चुनाव आयोग के जरिए हुई है राजनीति
- शशिधर खान
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के मामले में बिल्कुल सही वक्त पर सही कदम उठाया है । चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है और संविधान की धारा-324 के अंतर्गत इसे काफी शक्तियां प्राप्त हैं । लेकिन अन्य संवैधानिक संस्थाओं की तरह चुनाव आयोग पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से अपने दायित्वों का निर्वाह नहीं कर पाता । क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सरकारी विभाग के अधिकारियों की तरह होती है । मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) की नियुक्ति कहने के लिए राष्ट्रपति कार्यालय करता है । जैसा कि सीएजी (महालेखा परीक्षक व नियंत्रक), सीवीसी (केंद्रीय सतर्कता आयुक्त), सीआईसी (केंद्रीय सूचना आयुक्त) और यहां तक कि सीबीआई (केंद्रीय जांच ब्यूरो) के प्रमुख की नियुक्ति का प्रावधान है । इन पदों पर नियुक्ति के लिए चयन प्रक्रिया है, जिसमें प्रधानमंत्री, भारत के प्रधान न्यायाधीश और लोकसभा में विपक्ष के नेता होते हैं ।
इनमें चुनाव आयोग एकमात्र संवैधानिक संस्था है, जिसके प्रमुखों की नियुक्ति के लिए ऐसी कोई चचन प्रक्रिया नहीं है । सीईसी से लेकर चुनाव आयुक्तों के लिए बरिष्ठ आईएएस अधिकारी का चयन सरकारी तंत्र करता है । राज्यों से भी चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राज्य सरकारें तय करती है ।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से बिल्कुल जायज कैफियत मांगी है कि सीईसी के लिए चयन समिति (कोलेजियम) क्यों नहीं बनी है और अभी तक सरकार इस पर चुप क्यों है । 2017 में ही सुप्रीम कोर्ट ने सीईसी की नियुक्ति और चयन प्रक्रिया पर केंद्र सरकार से जवाब-तलब किया । अभी गत हफ्ते जब सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में सुनवाई चल रही थी, तो अटोर्नी जनरल सरकार का पक्ष शीर्ष कोर्ट में रख रहे थे । और उसी दौरान केंद्र सरकार ने पूर्व आईएएस अधिकारी अरूण गोयल की नियुक्ति आनन-फानन में कर डाली, जबकि उसी प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा । इस संबंध में दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही पांच जजों की संविधान पीठ ने तुरंत तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और अरूण गोयल को चुनाव आयुक्त बनानेवाली फाईल सरकार को दिखाने कहा ।
सुप्रीम कोर्ट पीठ के अध्यक्ष जस्टिस के॰ एम॰ जोसेफ ने 18 नवंबर को कहा कि चुनाव आयोग ईमानदार हो सकता है, मगर इसके निश्चित ही राजनीतिक ताल्लुकात भी हो सकते हैं । २३ नवंबर को सुनवाई के दौरान जस्टिस के॰ एम॰ जोसेफ और पीठ के दूसरे जज अजय रस्तोगी ने अटोर्नी जनरल से पूछा कि 18 नवंबर को ही रखी गयी चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से संबंधित फाईल एक ही दिन में क्लियर हो गयी । जजों ने सरकार से इतनी जल्दीबाजी का कारण पूछा और वो भी उस वक्त जब इस पर सवाल उठाए गए हैं । जजों ने पूर्व सीईसी टी॰ एन॰ शेषन को भी याद करते हुए कहा कि ऐसा कभी हुआ था, जिस व्यक्ति ने पूरी चुनावी व्यवस्था को साफ-सुथरी बना दिया ।
अभी सही वक्त पर सुप्रीम कोर्ट का चुनाव आयोग को राजनीतिक प्रभाव से बिल्कुल मुक्त संवैधानिक संस्था बनानेवाला सही कदम क्यों और कैसे हैं, देखें । जस्टिस के॰ एम॰ जोसेफ ने जो चुनाव आयोग में राजनीति की बात कही है । उसी के आलोक में गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधान सभा चुनावों की चर्चा करें ।
इन दोनों राज्यों में चुनाव हो रहे हैं । मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईवी) की नियुक्ति प्रक्रिया के संबंध में 2017 में जब सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार सरकार से जवाब-तलब किया, उस वक्त गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव करीब थे । 