चुनाव सुधार का असली मुद्दा तो गोल है
- शशिधर खान
नए मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) राजीव कुमार ने पदभार ग्रहण करते ही केंद्रीय कानून मंत्रालय के पास चुनाव सुधार का छह प्रस्ताव भेजा । उन प्रस्तावों में नंबर वन है एक से अधिक सीट पर चुनाव लड़ने को प्रतिबंधित करने के लिए कानून में संशोधन किया जाए और नंबर दो है, वोटर आईडी (मतदाता पहचान पत्र) को आधार से जोड़ा जाए । लेकिन निर्वाचन आयोग ने दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए दागी उम्मीदवारों का पर्चा रद्द करने का अधिकार देनेवाला कानून बनाने/संशोधन लाने का प्रस्ताव नहीं दुहराया । चुनाव आयोग का यह आग्रह इस संवैधानिक संस्था के दायरे से निकलकर सुप्रीम कोर्ट तक जाकर इतना पिट चुका है कि ऐसा प्रस्ताव सरकार के पास भेजना आयोग के लिए व्यर्थ का शब्द और समय बर्बाद करने जैसा है । 30 वर्षों से चुनाव आयोग के जितने चुनाव सुधार प्रस्ताव सरकार के पास विचारार्थ लंबित हैं, उनमें सबसे पहला है दागी उम्मीदवारों के पर्चे रद्द करने का अधिकार, ताकि राजनीति में अपराधीकरण पर रोक लगायी जा सके । इतने वर्षों में जितनी सरकारें बनी, किसी ने भी इस प्रस्ताव को तवज्जों नहीं दी और निर्वाचन आयोग की सुधार प्रस्ताव फाईल डंपखाने में पड़ी रही । आखिरकार चुनाव सुधार का सबसे अहम असली मुद्दा लगभग पूरी तरह गोल हो गया, जो निर्वाचन आयोग की ओर से सरकार के पास भेजे गए हालिया प्रस्तावों से स्पष्ट है । शुचिता और पारदर्शिता की सबसे ज्यादा दुहाई देनेवाली भाजपा गठजोड़ सरकार की २०१४ में ‘प्रचंड बहुमत’की सरकार बनाने के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट गया । इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करनेवाले वकील अश्विनी उपाध्याय भाजपा के ही नेता हैं । सुप्रीम कोर्ट की नोटिस के जवाब में निर्वाचन आयोग ने बार-बार कहा कि कई वर्षों से सरकार से आपराधिक रिकार्ड वाले उम्मीदवारों के पर्चे रद्द करने का अधिकार मांगा जा रहा है । सरकार हर सुनवाई में अपने अटोर्नी जनरल को खड़े करके किसी-न-किसी बहाने इस मामले पर टालो/पल्ला झाड़ो नीति अपनाती रही । चुनाव हो रहे हैं, दागी उम्मीदवार जीतकर आ रहे हैं । चुनाव आयोग ने कई बार सभी राजनीतिक दलों से आग्रह किया कि आपराधिक मुकदमे में फंसे उम्मीदवारों को टिकट न दें । अब चुनाव आयोग ने इस मुद्दे को चुनाव सुधार प्रस्तावों की सूची से निकाल दिया है ।
अभी निर्वाचन आयोग की ओर से कानून मंत्रलय को भेजे गए प्रस्तावों में जो जनहित की दृष्टि से महत्वपूर्ण था, उसे सरकार ने डंप ही रखा, क्योंकि वो राजनीतिक हित में नहीं था । लेकिन दूसरे प्रस्ताव की अधिसूचना तुरंत जारी कर दी गयी । 12 जून को मुख्य चुनाव आयुक्त ने कानून मंत्रलय के पास प्रस्ताव भेजा और 18 जून को वोटर आईडी को आधार कार्ड से जोड़ने की अधिसूचना कानून मंत्रलय ने जारी कर दी ।
