दोनों विवादित पहाड़ियों का राजनीतिक हल संभव

- शशिधर खान

	

पश्चिम बंगाल की दार्जीलिंग पहाड़ी इलाके में चुनाव प्रचार के दौरान केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार कहा कि राज्य का विभाजन किए बगैर गोरखा मामलों का हल संवैधानिक तरीके से निकाला जाएगा । दार्जीलिंग और उससे सटे पहाड़ी इलाकों में रहनेवाले नेपाली भाषा-भाषी भारतीय नेताओं की अलग गोरखालैंड राज्य की मांग चार दशक पुरानी है । 


तृणमूल काँग्रेस नेता मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (दीदी) एकमात्र नेता हैं, जिन्होंने २०११ में सत्ता में आने के बाद या उसके पहले कभी-भी अलग गोरखालैंड राज्य का समर्थन नहीं किया । टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) २०११ से लगातार सत्ता में है । 1998 से कांग्रेस से अलग होने के बाद दीदी का यही रवैया है । 

पहलीबार ऐसा हुआ है, जब बंगाल विधान सभा चुनाव में गोरखालैंड कोई मुद्दा नहीं है । राज्य में पहले चरण का मतदान २३ अप्रैल को है, जिसमें दार्जीलिंग समेत उत्तरी बंगाल के 152 सीटों के मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे । 

दार्जीलिंग से सटे दक्षिण दिनाजपुर जिले के गंगारामपुर और मानिकचक में केंद्रीय गृह मंत्री ने चुनावी जनसभाओं में बंगाल विधान सभा चुनाव २०२६ के लिए भाजपा के चुनाव घोषणापत्र का जिक्र करते हुए कहा कि उत्तरी बंगाल में विकास की कई योजनाएं तैयार हैं, लेकिन गोरखालैंड का नाम नहीं लिया । 


भाजपा नेता अमित शाह ने १५ अप्रील की रैली के बाद संवाददाताओं से बातचीत के दौरान कहा कि अलग गोरखालैंड राज्य गठन भाजपा का एजेंडा नहीं है और किसी दल का नाम लिए बिना सिलीगुड़ी कोरीडोर के जरिए बंगाल को विभाजित करने की कोशिश करनेवालों को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ बताया । भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में भी गोरखा पहचान को मान्यता देने का वायदा किया गया है । 

इसमें राजवंशी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का वायदा भी शामिल है । चुनाव घोषणापत्र में दार्जीलिंग पहाड़ी के लिए इको-एडवेंचर हब विकसित करने समेत उत्तरी बंगाल में चार औद्योगिक टाऊनशिप और दो महीने के अंदर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान तथा 600 बेड का कैंसर अस्पताल बनाने का वायदा है । मगर गोरखालैंड राज्य गठन का वायदा नहीं है । अमित शाह ने अपने भाषणों में कहा कि अगर पश्चिम बंगाल में भाजपा सत्ता में आयी तो राज्य का विभाजन किए बगैर संवैधानिक तरीके से गोरखा मामले का हल निकाला जाएगा । 

यह एक अच्छा संकेत है कि जीजेएम ने ही वैसे चुनाव में भाजपा उम्मीदवारों को समर्थन देकर राजनीतिक हल निकालने की बात कही है, जब भाजपा गोरखालैंड राज्य की मांग का कर रही है । 



2017 में कई महीनों तक चले हिंसक आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में लोग मारे गए और लगातार जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा । केंद्र में भाजपा गठजोड़ सत्ता में थी और राज्य में तृणमूल कांग्रेस । दीदी ने कड़ा रवैया अपनाया और विमल गुरूंग तथा उनके सहयोगी रोशन गिरि के खिलाफ हत्या, तोड़फोड़, आगजनी, हिंसा उकसाने के कई मामले दर्ज किए गए । दोनों जीजेएम नेताओं को भागकर सिक्किम की शरण लेनी पड़ी, जहॉं के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग गोरखालैंड समर्थक थे । 

