मणिपुर में नेतृत्व के साथ नीति में बदलाव जरूरी
- शशिधर खान
मणिपुर में बेकाबू हिंसा इस महीने तीसरे साल में प्रवेश कर गयी । मई, २०२३ से जारी जातीय हिंसा के कारण लगातार जनजीवन अस्तव्यस्त है । राजनीतिक से ज्यादा सामाजिक तनाव के कारण लोग दहशत के माहौल में जी रहे हैं । इन तीन वर्षों में राष्ट्रपति शासन लगाया गया, नेतृत्व बदला गया और संघर्षरत समुदायों को विश्वास में लेने के भी प्रयास जारी हैं । मगर हालात सामान्य हो नहीं पा रहे हैं ।
हिंसा पर काबू पाने के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती, उपद्रवियों से सख्ती से निबटने के निर्देश का एक सामान्य सरकारी फार्मूला अपनाया गया है, जो विफल साबित हो रहा है । क्योंकि आम लोगों का केन्द्रीय सुरक्षा बलों पर से ही भरोसा उठ गया है ।
इसका मतलब अभी तक चल रही नीति में बदलाव पर विचार करने की जरूरत है, जिसमें देर ही नहीं, बहुत देर हो गयी है । केंद्र सरकार और राज्य सरकार की नीतियों के बारे में राजनीतिक चर्चा से अलग हटकर आम लोगों के बीच होनेवाली बातों पर गौर करने पर एक प्रमुख कारण यह उभरता है कि सरकारें सुरक्षा बलों से मिले फीडबैक के आधार पर ही कानून व व्यवस्था के हालात की समीक्षा करती है । सामाजिक और राजनीतिक संगठनों से भी उनके असंतोष के बारे में उसी आधार पर वार्ता की जाती है ।
हालिया घटनाक्रम यों है । 04 मई को केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार की नजर पांच राज्यों में हुए विधान सभा चुनावों में डले वोटों की गिनती पर थी, जश्न का माहौल था । और मणिपुर में उस दिन मातम पसरा था ।
धमाके में मारे गये दो मासूम बच्चों की शवयात्रा में 03 मई को इंफाल में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए । उसी दिन लोगों ने जातीय हिंसा की तीसरी बरसी में मौन जुलूस निकाला और इंफाल बंद का आयोजन करके अपना आक्रोश जताया । जगह-जगह रैलियां निकाली गयी, मगर लोगों के चेहरे पर और आंखों में मायूसी छायी थी । मणिपुर की भाजपा सरकार शोक में डूबी थी । क्योंकि बम धमाके में मारे गए दोनों बच्चे मेइतेइ समुदाय के थे, जिस समुदाय से स्वयं मुख्यमंत्री वाई खेमचंद सिंह हैं ।
गौरतलब है कि २०२३ में राज्य सरकार के कथित अप्रत्यक्ष इशारे पर मेइतेइ समुदाय की अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की मांग के विरोध में आयोजित आदिवासी एकजुटता मार्च के दौरान 03 मई को मेइतेइ और कुकी समुदायों के बीच भड़की हिंसा अभी तक जारी है । उस समय भी मेइतेइ समुदाय के मुख्यमंत्री एन वीरेन सिंह के कथित उकसाऊ भाषण से हिंसा और उफनी ।
लेकिन तनाव बढ़ता ही गया, सुरक्षा व्यवस्था और तगड़ी की गयी । दोनों बच्चों की लाशें नहीं लेने पर परिवारजन अड़े रहे । बच्चों के पिता सीमा सुरक्षा बल में हैं और बिहार में तैनात हैं । बच्चों की मां ऑल इंडिया इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) गुवाहाटी में नर्स है । बच्चों की लाशें इंफाल के रिजनल इंस्टीच्यूशन ऑफ मेडिकल साइंसेस (रिम्स-RIMS) में पड़ी रहने और आसपास का वातावरण प्रतिकूल होने से असहज स्थिति बनी रही ।
आखिरकार मुख्यमंत्री वाई खेमचंद सिंह ने 03 मई को शोक संतप्त परिवारजनों से बच्चों की लाश लेने की अपील की, जब हिंसा की तीसरी बरसी के समय माहौल और भी तनावपूर्ण हो गया । मुख्यमंत्री ने अपनी जमीन में परिजनों को भरोसा दिलाया कि दोषियों को पकड़ने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं । मुख्यमंत्री ने बच्चों के पिता को उनके वर्तमान पद और रैंक के समकक्ष नौकरी मणिपुर राइफल्स या इंडियन रिजर्व बटालियन में देने का आश्वासन दिया । बच्चों की मां को भी मणिपुर में वैसी ही नौकरी में लेने का आश्वासन दिया । किसी अगले हादसे तक के लिए सरकार का दायित्व समाप्त हो गया ।
