भीख के खुल्ले पैसे
दिल्ली से पटना जा रही ट्रेन श्रमजीवी एक्सप्रेस की स्लीपर क्लास बॉगी - जनरल क्लास से थोड़ा बेहतर । क्योंकि बर्थ अगर रिजर्व है तो रात को सोने की जगह मिल जाती है । अपने नियत समय दिन के एक बजकर 15 मिनट यानी सवा बजे गाड़ी खुलती है । समय ऐसा है कि ड्यूटी जानेवालों की भीड़ नहीं है, इसलिए थोड़ी राहत है । खचाखच भीड़ में भिखमंगे भी कम चढ़ते हैं । धक्कामुक्की में लंगड़ाते हुए चलना या भीख मांगने की लाचारी मजबूरी दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता । लकुटिया टिकाने के लिए भी तो जगह चाहिए । मैं अक्सर श्रमजीवी एक्सप्रेस से दिल्ली पटना आना-जाना करता रहा हूँ और स्लीपर क्लास से ही चलता हूँ - चाहे रिजर्वेशन हो या न हो । पटना से इस ट्रेन के खुलने का समय सबेरे 11 बजे है । पटना से दिल्ली आने में भी भीड़ से कम साबका पड़ता है । क्योंकि ऑफिस जानेवालों का समय बीत चुका होता है । भिखमंगे भी दिल्ली की तुलना में प्लेटफार्म पर या डब्बे में कम नजर आते हैं ।
तो लौटते हैं उस वक्त की ओर, जब श्रमजीवी एक्सप्रेस दिल्ली से दोपहर में रवाना हुई है । अलीगढ़ में गाड़ी रुकी है और यात्रियों के पीछे-पीछे भिखमंगे भी चढ़े हैं ।
एक भिखमंगा बूढ़ा जैसा लगता है, मगर वास्तव में उतना बूढ़ा है नहीं, ताकि बुढ़ापे की लाचारी दिखाकर यात्रियों को दया के लिए उकसाना आसान हो । खिड़की के पास अपनी बर्थ पर बैठे एक सहयात्री को भिखमंगे पर दया आ जाती है । उनके चेहरे का भाव देखकर कुर्ताधारी भिखारी थोड़ा ठहर जाना फायदेमंद समझता है । भिखारी की बेबसी पर सहयात्री को दया आती है, पर वे खुल्ले पैसे न होने की अपनी लाचारी बताते हैं ।
‘खुल्ले नहीं हैं’ - दाता के मुंह से सुनते ही भिखारी के चेहरे पर दीन-हीन बनकर यात्रियों की दया पानेवाली कातरता लेन-देन की सौदेबाजी में बदल जाती है । सहयात्री को भिखमंगा तुरंत मदद का ऑफर देता है और अपनी झोली को हिलाकर सिक्कों की झनझनाहट सुनाते हुए कहता है - ‘लाइए खुल्ले कर देते हैं’ ।
सहयात्री पड़ गए सोच में । भिखमंगा तौल रहा है कि सही में खुल्ले नहीं हैं या ‘दया’ न दिखाने का बहाना बना रहे हैं । आजू-बाजू बैठे यात्रियों के लिए कौतूहल का विषय था । सहयात्री के लिए तय करना कठिन हो गया कि कितने का नोट ‘खुल्ले’ के लिए निकालें और उसमें से कितने पैसे का दया दिखाएं । भिखमंगा खड़ा है और झोली पर हाथ रखे दाता को ही मानो सहयोग करना चाह रहा है कि ‘खुल्ले’ तो मेरे पास बहुत हैं, अब आप तय करें कि ‘भीख’ में कितने छोड़ेंगे । ट्रेन में चाय-वाय पीने के लिए खुल्ले की सभी यात्रियों को जरूरत रहती है ।
‘भीख का समय बर्बाद’ करने के लिए सहयात्री को चिलम मस्त लाल आंखों से घूरता हुआ भिखमंगा बढ़ा । भीख नहीं देने की उनकी बहानेबाजी ‘उजागर’ हो गयी । लेकिन आगे की कई बर्थों के पास भिखमंगे को अटकते देखा गया । टुंडला जंक्शन पर उससे मिलते-जुलते खुल्ले के लिए सिक्कों भरे झोले से लैस एक-दो और भिखमंगों पर यात्रियों की नजर पड़ी ।
