प्रधानमंत्री ने अलापा ‘नक्सल कांग्रेस’ चुनावी राग

                                                                                      - शशिधर खान

	




खासकर नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश विधान सभा चुनावों में प्रधानमंत्री सबसे ज्यादा इसी बात का प्रचार करते हैं । फिर बारी-बारी से भाजपा के और भी बरिष्ठ नेता कांग्रेस को नक्सलियों से सांठगांठ रखनेवाली पार्टी बताकर इसका चुनावी लाभ उठाने का प्रयास करते हैं । 


मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के साथ-साथ राजस्थान और तेलंगाना में भी चुनाव हो रहे हैं । उनमें तेलंगाना तो पुराना नक्सल गढ़ है, लेकिन वहां इन पर काबू पा लिया गया है । तेलंगाना में कांग्रेस-नक्सली मिली भगत की चर्चा भाजपा नेता नहीं करते । वहां भाजपा के मुकाबले में कांग्रेस है भी नहीं । तेलंगाना में टक्कर सत्तारूढ़ भारत राष्ट समिति और भाजपा के बीच है, ऐसा भाजपा नेता मानकर चल रहे हैं । 






प्रधानमंत्री की सियासी लाभवाली इस परिभाषा का ओर-छोर ये है कि हमेशा से दबे-कुचले सामाजिक पहचान से वंचित दलित-आदिवासी इलाके में नक्सलियों की पैठ गहराई तक है । गुजरात चुनाव के दौरान भी २०२२ में प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के साथ-साथ आम आदमी पार्टी प्रमुख दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ भी इस जुमले का इस्तेमाल उस समय किया, जब केजरीवाल आदिवासी इलाके में चुनाव रैली करने पहुंचे । उस समय प्रधानमंत्री ने अपने गृह राज्य के मतदाताओं को सचेत करते हुए कहा - ‘समाज को गुमराह करनेवाले भेष बदलकर नक्सली रास्ते पर ले जाने का प्रलोभन दे रहे हैं A’ 





कांग्रेस को अर्बन नक्सल से जोड़ने का गुमला 01 जनवरी, २०१८ से शुरू हुआ है, जब महाराष्ट्र में भीमा कोरेगांव हिंसा का मामला सामने आया । भाजपा की नीतियों से सहमति नहीं रखनेवाले जानेमाने लेखक, प्रोफेसर, वकील, सामाजिक कार्यकर्ताओं को कथित रूप से भड़काऊ भाषण देने के आरोप में उनका ताल्लुक नक्सली गुट सीपीआई (माओवादी) से जोड़कर उनके खिलाफ UAPA (गैर कानूनी गतिविधियां रोक एक्ट) 1967 की धाराएं लगाकर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया । 

इनके मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंपी गयी । पुणे की स्थानीय अदालत से लेकर बंबई हाईकोर्ट तक इन देशद्रोहियों की जमानत अर्जी खारिज हो गयी । मामला सुप्रीम कोर्ट में गया । सुप्रीम कोर्ट में इन अभियुक्तों की ओर से कांग्रेस नेता और वकील अभिषेक मनु संघवी खड़े हुए । सुप्रीम कोर्ट जज ने तल्ख टिप्पणी की - ‘प्रेशर कूकर को अगर दबाया गया तो बर्स्ट कर जाएगा, लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आवाज दबाने के परिणाम का ख्याल रखा जाए ।’ कांग्रेस नेताओं की इन कथित माओवादी विचारकों के प्रति हमदर्द थी और आज भी है । अभी तक इन बुद्धिजीवियों को सुप्रीम कोर्ट से भी कोई खास राहत नहीं मिली है ।