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कोरोना मौत फांस में फफकती टीका जिजीविषा

‘अब तो घबरा के यह कहते हैं कि मर जाएंगे मर के भी चैन नहीं पाया तो किधर जाएंगे’

मशहूर शायर जौक की यह सूफी पंक्ति कोरोना / कोविड-19 महामारी से दहशतजदा समाज की बद से बदतर होती हालत में बिल्कुल फिट और युक्तिसंगत बैठती है । कोरोना महामारी के प्रकोप से पहले जो सामान्य मौतें होती थीं तो कम-से-कम इतना साहस लोगों में था कि लाशों से नहीं डरते थे । अपने परिवार और समाज में अगर किसी की मौत हो जाए तो श्मशान ले जाने के लिए कंधा देने से पहले ही भूत-प्रेत का साया पीछा करता नहीं दिखाई देता था । बेचैनी का कारण परिजनों, पड़ोसियों से बिछुड़ने का दुख, संताप था । आज लोगों को कोरोना मृतकों के भूत चैन नहीं लेने दे रहे हैं और लाशों को चैन से मुक्ति नहीं मिल पा रही हैं । लोग अपने कोरोना संक्रमित परिजनों के फड़फड़ाते फेफड़े से ही दूर भागते हैं और सांस बंद होने के बाद पास जाने से डरते हैं । ऐसे हालात अनियंत्रित कोरोना महामारी के चलते नहीं, कोरोना से बचाव के दावों के लिए टीकाकरण अभियान के बहुप्रचारित आंकड़ों के चलते पैदा हुए हैं । कोरोना संक्रमण से बचाने के लिए लोगों के अंदर जिजीविषा टीकाकरण प्रचार के जबर्दश्त अभियान के जरिए पैदा की जा रही है । टीका डोज आंकड़े का जबर्दश्त प्रचार और संक्रमितों की मौतों का आंकड़ा यमराज के पास भेजने का अभियान चल रहा है । आप टीके लगवाएं और इस पर काबू पाने के सरकारी दावों की ‘टॉनिक’ से अपने अंदर ‘इम्यूनिटी’(प्रतिरोधक क्षमता) जगाकर कोरोना का खौफ भगाएं । ‘सबका प्रयास सबका साथ’ के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लगभग रोजमर्रे के दावे देखकर और उनके ‘मन की बात’ आकाशवाणी से सुनकर देशवासी कोरोना नियंत्रण में भारत के ‘विश्व रिकार्ड’ से ‘गदगद’ हैं । कोरोना मौतों का गम ‘राष्ट्रहित’ में लोग भुलाए दे रहे हैं ।

अवाम को दशहत से बचाने के लिए कोरोना से मौतों के आंकड़े नहीं जुटाए जाते । लाशों को ठिकाने लगा दिया जाता है, ताकि स्वस्थ लोग संक्रमित न हों, दाह-संस्कार का झंझट न हो । भाजपा सरकार को आम जनता के लिए बहुत ‘दर्द’ है । कोरोना से आर्थिक बदहाली झेल रहे मजदूर और निम्न आयवर्ग के लोगों का खर्चा बचाने के लिए शायद ऐसा किया जा रहा है । लॉकडाउन में अन्य बीमारियों से मरनेवालों की अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए भी लोगों का जुटना मुश्किल था । सरकार ने नागरिकों को कितनी राहत दी । केंद्र समेत विभिन्न राज्य सरकारों को भी राहत मिली, जिन्होंने कोरोना मौत का शिकार हुए लोगों के परिजनों के लिए मुआवजा राशि का एलान किया था । पहले तो उसे लाश मिलनी मुश्किल है । अगर मिल भी जाए तो उसकी पुष्टि होनी मुश्किल है कि मौत कोरोना से हुई है । पुष्टि के कागजात पाने के लिए दौड़ते रहिए ।