चोट
वर्ष 1997 का अगस्त महीना । दिन के एक डेढ़ बजे दिल्ली के आनंद बिहार बस स्टॉप पर खड़ा हूँ । मुझे 534 नंबर की बस पकड़नी है । सुबह-शाम की तरह भीड़ दुपहरी में नहीं होती आईटीओ और मंडी हाउस की सीधी बस कम होने के कारण बस बदलकर जाना पड़ता है । मेट्रो का काम तेजी से चल रहा है । इसलिए डायवर्सन के चलते उस रूट से जाना पड़ता है, जिधर मेट्रो अभी नहीं जानेवाला है । दोपहर में डीटीसी और प्राइवेट दोनों ही बसों की आवाजाही जब देर -देर से होती है, तो कभी-कभी भीड़ हो जाती है । तेज बारिश के कारण बस स्टॉप पर बने शेड में भींगने से बचना मुश्किल हो गया है । इसलिए जो भी बस आ रही है, लोग आगे बदलने और बारिश से बचने के लिए चढ़ जाते हैं । अंतरराष्ट्रीय बस अड्डे आनंद बिहार से ही बसें बनकर चलती हैं । फिर भी लटकने की नौबत है । 534 नंबर की दो बसें निकल गयी, मैं नहीं चढ़ पाया । दिल्ली में बस चाहे सरकारी हो या निजी, ड्राइवर और कंडक्टर यात्रियों से बहुत बदतमीजी से बात करते हैं । आगे के दरवाजे से बस में चढ़ना मना है और पिछले दरवाजे से चढ़ते समय अगर किसी यात्री का दोनों पैर सीढ़ी पर नहीं पड़ा तो भी बस आगे बढ़ जाती है । डीटीसी बसों में कंडक्टर पिछले दरवाजे के पास बैठा रहता है, वो भी किसी यात्री के लटकने की परवाह नहीं करता ।
बारिश थोड़ी कम हुई और मेरी बस आयी । लेकिन, ड्राइवर ने स्टॉप से आगे बढ़ाकर रोका । जबतक मैं बस के पिछले दरवाजे तक पहुंचूं, कंडक्टर ने सीटी बजा दी । मैं दौड़कर अगले दरवाजे तक पहुंचा । एक पैर सीढ़ी पर डाला, तो भी बस नहीं रुकी । मैं घिसटता थोड़ी देर तक गया । कुछ यात्रियों के हल्ला करने पर ड्राइवर ने बस रोकी । इस ड्राइवर को मैंने पहले भी एकाध बार शायद देखा हुआ है, ऐसा लगा । मेरे कपड़े फट गए थे, ठेहुना छिला गया था । मैं ड्राइवर पर गरजा, चीखा । लेकिन मुझसे ज्यादा जोर से ड्राइवर बादल फटने की तरह मुझ पर गरजा । दिल्ली की बसों में ड्राइवर कंडक्टर की यात्रियों से कहा सुनी बिल्कुल आम बात है । ड्राइवर की डपट और कंडक्टर का स्वाभाविक साथ देखकर मैं चुप लगा गया । ऐसा होंठ सील किया कि बुदबुदाहट भी न हो सके ।
एक दो यात्री मेरे समर्थन में बोले तो उन्हें भी ड्राइवर ने डपटकर मेरी ही गलती दिखा दी । मैं लगातार चुप्पी साधे रहा और आगे तक की टिकट होने के बावजूद पहले ही उतर गया । मेरे शरीर में चोट लगी थी, ठेहुना छिलाने से खून बह गया था । दिल में कोई जख्म नहीं था । क्योंकि यह बसों के रोजमर्रे की कहानी है । यात्री की दिक्कत या कोई परेशानी बसवाले सुनना नहीं चाहते । उल्टे बिफर उठते हैं । देर तक तू-तू-मैं-मैं चलती है ।
