विपक्ष की मजबूती भी ऐतिहासिक, इसे स्वीकारनी होगी

- शशिधर खान

	








नियुक्तियां टलने और खाली पदों के प्रति सरकार का उदासीन रवैया के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर मिली नोटिस के जवाब में सरकार ने यह दलील देकर पल्ला झाड़ा कि लोकसभा में विपक्ष का नेता नहीं है । सुप्रीम कोर्ट ने फटकार के साथ ऐसा प्रावधान करने कहा ताकि लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता को चयन समिति के सदस्य के रूप में बैठक में बुलाया जाए । 

ऐसा प्रावधान तो हुआ और चयन समिति की बैठकों में लोकसभा में कांग्रेस नेता को बुलाया भी गया । लेकिन केंद्र सरकार ने न तो किसी कारण से लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता के बैठक में न आ पाने की परवाह की, न ही चयन के लिए सूचीबद्ध किसी नाम पर उनकी आपत्ति को तरजीह दी ।  



क्योंकि २०१४ और २०१९ में भाजपा को अपनी बदौलत लोकसभा में पूर्ण बहुमत हासिल हुआ था । दूसरा कार्यकाल समाप्त होने का समय नजदीक आते-आते राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठजोड़ (एनडीए) सरकार मान चुकी थी कि देश में भाजपा का विकल्प नहीं है और कांग्रेस मजबूत नहीं  होगी । २०२४ में भी लोकसभा में किसी विपक्षी दल को विपक्षी नेता का दर्जा नहीं हेागा । इसलिए दिसंबर, २०२३ में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तथा सेवा शर्तों वाले एक्ट में केंद्र सरकार ने चयन समिति में से भारत के प्रधान न्यायाधीश का प्रावधान हटा दिया । अपनी पसंद के मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त चयन करने में सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस एक बाधा सरकार के लिए बन सकते थे । इसलिए संसद के शीतकालीन सत्र में दिसंबर, २०२३ में केंद्र सरकार ने कानून बनाकर यह प्रावधान हटा दिया, जो सीजेआई के निर्देश पर ही दिया गया था । 

उसके अलावे तीन अन्य एक्ट भी बिना किसी चर्चा के लगभग सभी विपक्षी सदस्य की गैर मौजूदगी में पास किया गया । ये तीन कानून हैं - भारतीय न्याय संहिता (बीएनन) 2023, भारतीय साक्ष्य संहिता (बीएसए) 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) 2023, जो 01 जुलाई से लागू होना तय है । 


पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के बरिष्ठ नेता पी॰ चिदंबरम ममता बनर्जी से मिले । दोनों नेताओं ने गत 10 वर्षों में पास बिलों की समीक्षा और सदन में समन्वय पर चर्चा की । 

इंडिया गठजोड़ के तीन सबसे बड़े घटकों में संसद के दोनों सदनों को मिलाकर कांग्रेस के 125, तृणमूल कांग्रेस के 42 और समाजवादी पार्टी के 41 सदस्य हैं । 

ममता बनर्जी ने कांग्रेस नेता से मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री को पत्र लिखा । चुनाव से पहले दीदी कांग्रेस के साथ एक मंच साझा नहीं करना चाहती थी । वामदलों को भी ज्यादा तवज्जों देने के पक्ष में नहीं थी । इसलिए भाजपा इंडिया गठजोड़ को चुनौती नहीं मान रही थी । जद(यू) नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इंडिया गठजोड़ के एक घटक राष्ट्रीय जनता दल का साथ छोड़कर वापस भाजपा का दामन थाम चुके थे । 


२४ जून को संसद सत्र के पहले ही दिन से शुरू गतिरोध में यह बात स्पष्ट उभरी कि भाजपा अभी भी विपक्ष को चुनौती नहीं मानती । 