सरकारी नीति के अनुसार लोग इस पीड़ा को ‘पीएं’ और सिर्फ टीकाकरण आंकड़े के प्रचार से सरकारी बचाव अभियान का भागीदार बनें । कितनी मौतें अबतक हुई और कितने पीड़ित परिवार को मुआवजा मिला, इसका आंकड़ा केंद्र सरकार के पास उपलब्ध नहीं है । टीकाकरण और आंकड़ा प्रचार अभियान की कमान सबसे बड़े स्टार प्रचारक नरेंद्र मोदी ने स्वयं थाम रखी है । भाजपा शासित राज्य सरकारों की ओर से तो नरेंद्र मोदी स्वयं हैं । गैर-भाजपा शासित राज्यों में भी कोरोना बचाव उपायों का श्रेय नरेंद्र मोदी ने खुद को दे रखा है और गड़बड़ी के लिए केंद्र की नीतियों का अनुसरण न करना दोषी है । तीसरी-चौथी लहर की दस्तक के बीच 03/09/2021 को सुप्रीम कोर्ट पीठ ने केंद्र सरकार से दोबारा पूछा कि कोविड-19 से हुई मौतों का प्रमाणपत्र देने में देर क्यों की जा रही है । जस्टिस एम. आर. शाह तथा जस्टिस अनिरूद्ध बोस की पीठ ने उस समय फटकार लगायी जब सरकार की ओर से पेश सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने और समय मांगा ।

30 जन को ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पीड़ितों के लिए राहत उपायों और जिनकी कोरोना से मृत्यु हुई, उसके परिवारजनों को मुआवजा का विवरण प्रस्तुत करने कहा । सरकार द्वारा मागा गया समय बीतने के बाद 18 अगस्त और फिर तीन सितंबर की सुनवाई में भी सरकार ने इस काम को रामभरोसे रखा । संवेदनशीलता के अन्य मामले में इसके पहले 01/09/2021 को सुप्रीम कोर्ट को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश देना पड़ा कि मानसिक रोगियों के लिए बने स्वास्थ्य केंद्रों में निश्चित समय सीमा के अन्दर टीका लगाये जाये । महाराष्ट्र सरकार द्वारा ऐसे रोगियों को भिखारी घरों/ हिरासत वाली संस्थाओं में भेजने की प्रवृत्ति को मानसिक हेल्थ केयर एक्ट 2017 के खिलाफ बताया और महाराष्ट्र सरकार की सफाई पर असंतोष जताया । उत्तर प्रदेश सराकर ने भी बुजुर्गों के आश्रय स्थलों को सिर्फ हाफवे-घरों में डिजाइन करके पल्ला झारने पर शीर्ष कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की ।

कोरोना से अनाथ हुए बच्चों की परवरिश का दायित्व भी सरकार ने सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में जवाब देकर निभा दिया । जबकि संसद के मानसून सत्र में भाजपा के ही एक सदस्य के सवाल के जवाब में केंद्रीय महिला व बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने 29 जुलाई को बताया कि पूरे देश में माता-पिता दोनों की मौत से 645 बच्चे अनाथ हुए हैं ।

पारिवारिक - सामाजिक रिश्तों के तार तो देश-विदेश में फैले ज्वाइंटों पर आत्मकेंद्रित शॉर्टसर्किट फ्यूजों के कारण काफी पहले से टूटे चल रहे थे । लेकिन लोगों में भावनाएं थीं, मानवीय रिश्तों में संवेदनहीन राजनीति नहीं घुसी थी ।

कोरोना महामारी ने पूरी सामाजिक-व्यवस्था, जन-जीवन, आर्थिक-पारिवारिक ढांचे को तहस-नहस करके रख दिया । इसका सबसे बड़ा कारण है, कोरोना का राजनीतिक संक्रमण का शिकार होना । लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करके कोरोना बचाव के सभी सरकारी उपायों को ही संक्रमित कर दिया गया है और उस पार्थिव तवे पर बेदर्द सियासी राजनीति की ठंडी रोटियां सिंक रही है ।