मेरी खामोशी से ड्राइवर को शायद दिल पर चोट महसूस हुई । अगले दिन डेढ़-दो बजे मैं उसी बस स्टॉप पर उसी नंबर के बस के इंतजार में खड़ा था । अचानक एक 534 नंबर की बस मेरे पास आकर रुकी । मैंने ड्राइवर की ओर देखा, ड्राइवर ने मेरी ओर देखा । मैं उस बस में नहीं चढ़ा और दूसरी बस के इंतजार में पीछे देखने लगा । तबतक ड्राइवर और कंडक्टर दोनों ने बस को पीछे करके अगले दरवाजे की सीढ़ी मेरे करीब कर दी । ड्राइवर ने पुकारा - ‘मुझे माफ कर दो बड़े भाई, और जाओ आगे बैठो । जबतक आप नहीं चढ़ोगे, बस नहीं चलेगी ।’ मैंने मुड़कर देखा - ‘ड्राइवर ने दोनों हाथ जोड़ रखे थे ।’ मैं ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठ गया और ड्राइवर पूरे रास्ते अपराध भाव से अपनी कल की ‘कठिनाई’ पर सफाई देता रहा । मैंने भावहीन चेहरे पर चुप्प आवरण डाले रखा । उसके बाद से वो ड्राइवर मुझे देखते ही रोज बस रोकता और मुझे आग्रह से आगे बिठाता रहा । आखिरकार एक दिन उसके मुंह से निकल ही गया - ‘लगता है भाई साहब आपने मुझे माफ नहीं किया । जबतक आप माफ नहीं करोगे, मेरा चोट कम नहीं होगा ।’ मैं चुपचाप अपने स्टॉप पर उतर गया ।
आजाद भारत की ट्रेन में गांधी का दक्षिण अफ्रीका( यात्रा संस्मरण)
उम्दा है मौसम मन मिजाज तर है, ऐसे में अप्रिय प्रसंग टालना बेहतर है अक्टूबर महीने की शुरूआत उम्दा मौसम से होती है । फिर जाड़े की ठिठुरन बढ़ने और रजाई कंबल से निकलकर सुबह में गुनगुनी धूप की बेताबी का समय आने तक बड़ा सुकून रहता है । ऐसे ही समय में स्लीपर क्लास में यात्रा के दौरान एक प्रिय और प्रेरक अनुभव हुआ । जिस अविस्मरणीय घटना का जिक्र करने बैठा हूं, उसका मुख्य पात्र मैं स्वयं हूं । उस वक्त तो मुझे अप्रिय जरूर लगा, लेकिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती वर्ष में उसे याद करके रोमांचित महसूस कर रहा हूं । यात्रा की तारीख दो अक्टूबर अर्थात् गांधी जयंती और ट्रेन का स्लीपर क्लास दर्जा । मामला एक दिहाड़ी मजदूर के पास स्लीपर क्लास का टिकट होने के बावजूद टीटीई द्वारा उसे जनरल डब्बे में भेजने का है । उस गरीब मजदूर को अपने हक से वंचित किए जाने के खिलाफ मैंने आवाज उठायी । टीटीई से लड़ गया, मार-पीट की नौबत आ गयी । लेकिन उसका अंत सुखद हुआ । वो गरीब मजदूर अपने बर्थ पर सोया । आजाद भारत के एक मजदूर को अपने ही देश का टीटीई ट्रेन के आरक्षित डब्बे में चलने का सही टिकट होने के बावजूद बर्थ देने से इन्कार कर देता है और उतारने का प्रयास करता है ।
वर्ष 1983 और गांधी जयंती के दिन दिल्ली से पटना की यात्रा मगध एक्सप्रेस से । उस समय दिल्ली से पटना तक की एकमात्र ट्रेन मगध एक्सप्रेस थी और सबसे अच्छी ट्रेन मानी जाती थी । सभी वर्ग के यात्री आरक्षित और जनरल दोनों ही डब्बे में साथ-साथ चलते थे । वीआईपी गाड़ियां नहीं चली थी । 1980 के दशक से बिहार के प्रवासी मजदूरों का दिल्ली की ओर जाने का रेलमपेला तेजी से बढ़ा । गांव का गांव उठकर दिल्ली की गलियों छा गया । ज्यादातर मजदूर इतने अनपढ़ और भोले होते थे कि उन्हें आरक्षित और जनरल डब्बे का अंतर समझ में नहीं आता था । हरियाणा, पंजाब जाने का सिलसिला तो काफी पहले से चल रहा था, मगर दिल्ली में भीड़ 1979-80 से बढ़नी शुरू हुई ।
