उत्तर पूर्व में बदल सकती है चुनावी तस्वीर

                                                                                                 - शशिधर खान

	




२०२१ में असम में भाजपा दूसरी बार सत्ता में आ चुकी है । मणिपुर में भी भाजपा २०२२ में लगातार दूसरीबार सत्ता में आयी । इन दोनों राज्यों में १५ साल से चली रही कांग्रेस सरकार को भाजपा ने अपदस्थ किया । 

भाजपा के लिए असली चुनौती अभी त्रिपुरा है, जहां २० वर्षों से कायम सीपीएम (मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी) सरकार को हटाने में भाजपा को कामयाबी मिली । अमित शाह २०२३ के शुरू में ही ५ जनवरी को सबसे पहले त्रिपुरा गए और राज्यव्यापी चुनावी यात्रा को झंडी दिखाकर रवाना किया । उसके बाद मणिपुर और फिर नगालैंड पहुंचे । त्रिपुरा में भाजपा ने २०१८ में कुछ छोटे दलों को मिलाकर सीपीएम और कांग्रेस को पटखनी जरूर दी, मगर भाजपा की सरकार के अंदर उठापटक का सिलसिला पूरे पांच साल तक चलता रहा । त्रिपुरा में सीपीएम नीत वाम गठजोड़ की सरकार चल रही थी और कांग्रेस विपक्ष में होती थी । लेकिन इस चुनाव के करीब आते-आते भाजपा के अंदरूनी मतभेद ने वाम दलों और कांग्रेस को एक मंच पर लाकर मजबूत बना दिया है । 

मणिपुर की तरह त्रिपुरा में भी भाजपा को अपने ‘आया राम गया राम’एजेंडे से ही सरकार बनाने का अवसर मिला । त्रिपुरा में अबकी भाजपा का साथ ‘राम’छोड़ रहे हैं । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अगरतला जाने से हफ्ताभर पहले बरिष्ठ भाजपा गठजोड़ विधायक दिबा चन्द्र ह्रांखाल वापस कांग्रेस में जा चुके थे । 2 वर्षों में त्रिपुरा की भाजपा गठजोड़ का साथ छोड़नेवाले वे आठवें विधायक थे । उनमें पांच भाजपा के थे । दिबा चन्द्र ह्रांखाल और पूर्व मंत्री सुदीप रॉय बर्मन २०१८ विधान सभा चुनाव के समय कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे, जो दोनों वापस कांग्रेस में चले   गए । 

भाजपा ने 36 सीटें जीतकर त्रिपुरा में २०१८ में पूर्ण बहुमत की सरकार बनायी थी । उस वक्त सत्तारूढ़ सीपीएम को मात्र 16 सीटों पर जीत हासिल हुई थी । कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पायी । सरकार बनाने के कुछ महीने बाद भाजपा को राज्य में नेतृत्व बदलना पड़ा । विप्लव देव को हटाकर मानिक साहा को मुख्यमंत्री बनाया गया । त्रिपुरा में चल रहे चुनावी रथयात्र के समापन के दिन 12 जनवरी को शामिल हुए भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जे॰ पी॰ नड्डा समझ रहे हैं कि त्रिपुरा में कांग्रेस वाम गठजोड़ पश्चिम बंगाल की तरह निष्प्रभावी नहीं होगा । २०२१ में भाजपा को कांग्रेस-वाम के अंदरूनी गठजोड़ मतभेद के कारण 75 सीटें जीतकर बंगाल विधान सभा में पहली बार मजबूत विपक्षी पार्टी बनने का मौका मिला । मेघालय में भाजपा के लिए सत्तारूढ़ नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (दीदी) की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) कठिन चुनौती है । 

पूर्वोत्तर समेत जिन नौ राज्यों में २०२३ में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं, उनमें सबसे ज्यादा अहम भाजपा के लिए त्रिपुरा है । इस राज्य में एक और कठिन चुनौती भाजपा के लिए अलग तिपरालैंड राज्य की मांग ने खड़ी की हुई है । 


मेघालय में सत्तारूढ़ क्षेत्रीय दल एनपीपी गठजोड़ मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने २०२२ के अंत में ही कह दिया कि वे २०२३ में विधान सभा चुनाव अकेले लड़ेंगे । उन्होंने कहा कि भाजपा नीत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठजोड़ (एनडीए) को समर्थन जारी रहेगा, मगर विधान सभा चुनाव में भाजपा या किसी अन्य पार्टी से कोई गठजोड़ नहीं होगा । कोनराड संगमा ने २०१८ में कुल 60 में से 53 सीटों पर अकेले ही चुनाव लड़ा था । ममता बनर्जी की पार्टी सीपीएम ने मेघालय में अपना पैर फैलाया है । २०२१ में कांग्रेस के कुल 17 में से 12 विधायक टीएमसी में शामिल हो गए । तृणूमल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी (दीदी) मेघालय में एक साथ सत्तारूढ़ एनपीपी, भाजपा और कांग्रेस तीनों को शिकस्त देने की तैयारी में जुटी है । नवंबर, २०२२ दलबदल में पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा 12 कांग्रेस विधायकों को लेकर टीएमसी में जाने के बाद से विपक्ष के नेता हैं । 13 जनवरी को दीदी ने मेघालय में कई चुनावी सभाओं को संबोधित किया । दीदी त्रिपुरा में भी अपनी पार्टी का विस्तार चाहती हैं । 

