घटते जनाधार में वाम की कांग्रेस गठजोड़ फांस - शशिधर खान हाथिए पर जाते वाम दलों में अन्य के मुकाबले बेहतर स्थिति वाली सीपीएम (मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी) उन कारणों की तलाश में जुट गयी है कि अवाम के बीच उसकी पहुंच क्यों कम हो गयी और जनाधार क्यों घटता जा रहा है । सीपीएम की हाल में मदुरई में संपन्न 24वीं कांग्रेस में निर्वाचित नए महासचिव एम॰ ए॰ बेबी ने दायित्व ग्रहण करते ही कहा कि पार्टी इस बात का आत्मनिरीक्षण करेगी कि अवाम से कटती क्यों जा रही है और आम लोगों से जुड़ने की कोशिश में जुटेगी । 31-03-2025 को दीदी ने ईद रैली संबोधन में कहा कि राम (भाजपा) और वाम दंगा भड़काना चाहते हैं । लोकसभा चुनाव २०२४ में कांग्रेस की सीटों में भारी उछाल आया और यह सबसे ज्यादा सीटें जीतनेवाली पार्टी बनी । २०१९ आम चुनाव में कांग्रेस को इतनी भी सीटें नहीं मिली कि सदन में विपक्षी पार्टी का दर्जा मिले । आज वामदलों को सदन के अंदर और बाहर कांग्रेस के साथ चलने की विवशता है । दूसरी तरफ केरल की फांस है, जो सीपीएम के लिए कांग्रेस के अनुसार चलकर भाजपा से मुकाबले में बाधक है । इसके बावजूद सीपीएम के अधिवेशन (कांग्रेस) में पहले दिन 02 अप्रील को ही मदुरई में जुटे कामरेडों ने इस बात पर मुहर लगा दी कि केरल में २०२६ विधान सभा चुनाव मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन के ही नेतृत्व में पार्टी लड़ेगी । एक महीना पहले 03 मार्च को सीपीएम के केरल सम्मेलन में राज्य के और बाहर से आए प्रतिनिधि ने वाम एकता पर बल दिया । सीपीएम का प्रस्ताव लगभग ६ महीने से चर्चा में था । महासचिव सीताराम येचूरी की सितंबर, २०२४ में मृत्यु से पहले ही अधिवेशन की जगह और तारीख तय हो गयी थी । प्रकाश करात उस समय से पार्टी ‘कोऑर्डिनेटर’के रूप में काम कर रहे थे । एम॰ ए॰ बेबी सीपीएम महासचिव बननेवाले ई॰ एम॰ एस॰ नंबूदिरीपाद के बाद केरल के दूसरे नेता हैं, जिनका चुनाव लड़ने और आम मतदाताओं से सीधा वास्ता रखने का अनुभव रहा है । सीपीएम के अवाम से कटने जाने का एक प्रमुख कारण है सारे निर्णय लेनेवाली पार्टी की एलीट पोलित ब्यूरो । इसके ज्यादातर सदस्य वही रहे हैं, जिनकी वैसे किसान, मजदूर, दलित तबके के बीच पकड़ नहीं है, जो सबसे ज्यादा संख्या में जुटकर वोट डालते हैं । काफी समय से जेएनयू ब्रांड पोलित ब्यूरो सदस्य महासचिव बन रहे हैं, जो आम मतदाताओं की नब्ज मीडिया के जरिए टटोलते हैं । पार्टी पोलित ब्यूरो में फेरबदल के साथ-साथ सीपीएम ने इंडिया गठजोड़ की मजबूती और अवाम तक पहुंच दोनों को बहमियत दी । सीपीएम अधिवेशन समाप्त होने के बाद 08 और 09 अप्रील को गुजरात में कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की बैठक चली । 64 वर्षो बाद अहमदाबाद में आयोजित इस सम्मेलन में कांग्रेस में संगठनात्मक ढांचा मतबूत करने के उपाय मुख्य रूप से गुजरात पर केंद्रित थे, जहां कांग्रेस को भाजपा 30 वर्षों से सत्ता में आने नहीं दे रही है । इस सम्मेलन में इंडिया गठजोड़ पर कोई चर्चा नहीं हुई । कांग्रेस के विषय में आम चर्चा होती है कि यह मुट्ठी भर नेताओं द्वारा ड्राइंग रूम में बैठकर चुनावी निर्णय लेनेवाली पार्टी हो गयी है । वही फैसला जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं तक आलाकमान के आदेश के रूप में जाता है, जिसके नेता कार्यकर्ताओं से बात करके कोई फीडबैक लेना जरूरी नहीं समझते । कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’यात्रा का लाभ कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में मिला । चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस का सुर बदल गया, जो हाल में दिल्ली विधान सभा चुनाव में देखने को मिला । कांग्रेस ने अगर विधान सभा चुनाव की जमीनी सच को समझा होता तो आम आदमी पार्टी इंडिया गठजोड़ का हिस्सा बनी रहती और भाजपा को बहुमत में शिकस्त देने लायक सीटें जीत सकती थी । कांग्रेस का फिर से सफाया हो गया । अभी नवंबर, 2025 में बिहार विधान सभा चुनाव है । विपक्षी महागठजोड़ का चुनावी तालमेल बैठकों का सिलसिला जारी है । अगर कांग्रेस ने तौर-तरीका नहीं बदल तो ज्यादा नुकसान उसी को उठाना होगा । वाम दलों की निचले तबके के बीच कांग्रेस से बेहतर पकड़ है । राष्ट्रीय जनता दल की तहर कांग्रेस के पास जनाधार वाला नहीं है । इसी बीच महाराष्ट्र में विपक्षी महाविकास आघाड़ी के घटक उद्वव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने कांग्रेस से जानना चाहा है कि लोकसभा चुनाव के समय अस्तित्व में आया इंडिया गठजोड़ कहां है, अहमदाबाद में चर्चा क्यों नहीं हुई ?
घटते जनाधार में वाम की कांग्रेस गठजोड़ फांस
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