उस समय की भीड़ में ट्रेन यात्रा का वृतांत अभी याद आया है । 2018 की गांधी जयंती 150वें वर्ष के कारण पूरे वर्ष मनायी जा रही है । उससे भी ज्यादा प्रासंगिक ये है कि मोहनदास करमचंद गांधी के साथ 7 जून, 1893 को दक्षिण अफ्रीका में ट्रेन में यात्रा के दौरान जो कुछ हुआ, उसके 125 वर्ष पूरे हो गए । विदेश मंत्री सुषमा स्वराज दो दिनों के उस भव्य समारोह को संबोधित करने जोहान्सबर्ग गयीं । 6-7 जून को आयोजित समारोह में जुटे दक्षिण अफ्रीका के 300 प्रमुख राजनयिक आमंत्रित अतिथि थे । उनके साथ सुषमा स्वराज ने पेंट्रिक स्टेशन से पिएटरमारिजबर्ग स्टेशन तक सांकेतिक ट्रेन यात्रा की । 125 वर्ष पहले युवा वकील मोहनदास करमचंद गांधी को ट्रेन के पहले दर्जे का टिकट होने के बावजूद पिएटरमारिजबर्ग स्टेशन पर डब्बे से बाहर फेंक दिया गया था । उन्होंने फर्स्ट क्लास का टिकट होने के कारण उतरने से इन्कार कर दिया ।
वो वर्ष था 1893, जब गुलाम भारत के एक वकील अंग्रेज शासित दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों का मुकदमा लड़ने गए थे । हम सुना रहे हैं 1983 के दो अक्टूबर का यात्रा-संस्मरण, जो आजादी के इतने वर्ष गुजरने के बावजूद एक आम आदमी की बदनसीबी का आंखोंदेखा भोगा दस्तावेज है । आज मुझे सामान्य जन-जीवन और अपनी जिंदगी का यह शानदार यादगार अनुभव लगता है । आमलोगों में दूसरे की मदद करने की इच्छा तो होती है, मगर उसके लिए खुद को परेशानी में डालना कोई नहीं चाहते । कोई भलमानुष सा दीखनेवाला सिरफिरा अगर किसी अनजान की भलाई के लिए झंझट मोल ले ले तो वहां मौजूद लोगों में से कुछ का विवेक जग जाता है और वे तमाशबीन बने नहीं रह पाते । ऐसा ही है, इस यात्रा-संस्मरण का निचोड़ ।
मगध एक्सप्रेस दिल्ली से निकलकर अलीगढ़ में रुकती है, जहां लोकल यात्री उतर जाते हैं । उसके बाद टीटीई साहब टिकट चेक करना शुरू करते हैं । 1983 का प्रकरण है, जब मोबाईल कंम्प्यूटर का ईजाद नहीं हुआ था । टीटीई साहब को चार्ट से टिकट मिलाने में मिहनत लगती थी । जबतक टीटीई मेरे वाले डब्बे तक आएं, ट्रेन टुंडला के करीब पहुंच रही थी । हमारे साथवाले यात्रियों का टिकट चेक करके टीटीई ज्योंही आगे बढ़े, ठीक उसी समय एक मजदूर टाईप गरीब यात्री मेरे बर्थ के पास पहुंचा । उसने अपना टिकट दिखाकर पूछा - ‘जरा देखिए तो सर, मेरा टिकट इस डब्बे का नहीं है?’ मैंने देखा, साथ वाले दो-तीन यात्रियों ने भी देखा । टिकट उसी डब्बे का था और वही टिकट था जो हमलोगों के पास था । सबने कहा - ‘टिकट इसी डब्बे का है, जाओ अपने बर्थ पर जाकर बैठो, नहीं तो टीटीई दूसरे को बेच देगा ।’ मजदूर यात्री ने भोलेपन से अपनी लाचारी दिखायी - ‘टीटीई टिकट देख के बोला - उतर के जनरल डब्बे में चले जाओ, ये टिकट रिजर्वेशन डब्बे का नहीं है ।’
