विद्रोही नगा नेता मुइवा का अपने गांव पहुंचना

                                                                              - शशिधर खान

	



वयोवृद्ध नगा नेता टी॰ मुइवा ने अचानक अपने गांव सोमडेल (मणिपुर) पहुंचकर नगा लोगों को फिर से याद दिला दिया कि नगा मसले का एकमात्र हल यही है कि भारत सरकार ‘स्वतंत्र सार्वभौम नगालिम संविधान और झंडे’को मान्यता दे । उनका जन्मस्थान सोमडेल मणिपुर के उखरूल जिले में पड़ता है । 


भारत की संघीय व्यवस्था से विद्रोह करके हिंसक लड़ाई ठानने के लिए 1970-71 में मुइवा ने अपना गांव छोड़ा और 55 वर्षों बाद वैसे समय में आकर अपने पैतृक घर, समाज के लोगों को भड़का गए, अब हालात सामान्य हैं । तनाव का माहौल नहीं है । लड़ाई के इतने वर्षों में मुइवा समेत एनएससीएन और अन्य नगा गुटों के भारत सरकार से शांति समझौता हुए । मुइवा के साथ वाले नेता अपनी मुहिम पूरी न हो पाने की हताशा लिए स्वर्ग सिधार गए । 91-वर्षीय टी॰ मुइवा भी अंतिम सीढ़ियां गिनने की हालत से गुजर रहे हैं । मुइवा अपने संगठन के दीमापुर स्थित हेब्रन हेडक्वार्टर से निकलकर सोमडेल गए और वहां एक हफ्ता गुजारकर लौटे । मुइवा ने नगा समाज और अपने जिला-जबाड़ी के विभिन्न नगा समुदायों को संबोधन के जो कुछ कहा, उसकी किसी भी हलकान में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई । कयास यही लगाए जा रहे हैं कि यह मुइवा की अपने साथियों की तरह हताशा और निराशा को ढंकने की झुंझलाहट है । 


एक साल बाद 2017 के जून महीने में ही एनएससीएन के दूसरे गुट के नेता एस॰ एस॰ खपलांग भी चले गए । खपलांग को भी अलग ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम’, अलग झंडा और संविधान के साथ चाहिए था । वे भी अपनी भूमिगत नगालिम सरकार के स्वयंभू ‘प्रधानमंत्री’थे । टी॰ मुइवा से खपलांग का मतभेद इसी मुद्दे पर हुआ कि मुइवा सिर्फ हिंसा की बदौलत दबाब डालकर अपनी मांग मनवाना चाहते थे और खपलांग भारत सरकार से वार्ता के पक्ष में थे । 1980 में खपलांग ने अपना अलग एनएससीएन बना लिया । २००२ में एनएससीएन (खपलांग गुट) की भारत सरकार से संघर्षविराम सहमति बनी और अंतिम हल तक वे नहीं पहुंच पाए । दोनों गुटों से भारत की वार्ता चलती थी । आइसाक चिशी संघीय नगालिम सरकार (भूमिगत) में थे स्वयंभू ‘राष्ट्रपति’। मुइवा एनएससीएन महासचिव हैं । 28 वर्षों से हिंसा की ओर लौटने की बेजान धमकी को यदा-कदा दुहराते हुए मुइवा के नेतृत्व में भारत सकरार से वार्ता चला रहे एनएससीएन प्रतिनिधिमंडल इसे ‘नगा इंडिया’वार्ता बताते हैं । वे यह भी बार-बार कहते हैं कि नगाओं का भारत से अलग अपनी विशिष्ट संस्कृति, पहचान रही है और इतिहास रहा है । 

अभी इस हफ्ते टी॰ मुइवा इस बात को फिर से 55 वर्षों में पहली बार मणिपुर में अपने गांव में कह गए कि ‘अलग झंडा और अलग नगा संविधान’के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा । नगा समझौते का हल तभी निकलेगा, जब भारत सरकार इसे मान्यता दे । मुइवा ने दावा किया कि 1997 और 2015 के समझौतों में भारत सरकार ने अलग नगा पहचान स्वीकारी है । 


मणिपुर में भी मई, २०२३ में भड़की जातीय हिंसा के बाद अभी हालात शांतिपूर्ण हैं । मणिपुर प्रशासन ने मुइवा के आने-जाने, रहने या किसी भी गतिविधि पर कोई रोक नहीं लगायी । नगा समाज को उकसाने वाली मुइवा की बोली प्रचारित होने के बावजूद मणिपुर प्रशासन ने उनका दौरा शांतिपूर्वक संपन्न हो जाने दिया । मुइवा ने मणिपुर पहुंचने की खबर 10 अक्टूबर को ही प्रचारित कर दी, मगर कहीं से इसका विरोध नहीं हुआ । जिला प्रशासन ने भी बेरोकटोक मुइवा का कार्यक्रम होने दिया । मुइवा अक्टूबर का अंतिम सप्ताह सोमडेल में गुजारकर वापस अपने दीनापुर हेडक्वार्टर लौट गए । 

