैं, जिनकी गांव में इसलिए धाक है कि बुझावन बाबू के नजदीकी हैं । थाना, ब्लॉक वाले भी उनसे अच्छे से बात करते हैं ।
राम बुझावन बाबू अपनी एकतरफा बैठकी चर्चा में वैसी बातों का प्रसंग जरूर उठाते हैं, जिसमें उन्होंने किसी को उपकृत किया हो और किसी पर एहसान किया हो । लगभग हमेशा वे वैसे लगुओं-फगुओं की मौजूदगी में सुनाते हैं कि किस प्रकार सेवा के प्रतिफल में उनके बेटों को राम बुझावन बाबू के प्रसादात् नौकरी मिली ।
काफी दिन तक कृतज्ञता के भाव से दिगम्बर जी एहसानमंद होने के कारण झेलते रहते हैं । दिगम्बरजी को अपने बेटे की सिपाही की नौकरी राम बुझावन बाबू की कृपा से लगने की बात गाहे-बगाहे सुननी पड़ती है । अन्य ग्रामीणों के सामने और अकेले में भी बार-बार एक ही एहसान दुहराए जाने से दिगंबरजी का मन खिन्न हो जाता है । न उनके लिए संबंध निभाते बनता है, न तोड़ते । वे एहसान फरामोश और कृतघ्न के रूप में प्रचारित नहीं होना चाहते । यह असंतोष कहां बोलें, किससे बोलें ।
राम बुझावन बाबू के मैनेजर से दिगम्बरजी की अंतरंग बातचीत होती रहती है । रामबुझावन बाबू के व्यवहार से दुखी रहनेवाले मैनेजर दिगम्बरजी का दर्द समझते हैं ।
राम बुझावन बाबू की गैरमौजूदगी में मैनेजर के पास आखिर एक दिन दिगम्बरजी का आंसू भरा दर्द फूट पड़ता है - ‘जब हमको लग जाएगा कि राम बुझावन बाबू से दिल टूट गया है और इनसे संबंध निभाना हमसे पार नहीं लगनेवाला है, तो अपना बेटा को बोलेंगे पहले तू नौकरी छोड़ ।’
जान और जगह
- शशिधर खान
खेत बाढ़ से जलमग्न है । कमर से ऊपर तक पानी के नीचे खड़ी फसल है । मकानों के अंदर पानी बहने से गांव के लोग फूस और खपरैल की छत पर शरण लेने जाते हैं तो चूहे, सांप को जान बचाना मुश्किल हो जाता है । भारी वर्षा से बढ़ते जलस्तर के कारण छत भी गिर जाती है । लोग तटबंधों और खेतों में इक्का-दुक्का विशाल जामुन, पीपल के पेड़ों पर शरण लेने को मजबूर हैं । यही पेड़ सांप और चूहे दोनों की आश्रयस्थली है । ऊपर बिल्ली और नेवला भी है । सांप भूखा है और बिल्ली भी भूखी है । दोनों के मुंह के पास चूहा है । पानी की लहर भी मुंह से सट रही है । सांप आंखें बंद किए पड़ा है । बिल्ली की भी वही हालत है । मगर बेचैन चूहा जगा है । पेड़ की डाल पर ऊपर-नीचे कर रहा है । सांप को चेताए बिना रहा नहीं जाता है - ‘ए चूहे ज्यादा उछल कूद मत कर, तेरे को निगलने में मुझे कितना समय लगेगा, ऊपर बिल्ली भी बैठी है । एक झपट्टे में तेरी जान चली जाएगी ।
चूहा जरा भी डरे बिना ढिठाई से कहता है - ‘तू और बिल्ली दोनों मेरी तरह अपनी जान बचाने के लिए पेड़ पर है । तेरे मुंह उठाने से पहले मैं ऊपर चढ़ जाऊंगा । तू ऊपर चढ़ेगा तो चारों तरफ पेड़ से चिपके और सांप गिरने के डर से तुझे आगे नहीं बढ़ने देंगे ।’