शायद टीटीई साहब ने ये वार्तालाप सुन लिया था, किसी दूसरे बर्थ का इंतजाम लगाने के लिए वे लौटे तो मैंने उन्हें टोका - ‘आप इसे जनरल डब्बा में क्यों भेज रहे हैं’? टीटीई साहब ऐसी स्थिति से निबटने के शायद आदी हो चुके थे । इसलिए जरा भी विचलित हुए बिना उन्होंने इत्मीनान से टरका दिया - ‘आप अपनी फिकर करें, बाकी यात्रियों की नहीं, वो देखना मेरा काम है’ । इतना कहकर टीटीई साहब आगे बढ़ने लगे तो मैंने उन्हें रोका । उस गरीब मजदूर यात्री के हाथ से टिकट लेकर अपना टिकट निकाला और जरा तेज आवाज में टीटीई साहब को बोला - ‘ये मेरा भाई है । इसके पास वही टिकट है, जो मेरे पास है तो आपने मुझे बर्थ खाली करके जनरल डब्बे में जाने क्यों नहीं कहा? साथ वाले दो-तीन यात्रियों ने भी मेरी आवाज में आवाज मिलाते हुए कहा - ‘बिल्कुल सही बात है, हमारा टिकट अगर सही है तो उस मजदूर का टिकट गलत कैसे है? उसके साथ बेइंसाफी क्यों की? उसका बर्थ आपने जरूर किसी दूसरे को पैसे लेकर दिया है ।’ बेचारा मजदूर यात्री हक्का-बक्का था, डर गया । उसने सोचा नहीं था कि ऐसा कुछ हो जाएगा । मैंने उसे हिम्मत बंधाते हुए कहा - ‘तुम अपनी बर्थ पर जाकर सो जाओ, देखते हैं कौन तुमको उतारता है ।’ टीटीई के साथ दो लड़के थे, उनमें से एक ने कहा - ‘ज्यादा हीरो बनेगा? बड़े आए हैं न्याय के ठेकेदार बनने और मुझ पर हाथ चला दिया ।’ फिर टीटीई ने भी मेरी कॉलर पकड़कर मुझे धक्का दिया और मैंने भी जवाबी घूंसा चलाया । शायद दोनों लड़के वही थे, जिसे टीटीई ने बर्थ दिया था । बात बहुत बिगड़ गयी । टुंडला पहुंचकर ट्रेन रुकी थी । रेल पुलिस बल के जवान आ गए । टीटीई की शिकायत पर मुझे ट्रेन से उतारा गया और सरकारी आदमी टीटीई के साथ मारपीट का मामला बनाया जाने लगा । प्लेटफार्म पर भीड़ जमा हो गयी । स्टेशन मास्टर मेरी फरियाद सुनने को तैयार नहीं थे । मेरे वाले डब्बे के अलावे अन्य डिब्बों के यात्री भी उतर गए । आरपीएफ थाना प्रभारी ने कहा - ‘आपके खिलाफ पंचनामा होगा’, तब मैंने मुंह खोला । सीधे स्टेशन मास्टर को मैंने कहा - पंचनामा मंजूर है । लेकिन मुझे और मेरे साथ वाले जो यात्री यहां खड़े हैं, उन्हें सिर्फ एक बात का जवाब चाहिए कि एक यात्री को अपने रिजर्व बर्थ से उठाकर जनरल डब्बे में जाने टीटीई साहब ने क्यों कहा? उसके बाद कई यात्रियों ने जोर-जोर से बोलकर स्टेशन मास्टर को सकते में डाल दिया, - ‘बिल्कुल सही सवाल है, आप उस यात्री का टिकट देखिए, उससे स्वयं बात कर लीजिए । मार-पीट की शुरूआत टीटीई ने की ।’ स्टेशन मास्टर फंस गए और बोले - ‘ठीक है, जाइए, लेकिन जरा संयम बरतना चाहिए ।’ मैं अड़ गया - ‘जाइए नहीं मेरे ऊपर दया मत कीजिए, मैं किए की सजा भुगतने को तैयार हूं ।’ लेकिन आप पहले बताएं कि टीटीई का यह काम अपराध की श्रेणी में आता है या नहीं । अगर आता है तो क्या सजा होनी चाहिए । मैंने ऐसा नहीं करने दिया उसके लिए मेरे खिलाफ पंचनामा होगा? स्टेशन मास्टर और रेल पुलिस थाना प्रभारी ने ‘समझाने बुझाने’ का प्रयास किया तो मैंने कहा - ‘एक ही शर्त पर ट्रेन में वापस जाऊंगा, जब ये टीटीई उस डब्बे में नजर न आए ।’ साथी यात्रियों ने भी सहमति जतायी । सब मान गए । गरीब मजदूर यात्री को न्याय मिला । अपने बर्थ पर चैन से सोया । सभी यात्रियों ने इस पहल को सही ठहराया । रात को ट्रेन में आज भी इस घटना की याद आने पर अच्छी नींद आती है ।