आजादी के अमृत महोत्सव के बहुप्रचारित सरकारी आयोजनों में कोरोना के अंतहीन लहरों और उसके बचाव में आए दिन नए-नए टीकों में मौत जिजीविषा झेल रहे आम आदमी की भागीदारी नहीं है । सरकारी दावे सिर्फ टीका लगवाने और उसे दर्ज कराने तक सीमित है, ताकि आंकड़ों का बढ़ता जाना दिखाया जाए । टीका लगवाने के बावजूद संक्रमित होने और उससे मौत के लिए सरकार जिम्मेदार नहीं है । इसका कारण कोई अन्य बीमारी या शरीर अंदर से कमजोर होना ही हो सकता है, जिसका इलाज टीका में नहीं है । दो साल से ज्यादा गुजरने को है । पहली लहर से लेकर तीसरी लहर तक, लॉकडाउन से अनलॉक सिलसिला तक और कोवेक्सीन से शुरू होकर कोविशील्ड, डेल्टा, जायकोव डी, स्पुतनिक की लंबी श्रृंखला से पैदा हुई अराजक स्थिति से लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं । लेकिन इससे त्रस्त मतदाताओं को वोट डालने के लिए कोरोना की परवाह न करने लायक मजबूत रखने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रतिबद्ध हैं ।

नरेंद्र मोदी और भाजपा के सभी बड़े नेता वैसे तो अपने हर काम को ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हैं । लेकिन 26 अगस्त को सिर्फ एक दिन में एक कराड़ टीका लगाने के पहले दौर को महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया । लेकिन 28 अगस्त को देश की जनता का ध्यान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) के एक बयान की ओर भी गया । दीदी ने नरेंद्र मोदी के टीका दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा - ‘भाजपा सरकार के लोग सिर्फ टीका प्रमाणपत्रों पर अपने फोटो लगाते हैं, मैंने उनसे कहा कि कोरोना मौत प्रमाणपत्रों पर भी फोटो लगाएं । मेरे राज्य में भी कोविड प्रमाणपत्रों पर मेरी तस्वीरों का इस्तेमाल होता था । मैंने उससे इन्कार कर दिया और राष्ट्रध्वज का इस्तेमाल करने कहा ।’

इसका मतलब स्पष्ट है कि भाजपा की टीकाकरण सावधानी और कोरोना मौतों का सुविधानुसार सियासी राजनीति का हथकंडा बनाने में तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी भी पीछे नहीं हैं । संक्रमितों के इलाज में अपनी जान जोखिम में डालकर जुटे डॉक्टरों, स्वास्थ्य, सफाई कर्मियों और अस्पतालों के कर्मचारियों का दुख देखने समझने की जरूरत किसी सरकार ने नहीं समझी । जिनकी बदौलत दावे प्रचारित किए जा रहे हैं, जो अपने चारों तरफ मुंह बाए खड़ी मौतों के बीच कोरोना संक्रमितों के इलाज में जुटे हैं, उनके लिए किसी के दिल में न दर्द है, न मर्म । केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के पास इसका कोई आंकड़ा नहीं है कि कितने डॉक्टर, नर्स और आशा कार्यकर्ता समेत अन्य स्वास्थ्यकर्मी कोरोना संक्रमित होकर मौत के शिकार हुए । किसी डॉक्टर, नर्स या आशा दीदी के परिजनों को मौत का मुआवजा मिला या नहीं, इसकी भी कोई पक्की सूचना केंद्र समेत राज्य सरकारों के पास भी नहीं है ।