इस सोच के कारण सत्र की शुरूआत ही टकराव से हुई और आक्रामक रवैया दोनों पक्षों के बीच चुनाव प्रचार अभियान जैसा देश के मतदाताओं ने देखा । सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ नेताओं ने विपक्षी इंडिया गठजोड़ नेताओं से विचार-विमर्श करके कोई निर्णय लेना जरूरी नहीं  समझा । सबमें भाजपा पहले, अन्य दल बाद में वाली नीति अपनायी । प्रधानमंत्री समेत नवनिर्वाचित लोकसभा सदस्यों केा सदस्यता की शपथ दिलाने के लिए राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रोटेम स्पीकर भर्तृहरि महताब हाल ही में बीजू जनता दल छोड़कर भाजपा में आए हैं । भाजपा को ओडिशा में कई वर्षों से चली आ रही बीजू जनता दल सरकार को अपदस्थ करने में सफलता मिली है । 


लेकिन उस दौरान सदन का माहौल इतना हंगामेदार और अप्रिय प्रसंगों से डूबा रहा, उससे जनता के बीच अच्छा संदेश नहीं गया । विपक्षी सदस्य कांग्रेस के नेतृत्व में संविधान की प्रतियां लहराते हुए सदन में पहुंचे थे । राहुल गांधी ने संविधान हाथ में लेकर सदस्यता की शपथ ली । इसके पीछे की कहानी ये है कि चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के ‘इस बार 400 पार’के नारे के जवाब में कांग्रेस नेताओं ने कहा कि अगर भाजपा को इतनी सीटें मिली तो संविधान बदल देगी और आगे चुनाव नहीं होंगे । अगले दिन 25 जून की तारीख ने प्रधानमंत्री को कांग्रेस का मुंह बंद करने का मौका दे दिया । 25 जून, 1975 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमर्जेंसी लगाकर विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया था । 


२६ जून को स्पीकर के चुनाव के दिन भी आपसी खटास हावी रही । ओम बिरला के नाम का भाजपा प्रस्ताव इंडिया गठजोड़ को मंजूर नहीं था । इसका कारण यही था, जो ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र में लिखा था । स्पीकर के रूप में ओम बिरला ने दिसंबर, २०२३ में बिना चर्चा के सारे बिल पास कराने के लिए 150 विपक्षी सदस्यों को सदन से निलंबित कर दिया । ओम बिरला को दोबारा लोकसभा स्पीकर बनाने के बजाए भाजपा अगर किसी अन्य नेता का नाम इस पद के लिए प्रस्तावित करती तो विपक्ष की नाराजगी टल सकती थी और शायद के॰ सुरेश के नामांकन की नौबत नहीं आती । ओम बिरला ध्वनिमत से २६ जून को स्पीकर चुन लिए गए । लेकिन यह बात छिपी नहीं रही कि भाजपा ने विपक्ष को टकराने के लिए ललकारा । 




भाजपा अगर स्पीकर का पद अपने ढुलमुल सहयोगी तेलुगू देसम पार्टी या जनता दल (यू) को दे देती तो फिर से एक स्वस्थ परंपरा कायम होती और विपक्षी गठजोड़ शायद उसका विरोध नहीं करता । डिप्टी स्पीकर के पद के लिए भी दोनों पक्षों में सहमति बन जाती, जो शर्त कांग्रेस ने ओम बिरला को समर्थन देने के लिए रखी । 

03 जुलाई तक चलनेवाले इस सत्र में नीट-यूजीसी विवाद हर हंगामा तो जारी रहना ही है । न्याय संहिताओं का भी मामला उठ सकता है । 


सुनवाई करनेवाली सुप्रीम कोर्ट पीठ के अध्यक्ष चीफ जस्टिस डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़ हैं, जिनका कार्यकाल 10 नवंबर, २०२४ तक है । इसलिए सुनवाई तेजी से होगी । वर्तमान सीईसी राजीव कुमार का कार्यकाल फरवरी, 2025 में समाप्त होगा । उस समय तक सरकार को सुप्रीम कोर्ट और लोक सभा में विपक्ष के नेता से निबटना आसान नहीं होगा ।