वैसे तो मैं विभिन्न राज्यों की यात्राएं प्रायः करता ही रहता हूँ । लेकिन दिल्ली पटना रूट में ट्रेन का सफर 35 वर्षों में नियमित किया है और उस दौरान यात्रियों को रेलवे की लापरवाही के खिलाफ जाग्रत किया है ।
2014 का प्रसंग भी संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस का ही है, जो पटना से दिल्ली जा रही थी । वो भी टुंडला में आकर रुक गयी । पीछे से आनेवाली राजधानी जैसी गड़ियां निकल रही थीं । वही स्लीपर क्लास । एक घंटा गुजर गया । आस-पास बैठे लड़के हताश-निराश बात कर रहे थे - ‘मेरा इंटर्व्यू छूट जाएगा, मैं ड्यूटी पर नहीं पहुंच पाऊंगा ।’ थोड़ी देर सुनने के बाद मैंने उनकी ऊर्जा जगायी - ‘ट्रेन खुलवाना चाहते हो तो उठो, बाहर निकलो, आवाज उठाओ । मैं आगे चलता हूं, मेरे साथ चलो ।’ उनके अंदर सोए युवा जोश को जगाया - ‘ऐसे भी तो बैठे ही हैं, ट्रेन खुल नहीं रही है, तो थोड़ा हाथ-पैर हिलाया जाए - और चार-पांच लड़के बाहर निकल गए । फिर हर डब्बे की खिड़की में झांककर हमने कहा - ‘ट्रेन खुलवाना चाहते है तो बाहर निकलिए’ और कई यात्री साथ हो गए । सोच-विचार करनेवाले यात्रियों के लिए हम अटके नहीं । देखा-देखी और भी निकले । हम स्टेशन मास्टर के कमरे में घुसे तो राइफल धारी कांस्टेबल ने हथियार ऊपर कर दिया । मैंने समझाया - ‘हथियार नीचे कर दें । सैकड़ों यात्रियों पर गोली नहीं चला पाएंगे, शांति का जिम्मा मैं लेता हूं ।’ सभी चुपचाप मेरे पीछे थे । स्टेशन मास्टर फोन पर बात कर रहे थे, उनके चेहरे पर घबड़ाहट थी । मैंने पूछा - ‘सिर्फ इतना बताएं कि आपको इस ट्रेन को रोककर पीछे आनेवाली गाड़ियों को पास करने कहा गया है या अपनी मर्जी से आपने इसे रोका हुआ है?’ शायद स्टेशन मास्टर ने प्लेटफार्म के हालात देख लिए थे । जबतक स्टेशन मास्टर मेरे सवाल का जवाब दें, तबतक पीछे से हल्ला हुआ - ‘ट्रेन खुल गयी, ट्रेन खुल गयी ।’ फिर तो दिल्ली पहुंचने तक अन्य डब्बों से यात्री आकर हमलोगों के साथ बैठे और उसके बाद इतनी स्पीड में संपूर्ण क्रांति चली कि कई लोग समय से अपने गंतव्य तक पहुंचे ।
सालभर बाद जब मैं श्रमजीवी एक्सप्रेस से पटना लौट रहा था तो, मुगलसराय(जिसका नाम अब दीनयाल उपाध्याय जं. हो गया) के आगे आटर पर देर तक रुकी रही । मेरे द्वारा उकसाए जाने पर यात्रीगण इंजन वाले डब्बे में घुस गए । ड्राइवर और गार्ड ने मोबाईल पर अपने बड़े अधिकारी को स्थिति की जानकारी दी - ‘हंगामा हो गया है, यात्री लोग इंजन डब्बे में घुस गए हैं, तोड़फोड़ करने पर आमादा हैं, कुछ भी हो सकता है ।’ ड्राइवर को फोन पर क्या जवाब मिला, यह तो हमलोगों ने नहीं सुना मगर ट्रेन तुरंत चल पड़ी। लेकिन उससे भी बड़ी बात जो ड्राइवर ने कही, वहीं आकर इस अनुभव की सुई अटकती है - ‘ऊपर के अधिकारी हमलोगों की सुनते नहीं हैं । यात्री जब बोलेंगे तब तो उनके कानों तक आवाज जाएगी । मुझे खुशी है कि आपलोगों ने आवाज उठायी । ट्रेन को कहीं रोके रखने या देर से पहुंचने के लिए सिर्फ हम दोषी नहीं है । लेकिन गाज हम कमजोरों पर गिरती है । यात्री लोग चुपचाप बैठे ड्राइवर गार्ड पर ही कुनमुनाते रहते हैं ।’