मेघालय में भाजपा को असम-मेघालय सीमा विवाद के नवंबर, २०२२ में हिंसक रूप लेने का भी नुकसान उठाना पड़ सकता है । असम की भाजपा सरकार और मेघालय सरकार दोनों ने सीमावर्ती गांव मकरोह में ग्रामीणों के खिलाफ पुलिस फायरिंग का एक-दूसरे पर आरोप लगाया । ६ लोग झड़प में मारे गए । केंद्र सरकार दोनों सरकारों के बीच समझौता नहीं करा पायी । विवाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित है । 

देश भर में चल रहे धर्मान्तरण विवाद के बीच असम में एक नया झमेला उसी समय उभरा, जब मेघालय-असम सीमा पर तनाव चरम पर था । असम में स्पेशल ब्रांच के एसपी ने सभी जिलों के एसपी को 16 दिसंबर को पत्र लिखा, जिसमें एक साल के अंदर स्थापित चर्चों की संख्या और मौजूदा चर्चों के अलावा धर्मान्तरण में शामिल लोगों की जानकारी मांगी गयी थी । 

असम पुलिस का यह पत्र उस समय राजनीतिक रंग ले लिया, जब लीक होने के बाद असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक बयान जारी करके उन विवादित पत्र से खुद को अलग कर लिया । रिपोर्ट है कि उस पत्र की प्रति असम के डीजीपी जी॰ पी॰ सिंह और गृह विभाग के प्रधान सचिव नीरज वर्मा को भी भेजी गयी थी । इसाई बहुल मतदाता वाले मेघालय में यह विवाद भाजपा के वोट को प्रभावित कर सकता है और नगालैंड में भी । 

चर्च प्रभुत्व वाले नगालैंड का चुनाव मुद्दा मणिपुर और मेघालय से अलग है । नगालैंड में पिछले कई विधान सभा चुनाव एकमात्र नगा झमेले का स्थायी हल एजेंडे को लेकर लड़े गए हैं । इस एक मुद्दे पर नगालैंड के सारे मतदाता और भाजपा समेत सभी पार्टियां एकजुट हैं कि २६ वर्षों से बेनतीजा चल रही ‘भारत-नगा वार्ता’का निदान निकलना चाहिए । मुख्यमंत्री नेफियू रियो के नेतृत्व में सत्तारूढ़ गठजोड़ है, विपक्ष नहीं है । नगा मतदाता केंद्रीय गृह मंत्री से इस पर ठोस आश्वासन की उम्मीद कर रहे थे । अमित शाह ने मणिपुर की तरह नगालैंड में भी उग्रवाद समाप्त होने और शांति, प्रगति का पूर्वोत्तर में नया युग शुरू होने की बात जरूर कही, मगर वे नगा मुद्दे पर कुछ नहीं बोले । अमित शाह के दो दिन पहले नगालैंड मंत्रिमंडल ने बैठक करके नगा आदिवासी समुदायों से अलग राज्य की मांग छोड़ने और चुनाव में हिस्सा न लेने की धमकी वापस लेने की अपील की । पूर्वोत्तर में उग्रवादी की नींव रखनेवाले सबसे मजबूत उग्रवादी गुट नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (एनएससीएन) ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम’की मांग पर अड़ा है । जिसका भारत से अलग ‘झंडा और संविधान’हो । उनमें सात नया नगा गुटों के मंच नगा नेशनल पोलिटिकल ग्रुप (एनएनपीजी) के साथ केंद्र का संघर्षविराम समझौता चल रहा है । ६ जनवरी को जब नगालैंड में अमित शाह 1352 करोड़ रूपये की विकास परियोजनाओं की आधारशिला रख रहे थे, उसी दिन एनएनपीजी ने प्रदेश भाजपा यूनिट अध्यक्ष एलोंग लोंगकुमेर पर नगा शांति प्रक्रिया में अड़ंगा लगाने का आरोप लगाया । 

केंद्रीय गृह मंत्री के पूर्वोत्तर दौरे के पहले से ही सारे नगा जन संगठन चुनाव से पहले नगा झंझट का स्थायी समाधान निकालने की मांग कर रहे हैं । अमित शाह के लौटने के बाद से विरोध, प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है । 


इन संगठनों ने मिलकर 13 जनवरी को ६ घंटे का ‘नगालैंड बंद’का आयोजन किया, जिसमें नगा हल के लिए गठित नगालैंड पीपुल्स एक्शन कमिटी का केंद्र से संघर्षविराम समझौता वाले सातों गुटों ने भी साथ दिया । 


प्रधानमंत्री के निर्देश पर गठित उत्तर पूर्व काउंसिल (एनईसी) की बैठक 18 दिसंबर को शिलांग में हुई, जिसकी अध्यक्षता उन्होंने ही की । प्रधानमंत्री उसके बाद अगरतल्ला भी गए । उस समय तक त्रिपुरा भाजपा गठजोड़ सरकार से अलग होकर कई विधायक भाजपा का साथ छोड़ चुके थे और मेघालय के मुख्यमंत्री भी विधान सभा चुनाव भाजपा से मिलकर न लड़ने का एलान कर चुके  थे ।