पुलिस के अनुसार बम मृतक बच्चों के घर में दुर्योगवश बेडरूम में फटा । इसके पीछे आपसी वैमनस्य और बदले की भावना मानी गयी है । इसमें संदिग्ध कुकी समुदय का हाथ होने का अंदेशा बताया गया, मगर कुकी संगठन ट्राइबल लीडर्स फोरम (TLF -टीएलएफ) ने इस बारदात में शामिल होने के आरोप से इन्कार किया । हिंसा का मुख्य कारण मेइतेइ और कुकी समुदाय के बीच रंजिश है, जो अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के मामले से उठे विवाद के समय से चली आ रही है ।
प्रतिशोध की ज्वाला का असर नागरिकों में अंत्येष्टि के दिन भी नजर आया । नम आंखों से शवयात्रा में शामिल लोग रिम्स अस्पताल से दोनों बच्चों के जन्मस्थान विष्णुपुर तक गए । अंत्येष्टि उसी जगह की गयी, जहां सीआरपी फायरिंग में 07 अप्रील को मारे गए तीन लोगों की हुई थी ।
अब देखिए कि 07 अप्रील की घटना से लेकर हिंसा सिलसिला के तीसरे वर्ष में प्रवेश करने के समय तक केंद्र सरकार का क्या रवैया रहा । असम में हैट्रिक बनाने और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार को चुनाव में पटखनी देने में मशगूल भाजपा केंद्रीय नेतृत्व मणिपुर से बेखबर था । केंद्र सरकार का सिर्फ सीआरपी कैंप पर हमले के बाद कानून व व्यवस्था के हालात बिगड़ने की संभावना के कारण इस तरफ ध्यान गया ।
तारीखवार विवरण देखिए । 25 अप्रील को प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच इंफाल में उस समय झड़प हुई, जब उन्हें मुख्यमंत्री आवास की ओर मार्च करने से रोका गया । बाद में प्रदर्शनकारियों के एक प्रतिनिधिमंडल को मिलने की इजाजत दी गयी और उन लोगों ने मुख्यमंत्री खेमचंद सिंह को एक ज्ञापन सौंपा ।
उसी दिन केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने हालातों की समीक्षा के बाद अतिरिक्त केन्द्रीय सुरक्षा बल तैनाती का फैसला किया । गृह मंत्रालय सूत्रों के अनुसार पश्चिम बंगाल में चुनाव ड्यूटी के लिए भेजी गयी सीआरपीएफ की टुकड़ियां वापसी के बाद भेजी जाएंगी । 29 अप्रील को पश्चिम बंगाल में मतदान का दूसरा चरण था । छिटपुट हिंसा के मद्देनजर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि बंगाल में विधान सभा चुनाव संपन्न होने के बाद भी केन्द्रीय बल तैनात रहेंगे । मणिपुर से 85 कंपनियां (लगभग 8,500 सीआरपी जवान) बंगाल भेजे गए हैं, जिनकी वापसी अभी निकट भविष्य में संभव नहीं लगती ।
04 मई को मतगणना से पहले केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि पश्चिम बंगाल में कम-से-कम 60 दिनों तक सीआरपी तैनात रहेगी । मतगणना के बाद चुनाव परिणाम पश्चिम बंगाल में हिंसा और तनाव बढ़ानेवाला साबित हुआ । भाजपा को मिले प्रचंड बहुमत को तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्वीकार नहीं किया । उन्होंने हार स्वीकारने और मुख्यमंत्री पद छोड़ने से इन्कार कर दिया । गृह मंत्रालय का फोकस पूरी तरह मणिपुर से हटकर पश्चिम बंगाल पर केंद्रित हो गया ।
01 और 02 मई को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दुहराया कि मणिपुर में अतिरिक्त पुलिस बलों की तैनाती की जाएगी । साथ-साथ केंद्र तथा राज्य सरकार की कुकी-जो उग्रवादी समूहों से चल रही बेनतीजा वार्ता फिर से शुरू की गयी । इस बातचीत में भी संघर्षरत विभिन्न समुदायों के बीच शांति और सुलह प्रयासों में सुरक्षा तथा संचालन से जुड़े मुद्दे हावी रहे । टकराव कम करने के लिए सस्पेंसन ऑफ ऑपरेशन (एसओपी) कैंपों को स्थानांतरित करने पर सहमति हुई । सरकार ने १४ में से 07 कैंप शिफ्ट करने का प्रस्ताव रखा और कुकी-जो समूह अपने कैंप 12 तक सीमित रखने को राजी हुए ।