कोरोना संक्रमित डॉक्टर या सहयोगी कपांडर, नर्स को देखने कोई सरकारी अधिकारी गए हों, उनके परिवार की आर्थिक हालत की जानकारी तक ली गयी हो, ऐसी कोई खबर, अखबार, टीवी में नहीं आती । राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली समेत कुछ राज्यों में डॉक्टरों, नर्सों की हर माह वेतन के लिए हड़ताल और ऐसी विषम परिस्थिति में अपने परिवार को दांव पर लगाकर ड्यूटी के लिए मानदेय बढ़ाने की हड़ताल की रिपोर्ट है ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहे कोई भी बेबनार मंच, आयोजन, सम्मेलन क्यों न हो, कोरोना को जंग और जंग जीतने में दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा कामयाबी हासिल करने की बात जोर देकर बोलना नहीं चूकते । लेकिन इस जंग में शहीद होनेवाले स्वास्थ्यकर्मियों का बलिदान उनके लिए कोई मायने नहीं रखता । बिना हथियार, खून-खराबा, मोर्चाबंदी के आम लोगों और उन्हें बचाने में अपनी जान गंवाने वाले स्वास्थ्यकर्मियों के योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता । सुदूर देहातों में, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में और रेफरल अस्पतालों में पर्याप्त इलाज की सुविधा नहीं हैं, आंगनबाड़ी, आशा, जीविका दीदियां गरीब-गुरबा अनपढ़ महिलाओं के लिए बीमारी की हालत में आशा का संचार करने में सहायता पहुंचा रही हैं । इनकी सेवा का मोल भले न हो, कम-से-कम जीविका पर आफत न हो । देश के किसी भी राज्य की गैर-सरकारी रिपोर्ट उलटाकर देख लीजिए, जमीनी स्तर की इन स्वास्थ्य कर्मियों ने सरकारी डयूटी पारिवारिक ड्यूटी की तरह निभायी । सबसे ज्यादा संक्रमित राज्य महाराष्ट्र में निःस्वार्थ कल्याण के लिए समर्पित इन सेवा दीदियों को मानदेय के लिए हड़ताल करनी पड़ी । दूसरे सबसे ज्यादा संक्रमित राज्य केरल में भी आशा दीदियों को सेवा छोड़कर सड़क पर मार्च करनी पड़ी । कई राज्यों से ऐसी ही रिपोर्ट है । आशा कार्यकर्ताओं से सबसे ज्यादा महानगरों में रोजी / दिहाड़ी पर अपना और परिवार का भरण-भोषण करनेवाले प्रवासी मजदूरों के पत्नियों, बालबच्चों को राहत मिली ।

2021 के कोरोना लहर में टोक्यो ओलंपिक, पारालंपिक हुए । देश के लिए रिकार्ड तोड़ मेडल जीतकर लानेवाले खेल योद्धाओं के लिए उनके गृह राज्यों की सरकारों ने करोड़ों रूपये ईनाम का ऐलान कर डाला । प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति ने खुद फोन करके बधाई दी । 06/09/2021 करे स्वदेश लौटने पर खेल योद्धाओं को गर्मजोशी से स्वागत हुआ । कोरोना योद्धाओं की ऐसी नसीब कहां । उन रूपयों का शतांश भी अगर नियमित वेतन भुगतान, मुआवजे और मानदेय के रूप में कोरोना योद्धाओं को मिल जाता तो उनकी सेवा के प्रति समर्पण बढ़ जाता । उस समय तो वे परिवार के भरण-पोषण के लिए हड़ताल पर थे ।

कोरोना से लड़ रहे जापान के प्रधानमंत्री योशीहिदे सूगा ने टोक्यो पारालंपिक समापन से दो दिन पहले तीन सितंबर को कोविड पर काबू न पाने से बढ़ते जन असंतोष के कारण पद से इस्तीफा दे दिया । भारत में तो कोरोना जंग जीतने में दुनिया को पीछे छोड़ने का दुष्प्रचार सत्ता से चिपके रहने की उम्मीद में किया जा रहा है ।

लॉकडाउन के बाद प्रवासी मजदूर काम से हटा दिए गए और बस, ट्रेन बंद होने के चलते अपने गांव पहुंचने के रास्ते में दर-दर भटकते कोरोना संक्रमण, मौतों के शिकार हुए । संसद के मानसून सत्र में 27 जुलाई, 2021 को इस संबंध में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्वनी कुमार चौबे ने साफ कह दिया कि उनके पास इसका कोई आंकड़ा नहीं है कि कोरोना लॉकडाउन/अनलॉक में कितने प्रवासी मजदूर संक्रमित हुए और कितनों की मौत हुई । श्रम मंत्रालय से सम्बद्ध संसद की स्थायी समिति ने अगस्त के पहले सप्ताह में संसद को सौंपी गयी रिपोर्ट में मंत्रालय की खिचाई की । श्रम मंत्रालय के पास भी कोरोना से हुई प्रवासी मजदूरों की मौत का आंकड़ा नहीं था और काम से हटाये गये कामगारों के लिए राहत उपायों की सूचना नहीं थी । इन प्रवासियों में सबसे ज्यादा बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश के खेतिहर मजदूर थे । उत्तर प्रदेश सरकार के पास कोरोना लॉकडाउन में कुंभ मेले में संक्रमित मौत के शिकार ‘भक्तों’ का आंकड़ा था । लेकिन स्वास्थ्यकर्मियों और मजदूरों की मौत का विवरण नहीं था । ममता बनर्जी ने इतना जरूर किया कि कोरोना से रोजी गंवाने वाले अपने वहां के कामगोरों को स्वास्थ्य केन्द्रों में कोरोना योद्धा बना दिया ।

