आत्मसम्मान
इंदिरापुरम स्थित मेरे फ्लैट के सामने वाले घर में झाड़ूपोछा बर्तन करती है दुर्गा । चौथे माले पर टॉप फ्लोर के इस दोनों फ्लैट के बीच में टेरेस है । एक ही सीढ़ी से चढ़ना उतरना पड़ता है । दुर्गा जब तक अंदर सब काम करती है, उसका छोटा बच्चा बाहर दो-चार सीढ़ी नीचे उतरकर मां के इंतजार में बैठा रहता है । मेरा दरवाजा प्रायः खुला रहता है, इसलिए बच्चे पर रोज नजर पड़ती है । एक दिन वो बच्चा मेरी तरफ वाली सीढ़ी पर दरवाजे के पास बैठ जाता है । बच्चे की आंखों में भूख और कुछ खाने की ललक मुझे प्रतीत हुई ।
मैं अकेला रहता हूँ, इसलिए घर में बच्चे के खाने लायक कुछ था नहीं । आखिरकार मैंने दो पीस स्लाइस्ट ब्रेड उठाया और दूध से मलाई निकालकर लगाया । दरवाजे के बाहर हाथ में मलाई लगा ब्रेड देख बच्चा लपककर मेरे पास आ जाता है और जल्दी.जल्दी खाने लगता है । तभी दुर्गा काम खतम करके तेजी से बाहर निकलती है, क्योंकि उसे और भी घरों में काम करना है ।
महीने की पहली तारीख थी, पैसे मिले थे । प्रसन्न चेहरा लिए निकली दुर्गा अपने बच्चे को खाते और मुझे वहां खड़ा देख बिफर उठी । अगर बच्चे ने ब्रेड मलाई पूरा नहीं खाया होता तो वो उसके हाथ से छीनकर फेंक देती । दुर्गा ने मुझे घूरते हुए धिक्कार का भाव अपने बच्चे पर उतारा. ‘ये आदमी का बच्चा थोड़े ही है, छुछुन्दर का बच्चा है ।’ मेरे लिए इतना सुनना काफी था, वास्तव में दुर्गा अपने बच्चे के बहाने मुझे कोस रही थी । मैंने गेट बंद कर लिया, मगर अंदर से मुझे बहुत ग्लानि महसूस हुई । दुर्गा अपने बच्चे को लगभग घसीटते हुए नीचे ले गयी । उसकी एक और पंक्ति मेरे कानों में पड़ी. ‘कुत्ता, लगता है, पांव रोट कभी देखा नहीं ।’ समझते देर नहीं लगी कि एक गरीब कामवाली के आत्मसम्मान को चोट पहुंची है । दुर्गा के चेहरे का भाव और बच्चे के बहाने मुझे धिक्कारने का अंदाज देखकर मेरी आत्मा ने कोसा । हमने एक मेहनतकश के आत्मसम्मान को आहत किया, जो गरीब जरूर है मगर भीख नहीं मांगती । काम करके आत्मनिर्भर जिंदगी जी रही है और बच्चे को भी वही जिंदगी देना चाहती है । दया और टुकड़ा के प्रति नफरत जतला दिया ।