विषम परिस्थिति का तत्वबोध सांप को चूहा कराता है - ‘आपस में लड़ोगे तो नीचे पानी में गिरोगे । सांप तेज धार में अपनी जान बचाएगा या चूहा खाएगा । अगर किसी तरह वापस पेड़ के पास आ भी गए तो फिर आश्रय के लिए पेड़ पर जगह भी नहीं मिलेगी । आस-पास दूसरा पेड़ नहीं । पेड़ के नीचे बहकर आ रहे कितने सांप चूहों को जान के लाले पड़े हैं। बारिश से बचने के लिए तूने टहनियों से ढंका घोंसला हड़पा । जरा सा ससरे तो जगह और जान दोनों जा सकती है । ऊपर पानी नीचे पानी । फन उठा के थोड़ा आगे भी देख । हम दोनों के जान के दुश्मन ये इन्सान तेज बहाव में मरने के डर से टूटे तटबंध के पास एक इंच जगह के लिए झगड़ रहे हैं । ये रात भर जगते हैं, हमलोग सोते हैं ।’
सांप को जवाबी चेतावनी चूहा देता है - ‘और हां, ऊपर मोटी डाल पर बैठे नेवले को मैंने दो-बार तेरी ओर देखके आंखें बंद करते देखा है । हमले के लिए झपटा तो तेरी वाली गत का डर है । तेरे को बिल्ली को दिखाई दे गयी, लेकिन नेवला नजर नहीं आया ।’
- शशिधर खान
महेश प्रसाद संपन्न किसान हैं । इन्होंने बहुत सारी गायें, भैंसें पाल रखी हैं । न ये दूध बेचते हैं, न बैल खरीदते हैं । बड़े मवेशी घर के लिए दो-तीन चरवाहे महेश प्रसाद हमेशा रखते हैं । बछड़ों को दूध पिलाने से हट्टे-कट्टे बैलों को सामने की डगर से आते-जाते लोग देखते रहते हैं । सबसे ज्यादा दूध देनेवाली दो गायें बड़ी नखरे वाली हैं । एक ही चरवाहे को दूहने देती है, जो सबसे पुराना है । दूध-दही खूब खाने को मिलने के बावजूद चरवाहे मालिक के कड़े मिजाज के कारण ज्यादा दिन नहीं टिकते । एकमात्र मोती राम है, जो टिका रह गया । सहूलियत के लिए बेटे को भी ले आया । मोती राम को गाय-गोबर से लेकर मवेशियों को पानी पिलाने और चारा-घास लाने मांड़-भूसा मिलाकर बैलों का भोजन सानी बनाने में आसानी हुई ।
शहर में नौकरी कर रहे मालिक के बड़े पुत्र ने पुराने चरवाहे मोतीराम के लड़के को देखा तो अपने साथ लिये चले गए । उन्हें घर के नौकर की जरूरत थी । दुर्योगवश मोतीराम का बेटा एक-डेढ़ साल बाद बीमार पड़ गया । बीमारी ऐसी कि काफी इलाज के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका । मई का महीना था । मालिक महेश प्रसाद का छोटा लड़का बिट्टू कॉलेज से गर्मी की छुट्टी में गांव आया, तो उसे यह समाचार सुनकर बहुत दुख हुआ । मोतीराम ने उसे गोद में खेलाया था । मोतीराम श्राद्ध आदि कर्म के लिए अपने घर गया हुआ था । बिट्टू उसके घर ढाढ़स देने चला गया । पिता ने उस रास्ते से जाते-आते देख लिया था । लौटते ही उन्होंने बिट्टू से पूछ दिया - ‘मोतिया के घर गए थे क्या?’
मोती के घर में उसकी मां-बहन को रोते देखकर लौटे बिट्टू ने पिता की ओर देखे बिना धीरे से कहा - ‘हां’ ।
पिता ने बड़े सहज भाव से पुत्र को समझाने के अंदाज में कहा - ‘अरे इन रैयतों को बेटा-बेटी के मरने से कोई सदमा नहीं होता । फिर जन्मा लेंगे । राशन दे दो, पैसे दे दो, श्राद्ध के लिए अपनी बिरादरी को खिलाने के लिए मदद कर दो, बस । सब सदमा खतम । बिट्टू को पिता से कुछ कहते नहीं बना, मन हल्का करने के लिए वो खेत की ओर निकल गया । संवेदनशील बिट्टू कई रात को सो नहीं पाया । उसने खुद को सपने में ‘मोतिया’ के परिवारजनों के साथ गले लगकर रोते देखा ।