अगस्त, 2021 क आतम सप्ताह म बिहार के जद(यू), भाजपा गठजाड़ सरकार के मुख्यमत्रा नाताश कुमार अपनी पार्टी की राष्ट्रीय कौंसिल की बैठक कर रहे थे और जातीय जनगणना पर जोर दिया जा रहा था, ताकि सभी जातियों का आंकड़ा जुटाया जाए । लेकिन बिहार सरकार के पास डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों और अपने प्रवासी मजदूरों की मौतों का आंकड़ा नहीं था । जब सम्मेलन चल रहा था, उसी समय राजधानी पटना के नजदीकी प्रखंड के कोरोना रेफरल अस्पताल में एक डॉक्टर की मृत्यु की पुष्टि कराने के लिए उनकी पत्नी अचंल अधिकारी का बार-बार चक्कर लगा रही थी । जब एक मृत डॉक्टर की पत्नी को मुआवजे के लिए यह प्रमाण लेना कठिन हो गया, कि मौत कोरोना से हुई तो अस्पतालों में अन्य संक्रमितों की दुर्गति का अंदाजा लग जाता है । 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के दिन बिहार से रिपोर्ट मिली की कोरोना से मृत शिक्षकों के परिजन प्रमाण पत्र के लिए भटक रहे थे । प्राइमरी और मिडिल स्कूल के उन शिक्षकों की ड्यूटी कोरोनटाइन सेन्टरों और कोरोना संक्रमितों को लानेवाली बसों में लगी थी । न उन्हें कोरोना योद्धा माना गया न उनके परिवार को मुआवजा मिला । एक पेट्रोल पंप खड़े स्कूटी और मोटरसाइकिल सवारों की बातचीत- सामने लगा बड़ा सा पोस्टर पर देखिए क्या लिखा है - “मुफ्त टीकाकरण, धन्यवाद मोदी जी, दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान” देख लिया, सारी कमाई गाड़ी के तल, रसोई तेल, गैस और गैस पर सब्सिडी सब सरकार को दीजिए, टीका मुफ्त लीजिए मोदी जी को धन्यवाद देते हुए “उनका साथ, उनका विकास” बनाए रखिए ।’ यह उस समय की रिपोर्ट है, जब प्रधानमंत्री ने कहा कि खाद्य तेलों के लिए 11000 करोड़ का निवेश किया गया है । लोक उपक्रम की बड़ी-बड़ी कंपनियों को प्रधानमंत्री के करीबी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया अंतिम चरण में थी । कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसके खिलाफ आवाज उठायी तो केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा - ‘राहुल गांधी को इसकी समझ नहीं है ।’ विपक्षी दल जनता को गुमराह कर रहे हैं और कोरोना पर सरकार की नकारात्मक सोच के खिलाफ लिखने बोलनेवाले पत्रकार, मीडियाकर्मी ‘देशद्रोही’ हैं । बिहार, उत्तर प्रदेश सीमा पर गंगा में बहती पायी गयीं कोरोना लाशों की खबर उजागर करनेवाली मीडिया के खिलाफ सरकार सुप्रीम कोर्ट गयी । संवेदनशील सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मीडिया पर अंकुश लगाने कहा कि ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग न करे । शुक्र है, सुप्रीम कोर्ट का जजों ने सरकार को फटकारते हुए कहा कि मीडिया की ही बदौलत ऐसी बेदर्द घटना की जानकारी लोगों तक पहुंची और मीडिया पर सरकार के अनुसार अंकुश लगाने से इन्कार कर दिया । इस मामले की सुनवाई करनेवाली सुप्रीम कोर्ट पीठ के अध्यक्ष चीफ जस्टिस एन. बी. रमण स्वयं थे । सामाजिक रिश्ते और अर्थव्यवस्था को लील चुकी कोरोना की भयावहता को देखते हुए लोगों ने अपनी जीवनशैली बदल दी । व्यक्तिगत और पारिवारिक रोजमरें की जरूरतों, आदतों को कोरोना महामारी पर काबू पाने की सरकारी नीतियों के अनुसार ढाल लिया । बुजुर्गों, युवाओं, नौकरीशुदा और गृहिणी महिलाओं के अलावे बच्चों तक ने सरकार के साथ सहयोग किया । लॉक और अनलॉक प्रक्रिया की पाबंदियों में केंद्र सरकार के हर कदम को जनहित में समझ कर संयम व धैर्य रखा । कोरोना चर्चा केंद्र सरकार से शुरू होती है और वहीं समाप्त भी करने की विवशता है । क्योंकि पिछले साल पूरे दो के लिए लॉकडाउन का एलान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद किया था । कड़ाई या ढील से लेकर टीका खुराकों के निर्माण और राज्यों को उपलब्ध कराने की पूरी व्यवस्था पर केंद्र सरकार का नियंत्रण था । आज भी कोरोना लॉकडाउन और अनलॉक में अपने हिसाब से छूट या पाबंदी कम-ज्यादा करने के सीमित अधिकार राज्य सरकारों के पास हैं । देश की जनता भारत सरकार के साथ थी और आज भी है । मगर केंद्र की भाजपा नीत राष्ट्रीय गठबंधन सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी सही मायने में कोरोना पीड़ित ग्रसित आम जनता के साथ नहीं हैं । कोरोना संक्रमण से मोर्चा लेते हुए जनता आर्थिक तंगी, महंगाई और बेरोजगारी से अधमरी हो गयी । लेकिन केंद्र सरकार सिर्फ टीकाकरण के विश्व रिकार्ड बनाने के प्रचार अभियान का शोर मचाकर चुपचाप अपने सियासी स्वार्थ के एजेंडे में जुटी रही । आज कोरोना की तीसरी लहर में भी अपनी आहुति देने को मजबूर जनता कंगाल है और सरकार चहेती कंपनियां मालामाल है । 01/09/2021 की रिपोर्ट है कि अगस्त में जीएसटी(वस्तु और सेवा कर) संग्रह 1.12 लाख करोड़ का हुआ । केंद्रीय वित्त मंत्रालय के अनुसार अगस्त, 2020 के मुकाबले 30% ज्यादा है । लोगों की जेबें ढीली हो गयीं । गरीब और निम्न आय वर्ग के लोगों को दाल, सरसों तेल खरीदने की जरूरत है ।