उधर पश्चिम बंगाल में हिंसा नए सिरे से उफन गयी । ममता बनर्जी को चुनाव में हरानेवाले भाजपा नेता सुवेन्दु अधिकारी के पीए की गोली मारकर हत्या कर दी गयी । उसके बाद २४ परगना जिले में पांच भाजपा कार्यकर्ताओं पर देशी बम से हमला हुआ । 08 मई को गृह मंत्रालय अमित शाह नवनिर्वाचित भाजपा विधायकों की बैठक में भाग लेने और स्थिति का जायजा लेने कोलकाता पहुंचे । उसी दिन मणिपुर की म्यांमार से लगी सीमा पर कुकी उग्रवादियों ने अपने प्रतिद्वंद्वी गुट के २० से ज्यादा मकानों में आग लगा दी और एक महिला का गोली मारकर हत्या कर दी । इस गुट का एक पैर म्यांमार में है, जहां सैनिक सरकार है ।
समस्या की जड़ ये है कि सारे कुकी-जो मेइतेइ और अन्य नगा गुट कई उपजातियों में बंटे हैं । इनमें आपस में समन्वय और सहयोग की जगह विद्वेष तथा नफरत की भावना ने ले ली है । आम नागरिकों को सुरक्षा देने में पुलिस बलों से चूक हो रही है और लोग असुरक्षित महसूस करते हैं ।
आम लोगों के बीच सरकार की संवेदनहीनता की चर्चा में यह बात सामने आ रही है कि सुरक्षा चूक की समीक्षा पर सियासी चूक हावी रहती है । जनता का ऐसा सोचना आधारहीन नहीं है ।
03 मई, २०२३ को जातीय हिंसा भड़की और एक ही महीने बाद इसके कारणों की जांच के लिए 04 जून को केंद्र सरकार ने आयोग का गठन किया । इस जांच आयोग को जल्द-से-जल्द रिपोर्ट देनी थी, लेकिन इसकी पहली बैठक के बाद से समय-सीमा मात्र ६ महीने तय की गयी । विगत तीन वर्षों में मणिपुर में हिंसा से मरनेवालों की संख्या बढ़ती जा रही है, तनाव बढ़ते जा रहे हैं । उसी हिसाब से हिंसा की शुरूआती घटनाओं की जांच के लिए गठित आयोग की जांच रिपोर्ट पूरी करने की डेडलाईन भी बढ़ती जा रही है ।
चार बार समय-सीमा बढ़ाए जाने के बाद अब 20-05-2026 डेडलाईन बतायी जा रही है । लेकिन और बढ़ोतरी की संभावना है । क्योंकि जांच आयोग को अभी हिंसा प्रभावित लोगों से मिले साक्ष्य आवेदनों के बाद उनके बयान रिकॉर्ड करने हैं । उस समय पुलिस प्रमुख पी॰ डुंगेल, मुख्य-सचिव राजेश कुमार और मुख्यमंत्री एन॰ बीरेन सिंह के भी बयान रिकार्ड होने हैं । पूर्व अध्यक्ष अजय लाम्बा ने खुद को अलग कर लिया तो केंद्र ने फिर पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज बलवीर सिंह चौहान को जांच आयोग का अध्यक्ष बनाया ।
अभी गत अप्रील में 2 बच्चों की मौत वाली हिंसा से पहले मुख्यमंत्री वाई खेमचंद सिंह सड़क मार्ग से विधायकों के साथ शांति प्रयासों में इंफाल के गिरिबाम जिले के तीन दिनों के दौरे पर गए, जो कुकी-जो तथा मेइतेइ समुदायों के बीच हिंसा का शुरू से केंद्र है ।
बिल्कुल असामान्य तरीके से शपथग्रहण के बाद फरवरी में मुख्यमंत्री को वहां हेलीकोप्टर से जाना पड़ा ।
हिंसा भड़कने के बाद से ही मुख्यमंत्री एन॰ बीरेन सिंह के खिलाफ भाजपा विधायकों ने झंडा उठा लिया । दो साल तक टालने के बाद केंद्र सरकार के निर्देश पर 09 फरवरी, 2025 को बीरेन सिंह ने सदन में अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने से पहले और सुप्रीम कोर्ट में उनके भड़काऊ बयान की जांच रिपोर्ट दिखाए जाने से पहले इस्तीफा दिया । उसके बाद लागू राष्ट्रपति शासन फरवरी, २०२६ में हटाया गया और नयी सरकार का गठन सभी समुदायों की मांग पर 2027 विधान सभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया गया ।
भाजपा ने पूर्वोत्तर में विकास और शांति का नया इतिहास रचा है । एक नया अध्याय है इतने लंबे समय तक हिंसा लगातार जारी रहने का, जो मणिपुर के इतिहास में दर्ज हो गया ।
Wमइेपजम – ूू.ेकाींद.पद मणिपुर में नेतृत्व के साथ नीति में बदलाव जरूरी
Ne Manipur