04-07-2017 को कानून मंत्रलय ने अचल कुमार ज्योति की सीईसी पद पर नियुक्ति की अधिसूचना जारी की और अगले ही दिन 05-07-2017 को सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई की । अचल कुमार ज्योति के पदभार ग्रहण करने से पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नियुक्ति पर सवाल उठाए और सीईसी नियुक्ति प्रक्रिया पर सरकार से स्पष्टीकरण मांगा । उस वक्त चीफ जस्टिस जे॰ एस॰ खेहर की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ के दूसरे जज थे डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़, जो आज चीफ जस्टिस हैं । प्रधान न्यायाधीश जे॰ एस॰ खेहर और जस्टिस डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़ ने 2017 में ही सरकार से पूछा कि सीईसी तथा चुनाव आयुक्तों के लिए संवैधानिक पद जैसी चयन प्रक्रिया क्यों नहीं है । याचिकाकर्ता अनूप वर्णवाल की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने शीर्ष कोर्ट को बताया कि सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में भी सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट जजों की तरह स्वतंत्र निष्पक्ष कोलेजियम प्रक्रिया अपनायी जानी चाहिए ।
अभी सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री तथा मंत्रीपरिषद की अनुशंसा पर राष्ट्रपति करते हैं । 2017 में ही दोनों सुप्रीम कोर्ट जजों ने संविधान के नियम का जिक्र करते हुए कहा कि धारा 324(2) में प्रावधान है कि सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तय कानून के अंतर्गत होगी, लेकिन अभी तक कोई कानून क्यों नहीं बनाया गया है । उस वक्त सोलिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने शीर्ष कोर्ट को आश्वस्त करना चाहा कि गलत या सही, संसद ने इस पर कोई कानून नहीं बनाने का निर्णय लिया है । सरकार की ओर से स्पष्टीकरण यह दिया गया कि अगर संसद इस पर कोई कानून बनाने की जरूरत नहीं समझती तो क्या सुप्रीम कोर्ट विधायिका के महकमे में हस्तक्षेप कर सकती है ? क्या यह उचित होगा ?
अभी दूसरी बार जब सुप्रीम कोर्ट में सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया के संबंध में सुनवाई शुरू हुई है, इस वक्त माहौल थोड़ा प्रतिकूल है । सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जजों की नियुक्ति के लिए बनी सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम को लेकर सरकार तथा सुप्रीम कोर्ट में टकराव की स्थिति है । संसद के शीतकालीन सत्र में राज्यसभा में चुनाव सुधार पर हुई बहस में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर भी चर्चा हुई और कई राजनीतिक दलों ने इसके लिए कोलेजियम प्रणाली की मांग उठायी ।
अभी २२ नवंबर को अनूप वर्णवाल समेत कई याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने ‘तटस्थता’सुनिश्चित करने के लिए सीईसी नियुक्ति कमिटी में भारत के प्रधान न्यायाधीश को शामिल करने का सुझाव सरकार को दिया । उसके पहले 18 नवंबर को सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने अन्य संवैधानिक संस्थाओं की तरह प्रधानमंत्री, विपक्षी नेता को शामिल करने का सुझाव दिया ।
केंद्र सरकार पंजाब काडर के आईएएस अधिकारी अरूण गोयल की जल्दबाजी में नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट को आश्वस्त नहीं कर पायी । अरूण गोयल वर्तमान सीईसी राजीव कुमार की जगह लेंगे, जो 2025 में सेवानिवृत्त होंगे । जजों ने सवाल उठाया कि अभी यह रिक्ति भरने की जल्दबाजी क्यों ?
सुप्रीम कोर्ट ने सीईसी और चुनाव आयुक्तों के कार्यकाल पर 1991 में बने ईसी, सीईसी (सेवा शर्त) एक्ट के उल्लंघन के लिए भी सरकार को फटकार लगायी । उस एक्ट के अनुसार ईसी और सीईसी का कार्यकाल ६ साल का तय है और सरकार ऐसे व्यक्तियों को पसंद करती है, जिसकी सेवा ६ साल बची नहीं रहती ।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों के लिए ऐसी नियुक्ति प्रणाली कानून बनाने सरकार से कहा है, जो संवैधानिक सुरक्षा से लैस हों और उन्हें ‘बलि का बकरा’न बनाया जा सके ।
कांग्रेस के एक और चहेते मनोहर सिंह गिल सीईसी पद से रिटायर होने के बाद पहले राज्य सभा सदस्य बने और फिर 2008 में कांग्रेस गठजोड़ सरकार में मंत्री बने ।
समस्या की जड़ है, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सरकार द्वारा एकतरफा अपनी पसंद से किया जाना । संविधान निर्माता बी॰ आर॰ अंबेडकर का संविधान सभा में दिया गया वक्तव्य आज याद करने की जरूरत है कि ‘‘कार्यकाल फिक्स नहीं किया जा सकता और यह सुनिश्चित हो, अगर संविधान में किसी चालाक, मूर्ख या ‘कार्यपालिका’के अधीन ‘अंगूठा छाप’व्यक्ति को आने से रोका जाए’’ । Archive quality note: This text is readable and verified for publication, but minor Unicode or source-quality imperfections may remain.
विषय
Politics, Governance and Administration Election Commission
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