की हिम्मत नहीं पड़ रही है । जीएसटी के तहत हर खरीदारी पर आम जनता से पैसे की वूसली होती है जो सरकार के खाते में जाता है । उसमें राज्य सरकारों से ज्यादा शेयर केंद्र सरकार का होता है । विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से तीसरी लहर के मुकाबले के लिए महंगे बूस्टर डोज के खिलाफ कड़ी चेतावनी दी कि गरीब देशों की जनता इससे वंचित रह जाएगी । दूसरी तरफ आर्थिक महाशक्ति का एकतरफा प्रचार करनेवाली नरेंद्र मोदी सरकार गरीब, कमजोर लोगों की कमाई से अपना खजाना बूस्टर करने पर तुली है ।

संसद के बजट सत्र में केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारामन ने अपने बजटीय भाषण में 6 लाख करोड़ की राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाईपलाईन योजना का एलान के समय ही आम आदमी की जिदंगी गिरवी रखकर कोरोना से बिगड़ी अर्थव्यवस्था सुधारने का संकेत दे दिया था । उसके बाद मानसून सत्र आते-आते एक ओर कोरोना ‘नियंत्रण’ में विश्व रिकार्ड बनाने का धुआंधार प्रचार और उसकी आड़ में बेरोजगारी से भुखमरी की हालत में जी रहे गरीबों के पेट का सौदा कर दिया । केंद्रीय वित्त मंत्रालय की एडवाइजरी के अनुसार ग्राम पंचायतों और ग्राम सभाओं को थोड़े-थोड़े अंतराल पर बैठकें बुलानी है । इसके अंतर्गत प्रधानमंत्री के नाम से चल रही - जन-धन योजना, कौशल विकास योजना, आवास योजना, मुद्रा योजना समेत सभी केंद्रीय योजनाओं से मिल रही राहत का टैक्स गरीबों को चुकाना है । कोरोना मार से बेसहारा होने की नौबत झेल रहे निम्न और मध्य आयवर्ग के लोगों का सबसे बड़ा सहारा था - भविष्य निधि(पीएफ) । सूदखोर साहूकार की भूमिका निभा रही केंद्र सरकार ने कोरोना की तीसरी-चौथी लहर की बढ़ती आशंका के समय पीएफ को भी लपेटे में ले लिया । नए फाइनेंस एक्ट, 2021 के अनुसार पीएफ खाते में योगदान पर मिलाने वाले जिस करमुक्त ब्याज से ज्यादातर नौकरीपेशा वाले रिटायर होने के बाद अपनी आजीविका का एकमात्र सहारा मानकर चलते हैं, उस पर भी सरकार को टैक्स देना होगा ।

मेरा मकसद यहां नकारात्मक सोच लेकर विश्लेषण और जनजीवन की तबाही का बढ़ा-चढ़ाकर खाका प्रस्तुत करना नहीं है । ‘चिराग तले अंधेरा’ वाली कहावत चरितार्थ होती देखकर चिराग के तले घंसती जमीन की वास्तविकता तो स्पष्ट करना जरूरी है । इस दिवाली में गरीब-गुरबा के घर में दीए जलने और थाली में भोजन मिलने पर आफत है । याद कीजिए, कोरोना हमले के शुरूआती दौर में हो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घरों में बत्ती बुझाकर बाहर निकलने और कैंडिल जलाकर थाली बजाकर कोरोना योद्धाओं का स्वागत करने कहा था । लोगों ने वैसा किया भी । आज इस दीवाली में आम आदमी को जो किल्लत का सामना करना पड़ रहा है कि घरों में बैठकर अंधेरे में थाली बजाकर कोविड-19 आपदा पर रोना होगा । खाने के अलावे घर के अंदर लक्ष्मीजी क पास दीए जलाने के लिए भी गरीब लोग सरसों तेल खरीदते हैं, जो अबकी उनकी औकात के बाहर है ।

दिवाली के बाद आनेवाला बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा पर्व छठ में भी दीए के लिए तेल खरीदने में गरीबों की पहले से टूटी कमर की कचूमर निकल जाएगी ‘अंधेरी-रात के दिल में दीये जला के जीयो

न मुंह छिपा के जीयो और न सर झुका के जीयो

गमों का दौर भी आए तो मुस्कुरा के जीयो’............

ये सुनने के बाद आकाशवाणी/सरकारवाणी से समाचार बुलेटिन में मुफ्त टीकाकरण का राज्यवार विश्व रिकार्ड में हिस्सेदारी का आंकड़ा आता है और बार-बार सबको टीका लगवाने के लिए प्रेरित किया जाता है । इन बुलेटिनों में मुफ्त टीकाकरण के बाद मुफ्त संक्रमण का कोई जिक्र नहीं, उससे होनेवाली मुफ्त मौतों का जिक्र नहीं । टीकाकरण और संक्रमण से बचने के लिए व्यायाम-योग-ध्यान करें । प्रधानमंत्री का ‘दवाई भी कड़ाई भी’ संदेश याद करके ध्यान में दिल में दीए जलाएं - ‘दिल जलता है तो जलने दे, आंसू न वहा फरियाद न कर’ ।

कोविड-19 से कोविड-21 आ गया । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ध्यान सिर्फ टीकाकरण और मुद्रीकरण पर केंद्रित है । डंके की चोट पर इन सारे जंगी एलानों को वे अवश्य ही कोविड-24 तक ले जाएंगे, जिसकी बदौलत उन्हें 2024 लोकसभा चुनाव जीतना है ।