२०२४ में गोरखालैंड समर्थन के वायदे पर ४ लाख वोटों के अंतर से दार्जीलिंग लोकसभा सीट जीतनेवाली भाजपा की नीति बदल गयी । अलग गोरखालैंड चलाने वाले एक अन्य गुट के नेता मदन तमांग की कथित हत्या के आरोपी विमल गुरूंग पाए गए । 13-06-2024 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने केन्द्रीय जांच ब्यूरो से विमल गुरूंग का नाम मदन तमांग की हत्या के आरोपियों में शामिल करने का आदेश दिया । ऑल इंडिया गोरखालीग के प्रमुख विनय तमांग की 2010 में दिनदहाड़े हत्या कर दी गयी, जो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के शांति फार्मूले और दार्जीलिंग का राजनीतिक हल निकालने के समर्थक थे । 

अगस्त, २०२४ में बंगाल विधान सभा के मानसून सत्र में मुख्यमंत्री द्वारा राज्य के विभाजन के खिलाफ पेश प्रस्ताव का समर्थन करके भाजपा ने सबको मौका दिया । विधान सभा में विपक्ष के नेता शुभेन्दु अधिकारी ने इस प्रस्ताव के समर्थन में 25 अगस्त, २०२४ को सदन में कहा - ‘हम एकीकृत पश्चिम बंगाल का संपूर्ण विकास चाहते हैं और राज्य को विभाजित करने के किसी भी प्रयास के खिलाफ हैं ।’ 

राज्य विभाजन के खिलाफ राज्य सरकार के साथ विपक्ष के समन्वय के इस विरल उदाहरण ने गोरखा समेत कई भाजपा नेताओं को भी झटका लगा । भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सुकान्त मजुमदार, उत्तरी बंगाल के मैदानी इलाकों में अलग कूच बेहार राज्य की मांग करनेवाले भाजपा सांसद नागेन्द्र राय उर्फ अनन्त महाराज, मुर्शिदाबाद से भाजपा विधायक गौरीशंकर घोष, दार्जीलिंग एम पी राजू बिस्टा सब के सब सकते में आ गए । नागेन्द्र राय ग्रेटर कूच बेहार पीपुल्स एसोसिएसन के नेता है, जो उत्तरी बंगाल और असम के कुछ इलाकों को मिलाकर राजवंशी समुदाय के लिए अलग राज्य की मांग कर रहे हैं । राजू बिस्टा सुकान्त मजुमदार के प्रस्ताव के समर्थक थे । 


इन भाजपा नेताओं के बयानों पर कड़ी नाराजगी जतानेवाली दीदी ने विधान सभा में विपक्षी नेता शुभेन्दु अधिकारी के सदन में समर्थन करने का स्वागत किया । फरवरी, २०२३ में भी पश्चिम बंगाल विधान सभा से राज्य विभाजन के खिलाफ प्रस्ताव ध्वनिमत से पास हुआ, मगर उस समय भाजपा ने अपना रवैया स्पष्ट नहीं किया था । 


केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह गत कुछ हफ्तों में दार्जीलिंग, उत्तरी बंगाल की हर चुनाव रैली में यह बात दुहरायी है कि संविधान के दायरे में गोरखालैंड का राजनीतिक हल निकाला जायेगा और राजवंशी भाषा को संवैधानिक मान्यता दी जाएगी ।

16-17 अप्रील को संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण बिल पर चर्चा और लोकसभा में यह बिल पास न हो पाने के बाद चुनाव प्रचार का सुर बदल गया ।

गोरखालैंड राज्य संविधान की 6ठी अनुसूची में शामिल होने के साथ गठन की मांग चुनावी एजेंडे से बाहर करने का संकेत केंद्रीय भाजपा नेतृत्व पहले से ही दे रहा था । गोरखा नेताओं को तकरीबन ४ वर्ष के अंतराल के बाद 03 अप्रील, 2025 को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने वार्ता के लिए बुलाया । 

