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चोट

वर्ष 1997 का अगस्त महीना । दिन के एक डेढ़ बजे दिल्ली के आनंद बिहार बस स्टॉप पर खड़ा हूँ । मुझे 534 नंबर की बस पकड़नी है । सुबह-शाम की तरह भीड़ दुपहरी में नहीं होती आईटीओ और मंडी हाउस की सीधी बस कम होने के कारण बस बदलकर जाना पड़ता है । मेट्रो का काम तेजी से चल रहा है । इसलिए डायवर्सन के चलते उस रूट से जाना पड़ता है, जिधर मेट्रो अभी नहीं जानेवाला है । दोपहर में डीटीसी और प्राइवेट दोनों ही बसों की आवाजाही जब देर -देर से होती है, तो कभी-कभी भीड़ हो जाती है । तेज बारिश के कारण बस स्टॉप पर बने शेड में भींगने से बचना मुश्किल हो गया है । इसलिए जो भी बस आ रही है, लोग आगे बदलने और बारिश से बचने के लिए चढ़ जाते हैं । अंतरराष्ट्रीय बस अड्डे आनंद बिहार से ही बसें बनकर चलती हैं । फिर भी लटकने की नौबत है । 534 नंबर की दो बसें निकल गयी, मैं नहीं चढ़ पाया । दिल्ली में बस चाहे सरकारी हो या निजी, ड्राइवर और कंडक्टर यात्रियों से बहुत बदतमीजी से बात करते हैं । आगे के दरवाजे से बस में चढ़ना मना है और पिछले दरवाजे से चढ़ते समय अगर किसी यात्री का दोनों पैर सीढ़ी पर नहीं पड़ा तो भी बस आगे बढ़ जाती है । डीटीसी बसों में कंडक्टर पिछले दरवाजे के पास बैठा रहता है, वो भी किसी यात्री के लटकने की परवाह नहीं करता ।

बारिश थोड़ी कम हुई और मेरी बस आयी । लेकिन, ड्राइवर ने स्टॉप से आगे बढ़ाकर रोका । जबतक मैं बस के पिछले दरवाजे तक पहुंचूं, कंडक्टर ने सीटी बजा दी। मैं दौड़कर अगले दरवाजे तक पहुंचा । एक पैर सीढ़ी पर डाला, तो भी बस नहीं रुकी । मैं घिसटता थोड़ी देर तक गया । कुछ यात्रियों के हल्ला करने पर ड्राइवर ने बस रोकी । इस ड्राइवर को मैंने पहले भी एकाध बार शायद देखा हुआ है, ऐसा लगा । मेरे कपड़े फट गए थे, ठेहुना छिला गया था । मैं ड्राइवर पर गरजा, चीखा । लेकिन मुझसे ज्यादा जोर से ड्राइवर बादल फटने की तरह मुझ पर गरजा । दिल्ली की बसों में ड्राइवर कंडक्टर की यात्रियों से कहा सुनी बिल्कुल आम बात है । ड्राइवर की डपट और कंडक्टर का स्वाभाविक साथ देखकर मैं चुप लगा गया । ऐसा होंठ सील किया कि बुदबुदाहट भी न हो सके ।

एक दो यात्री मेरे समर्थन में बोले तो उन्हें भी ड्राइवर ने डपटकर मेरी ही गलती दिखा दी । मैं लगातार चुप्पी साधे रहा और आगे तक की टिकट होने के बावजूद पहले ही उतर गया । मेरे शरीर में चोट लगी थी, ठेहुना छिलाने से खून बह गया था । दिल में कोई जख्म नहीं था । क्योंकि यह बसों के रोजमर्रे की कहानी है । यात्री की दिक्कत या कोई परेशानी बसवाले सुनना नहीं चाहते । उल्टे बिफर उठते हैं । देर तक तू-तू-मैं-मैं चलती है ।

मेरी खामोशी से ड्राइवर को शायद दिल पर चोट महसूस हुई । अगले दिन डेढ़-दो बजे मैं उसी बस स्टॉप पर उसी नंबर के बस के इंतजार में खड़ा था । अचानक एक 534 नंबर की बस मेरे पास आकर रुकी । मैंने ड्राइवर की ओर देखा, ड्राइवर ने मेरी ओर देखा । मैं उस बस में नहीं चढ़ा और दूसरी बस के इंतजार में पीछे देखने लगा । तबतक ड्राइवर और कंडक्टर दोनों ने बस को पीछे करके अगले दरवाजे की सीढ़ी मेरे करीब कर दी । ड्राइवर ने पुकारा - ‘मुझे माफ कर दो बड़े भाई, और जाओ आगे बैठो । जबतक आप नहीं चढ़ोगे, बस नहीं चलेगी ।’ मैंने मुड़कर देखा - ‘ड्राइवर ने दोनों हाथ जोड़ रखे थे ।’ मैं ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठ गया और ड्राइवर पूरे रास्ते अपराध भाव से अपनी कल की ‘कठिनाई’ पर सफाई देता रहा । मैंने भावहीन चेहरे पर चुप्प आवरण डाले रखा । उसके बाद से वो ड्राइवर मुझे देखते ही रोज बस रोकता और मुझे आग्रह से आगे बिठाता रहा । आखिरकार एक दिन उसके मुंह से निकल ही गया - ‘लगता है भाई साहब आपने मुझे माफ नहीं किया । जबतक आप माफ नहीं करोगे, मेरा चोट कम नहीं होगा ।’ मैं चुपचाप अपने स्टॉप पर उतर गया ।