तीन बेतुकी तुकबंदियां
- शशिधर खान
एक
देखिए तो माओ फाईट कब तक चले घर-गिरस्ती में ‘लेफ्ट-राईट’ कब तक चले सड़कों से खून के थक्के लिए खेतों तक रेडलाईट कब तक चले बड़ी-बड़ी सुर्खियां दुबकती फिरी जाने ये सॉर्ट ‘बाईट’ कब तक चले मारामारी में सारी ठेकेदारी गयी देखते हैं नया साईट कबतक चले पिछवाड़े में गूंज रहे रोज धमाके तो भी सब ‘ऑलराईट’ कब तक चले
दो
परायी पीर याद आती है जब खुद पे बजर जाती है अपने अंदर की बुराई दूसरे में नजर आती है पलक भिंगो दबे पांव रात चली जाती है पौ फटते आशाओं की बारात चली आती है चौखट से बला बहार निकली जाती है झांके है रुक के जहां सिसक तुली जाती है बताए कोई ये खूनी डगर किधर जाती है दोनों तरफ खडूस झाड़ियां भली नजर आती है इन्सानी रिश्ते की मिठास गम खाती है जात धरम की मजलिस आबोहवा बनाती है चांद की काली दागी दंगे भड़काती है, बिला वजह भी रातें सबको हड़काती हैं
तीन
अलस्सुबह मौसम से कहा सुनी हो गयी बदमिजाजी पे कुछ तनातनी हो गयी आंखों देखी से पूछा तो इन्कार कर गयी वातावरण में यक-ब-यक सनसनी हो गयी चूल्हे में मारी माचिस तो आगजनी हो गयी आग लगानेवालों से ठनाठनी हो गयी टहनियों से दोस्ती थी आज दुश्मनी हो गयी अमरलताएं इधर देख अनमनी हो गयी डाल टूटी तो गरीब आस रामधनी हो गयी न तोड़ेंगे ने तोड़ने देंगे जिदपनी हो गयी
पांच मुक्तक
लहरों की किल्लोल बेचैनी है तनाव की सुकून के लिए छुअन लेते हैं बहाव की सागर के खुले में न कुंठा है छिपाव की, इसमें मन न रमा तो घुटन है रिसाव की ऐसी हवा तो चले तो बिछुड़ों से मिला दे मुरझाए उदास चेहरों को एक बार खिला दे गर्मजोशी से मिलने-जुलने का नया सिलसिला दे कण-कण को समरसता का अमृत पिला दे
रात होती है तो लोग पिघलते हैं दिन भर एक-दूसरे पे उबलते हैं कितना बेनकाब करें ‘भलमानुषों’ को कई-कई बार लबादा बदलते हैं दरवाजे सारे खुले थे बंद करने पड़े आती-जाती नजरों को नजरबंद करने पड़े इधर-उधर बिखरे आक्रोश लामबंद करने पड़े चौराहों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट सीलबंद करने पड़े
बिखरते समाज को हम जोड़ रहे हैं अब अपना घर-बार नहीं छोड़ रहे हैं अपना-पराया पे नाहक सिर फोड़ रहे हैं मिट्टी से ढंक दिया था फिर कोड़ रहे हैं सन्नाटे के साथ एकांत भी पसर गया लोग गए चहल-पहल का असर गया लाल दीखता चांद जाने किधर ससर गया उसी के संग मेरा उजड़ा गुजर-बसर गया
पता- डाक पता- ठ.102ए ऑफिसर्स हॉस्टल, बेली रोड, पटना-800001,
फोन-0612-2520340, मो0- 9879410762,
म्.उंपस.
गिंदैपकींत/लीववण्बवउए
झींद्रीपकींत 1959/हउंपसणबवउ