एक विश्व रिकार्ड यह भी है कि कोरोना लॉकडाउन में सबसे ज्यादा समय तक स्कूल जाने से वंचित भारत के बच्चे रहे । स्कूल खोले गए और कोरोना की पहले से ज्यादा जानलेवा लहर बच्चों का पीछा कर रहा है।

स्कूलों में उपस्थिति कम है, बच्चों, अभिभावक डरे हुए हैं । जब स्कूल-कॉलेज बंद थे, तभी प्रधानमंत्री ने नयी शिक्षा नीति का एलान कर दिया । बच्चों के आगे अंधकारमय भविष्य है, पीछे संक्रमण डर है । बिना परीक्षा के अगली कक्षा में गए बच्चों का आगे क्या होगा।

पहले बुजुर्गों को टीका लगा, फिर युवा और फिर बच्चे । बच्चों पर टीका परीक्षण का जिम्मा प्रधानमंत्री के करीबी अरबपति अनिल अंबानी को दिया गया । देश के जानेमाने चिकित्सकों और स्वास्थ्य विशेषों का इसमें जल्दीबाजी से परहेज का सुझाव सरकार ने नहीं माना । प्रसिद्ध हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. नरेश त्रेहान ने चेताया कि बच्चों में कोरोना संक्रमण हुआ तो संभालना कठिन हो जाएगा । अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स), दिल्ली के विशेषज्ञ डॉ. रणदीप गुलेरिया ने भी सरकार को सावधान किया लेकिन केंद्र सरकार टीकाकरण अभियान के लिए ‘प्रतिबद्ध’ है । इसका असली कारण जननीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ डॉ. चन्द्रकांत लहारिया ने स्पष्ट किया । जनता से सरकार पर भरोसा रखा और सरकार ने शुरू से ही टीका के लिए निजी क्षेत्र पर भरोसा किया । जिन निजी कंपनियों को सरकार ने टीका निर्माण का ठेका दिय, उसका भुगतान करदाताओं के पैसे से किया गया । उन कंपनियों ने निजी अस्पतालों को जो टीका सप्लाई किया, उसकी कीमत और क्वालिटी मुफ्त सरकारी टीके से भिन्न है । निजी अस्पताल कभी खून की कमी, ऑक्सीजन की कमी दिखाकर खून चूस रहे हैं । सरकार तमाशा देख रही है । टीकाकरण की तरह कोरोना को भी सरकारी महामारी का रंग दे दिया गया है । अब सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए टीकाकरण अनिवार्यता की चर्चा जोरों पर है ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने कहा है कि तीसरी लहर से कोरोना ‘पांडेमिक’ अब ‘एन्डेमिक’ की स्थिति में पहुंच गया है, जिससे निजात पाना मुश्किल है । ‘एन्डेमिक’ का मतलब ऐसा वाइरस जो हमेशा मौजूद रहे ।

2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने तो प्रचार किया गया - ‘बुरे दिन गये, अच्छे दिन आये’ । इसलिए अब ऐसे हालात में यह सोचना बेकार है कि कहां है, किस हालत में है, देश में हैं कि परदेस में है, इसका सच सामने है । मौत नहीं, जिंदगी जीने के लिए सरकार के भरोसे नहीं, अपने भरोसे चलना होगा । भारतीय साहित्य, ज्ञान-संस्कृति, परंपरा की सियासी दुहाई देनेवाले भाजपा नेतागण जनता के लिए मनीषी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के ‘सत्य हरिश्चन्द’ नाटक की पंक्ति याद कर लें - ‘मरनो भलो विदेश में जहां न अपनो कोय, माटी खाय जनावरां महामहोच्छव होय’ ।

जीते-जी कंधे से कंधा मिलाने से लोग डरते हैं । जो सामाजिक रिश्ता जोड़ने की बात संत कबीर कह गये, उसे कोरोना ने तोड़कर लोगों की आंखें खोल दी है - ‘मैं केहू समझॉऊ सब जग अंधा एक दिन तो जाना है, दूसरे के कंधा.........