उस त्रिपक्षीय बैठक में पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से मुख्य सचिव शामिल नहीं हुए । केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कोई आश्वासन नहीं दिया और उसके बाद फिर वार्ता नहीं हुई । राजू बिस्टा ने अलग गोरखालैंड राज्य गठन और 11 गोरखा उप-समुदायों को एसटी (अनुसूचित जनजाति) का दर्जा की मांग उठायी । दार्जीलिंग से भाजपा विधायक नीरज जिम्बा ने कहा कि UT (यूटी- केन्द्र शासित क्षेत्र) की चर्चा है, मगर विधान सभा के बिना गोरखों की मांग अधूरी रहेगी । जिम्बा ने याद दिलाया कि 2009, २०१४ और २०१९ लोकसभा चुनावों में गोरखालैंड राज्य गठन भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में शामिल था । 

फिर 17-18 अक्टूबर, 2025 को केंद्र सरकार ने रिटायर लेफ्रिटनेंट जनरल विजय मदान को वार्ताकार नियुक्त किया, मगर वार्ता हुई नहीं । 

इस बीच लद्दाख पहाड़ी से भी अनुकूल खबर मिली है । वहॉं के सामाजिक संगठनों की ओर से आंदोलन कर रहे जलवायु विशेषज्ञ सोनम वांगचुक ने लद्दाख के महत्वपूर्ण मामलों पर शीघ्र वार्ता शुरू करने का प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से आग्रह किया है । सितम्बर, 2025 में समर्थन के दौरान हुई हिंसा के सिलसिले में एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा एक्ट) के तहत जोधपुर केन्द्रीय जेल से एक महीना पहले वे छुटे हैं । लद्दाख को राज्य दर्जा आंदोलन दार्जीलिंग से पुराना है । फर्क ये है कि बौद्ध बहुल आबादी वाले लद्दाखी लोग इसके लिए प्रायः धरना, अनशन जैसे शांतिपूर्ण तरीके अपनाते हैं ।

सितम्बर, 2025 में लेह में सोनम वांगचुक के अनशन के दौरान माहौल हिंसक हो गया और पुलिस फायरिंग में ४ लोगों की मौत हो गयी, तथा 80 से ज्यादा लोग घायल हो गए । वांगचुक को एनएसए की धाराओं के अंतर्गत गिरफ्तार करके वहां से जोधपुर सेंट्रल जेल ले जाया गया ।


लद्दाख और दार्जीलिंग में कई समानताएं हैं । दोनों जगह की मांग राज्य के साथ जनजातीय क्षेत्र का दर्जा है । सीमावर्ती होने के कारण दोनों संवदेनशील क्षेत्र हैं । लद्दाखियों की मांग में एक फर्क है कि ये लोग दो लोकसभा सीट - लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग की मांग कर रहे हैं । 

लद्दाखियों को जम्मू व कश्मीर से अलग पहचान चाहिए । हाल में नियुक्त लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने आधार कार्ड के रिकॉर्ड में से जम्मू व कश्मीर हटवाकर इसकी जगह लद्दाख जुड़वा   दिया । लद्दाखियों की यह पुरानी मांग थी, जो पूरी होने से खुशी की लहर है । 

15-04-2026 को जिस दिन अमित शाह उत्तरी बंगाल में चुनाव रैली कर रहे थे उसी दिन सोनम वांगचुक शीघ्र वार्ता के आग्रह में राज्य दर्जा का जिक्र नहीं किया । 

उसी दौरान लद्दाख से सटे पीओके (पाक अधिकृत कश्मीर) क्षेत्र में चीन के हीयान और हेमांग काउंटी स्थापित करने की खबर पर भारत सरकार ने कड़ी प्रतिक्रिया दी । 










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