निर्वाचन आयोग ने एक से अधिक सीट पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून में संशोधन करने की मांग की थी । इसमें चुनाव आयोग का यह भी कहना था कि अगर ऐसा नहीं किया जा सके तो इस चलन पर रोक लगाने के लिए भारी जुर्माने का प्रावधान किया जाए । किसी उम्मीदवार के दो सीट पर जीतने की स्थिति में एक सीट खाली होने पर उपचुनाव की मजबूरी पैदा हो जाती है । सरकार ऐसा चुनाव सुधार नहीं चाहती । चुनाव आयोग ने ओपिनियन और एग्जिट पोल पर भी प्रतिबंध लगाने की मांग की, जिसमें कहा गया कि यह प्रतिबंध चुनाव अधिसूचना जारी होने के दिन से ही लागू हो जाना चाहिए और चुनाव परिणाम घोषित होने तक जारी रहना चाहिए । इस पर भी सरकार ने विचार करना जरूरी नहीं समझा । क्योंकि यह भी दलीय चुनाव राजनीति से जुड़ा मामला है । जिस पार्टी को एग्जिट पोल में जीत की ओर बढ़ना बताया जाता है, वो खुश होती है और हारनेवाली प्रतिबंध की आवाज लगाती है । चुनाव आयोग के लिए मुश्किल हो जाती है, क्योंकि इसकी निष्पक्षता पर ऊंगली उठायी जाती है ।
सुप्रीम कोर्ट के हाथ में कानून बनाना नहीं है और बिना कानूनी अधिकार के दागी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकना चुनाव आयोग के वश का नहीं है । जब किसी भी पार्टी के जनप्रतिनिधि ने संसद के अंदर और बाहर ऐसा कानून बनाने की बात नहीं उठायी, तब सुप्रीम कोर्ट ने भी मतदाताओं की अदालत में ही मामला डाल दिया । 25/09/2018 को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से आदेश जारी किया कि सभी उम्मीदवारों को पर्चा भरने से पहले चुनाव आयोग को अपना आपराधिक रिकार्ड बताना होगा और इलेक्ट्रोनिक तथा प्रिंट मीडिया के जरिए उसका खूब प्रचार करना होगा । उसके बावजूद २०१९ लोकसभा चुनाव में ४३ प्रतिशत दागी जीते । एडीआर के आंकड़े के अनुसार कुल 539 में से आपराधिक रिकार्ड वाले 233 जीते । २०१४ लोकसभा चुनाव की तुलना में 10 प्रतिशत का इजाफा हुआ । २०१४ में कुल 542 में से 185 दागी जीते । अब दो साल बाद फिर लोकसभा चुनाव में और बढ़ोतरी होने की ही उम्मीद की जा सकती है ।
चुनाव आयोग ने अपना और मतदाताओं का बोझ कम करने के लिए गत हफ्ते 111 ऐसी राजनीतिक पार्टियों का नाम अपने रजिस्टर से हटाने का फैसला किया, जो मान्यता प्राप्त नहीं हैं और दिशानिर्देशों के अनुकूल फिट नहीं बैठती । चुनाव आयोग के अनुसार ऐसी गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों का अस्तित्व सिर्फ कागज पर है और इनके पते पर भेजे गए पत्र वापस आ जाते हैं । चुनाव आयोग राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने का भी अधिकार काफी समय से मांग रहा है । चुनाव आयोग फॉर्म 24A में भी सुधार की मांग सरकार से कर रहा है, जिसमें 2000 रूपये से ज्यादा के सारे चंदे का खुलासा अनिवार्य होगा । अभी यह नियम 2000 रूपये पर लागू है ।
अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई के दौरान जुलाई, २०१८ में सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस दीपक मिश्र ने कहा कि दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में संशोधन करना पड़ेगा और चुनाव आयोग के गठन वाली धारा 324 में भी फेरबदल करना होगा, जो संसद के हाथ में है । Archive quality note: This text is readable and verified for publication, but minor Unicode or source-quality imperfections may remain.
विषय
Politics, Governance and Administration Election Commission
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