मणिपुर से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार मुइवा का अपने गांव में परंपरागत तरीके से झंडे लहराते उत्साह के साथ स्वागत हुआ । उनकी उमर के इक्का-दुक्का ही बचे हैं, जिनसे मिलना-जुलना हुआ । मुइवा के तान्खुल समुदाय के लोगों ने उनके  स्वास्थ्य और दीर्घायु की चर्चों में प्रार्थना की । उखरूल जिले का ये वही गांव सोमडेल है, जहां से टी॰ मुइवा ने नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) महासचिव के रूप में पूर्वोत्तर के सभी नगा आबादी वाले इलाकों को मिलाकर ‘स्वतंत्र नगालिम देश’बनाने की लड़ाई ठानी और भूमिगत हुए । मुइवा के नाम पर पहले 1,00,000 रूपये का इनाम रखा गया, फिर कई बार वो राशि बढ़ायी गयी ।

मुइवा ने नगालैंड के दीमापुर में अपना हेब्रन डेडक्वार्टर बनाया और अपने विदेशी अड्डे से लौटकर यहीं रहते थे । मुइवा अपनी शर्तों पर विदेशी अड्डों पर ही भारतीय प्रधानमंत्रियों से मिला करते थे । उन साब बातों की तरह अब नगा संघर्ष और मुइवा स्वयं भी इतिहास का विषय बन चुके हैं । 

सोमडेल में मुइवा के एक परिजन 84 वर्षीय असुई मुइवा ने उनके स्वागत में कहा - ‘म्यांमार से सटे उखरूल का दौरा करनेवाले इंडिया में वे पहले ‘प्रधानमंत्री’हैं । 1964 में स्वतंत्र संप्रभु नगालिम के लिए सशस्त्र आंदोलन छेड़नेवाले टी॰ मुइवा गवर्नमेंट ऑफ दि पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ नगालिम के ‘ऑटो किलोन्सेर’(Auto Kपसवदेमत) प्रधानमंत्री हैं ।’सैकड़ों लोगों के बीच एक अखंड संघीय भारत के अंदर दूसरा देश (नगालिम) का दिवास्वप्न बुनते रहने का माहौल बनाकर मुइवा ने अपने साथियों को अपनी हठधर्मी पर कायम रहने का संदेश दिया । 

‘आजाद’नगालिम की हिंसक नींव भारत की आजादी से पहले रखनेवाले एनएससीएन के संस्थापक जापुओ फिजो को 1952 में पहले आम चुनाव का बायकाट करने के बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने वार्ता के लिए बुलाया । पंú नेहरू ने फिजो से कहा - ‘भारत के अंदर अलग स्वतंत्र संप्रभु नगालिम की मांग मैं तो क्या भारत के कोई भी प्रधानमंत्री पूरी नहीं कर सकते ।’आज तक ये बात सही साबित हो रही है । फिजो गुजर गए । कुछ वर्ष पहले तक किसी भी नगा वार्ता में खपलांग और मुइवा की तरह बुलाए जाने का लंदन से भारत को संदेश भेजनेवाली फिजो की बेटी ऐरिनो फिजो का भी कोई अस्तित्व नहीं है । 

यह सब जानते देखते हुए मुइवा ने ढलती उम्र में भी कहा - ‘आजादी कभी मुफ्त के उपहार में नहीं मिलती । नगा लोगों केा हमेशा अपनी आजादी की रक्षा के लिए तैयार रहना होगा । संघर्षविराम समझौता लड़ाई की बदौलत हो पाया है । नगा लोग कभी-भी अलग राष्ट्रीय झंडा और संविधान पर वार्ता न करें, जो दशकों पहले उनके गुट ने तय किया ।’

उखरूल से सटे सेनापति जिले में पहले एक जनसभा को और फिर संवाददाताओं को बहुत धीमी आवाज में मुइवा ने जोश भरा - ‘उनका गुट अपने दावे से एक इंच पीछे नहीं हटेगा और पूर्वोत्तर के सभी नगा आबादी वाले इलाकों को मिलाकर स्वतंत्र नगालिम गठन की एकमात्र मसले का हल है ।’

2010 में मणिपुर में कांग्रेस की सरकार थी, जिसने एनएससीएन नेता मुइवा को नगालैंड की सीमा से निकलकर मणिपुर में प्रवेश की इजाजत नहीं दी । सीमा पर उपजी हिंसा में ६ लोग मारे गए । नगालैंड में 2003 से ही लगातार नगा शांति वार्ता चलाने और नगा मसले का राजनीति हल के समर्थन वाली सरकार बन रही है । 

2001 में प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी शासनकाल में एसएससीएन (आईएम) के साथ चल रहे संघर्षविराम के दायरे में अरूणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर के भी नगा आबादी वाले इलाके को भी लाने का फैसला केंद्र सरकार ने किया । उसको लेकर इन राज्यों में बवाल मच गया । अरूणाचल प्रदेश, असम और मणिपुर की सरकारों ने विरोध किया । गैर नगा आबादी वाले इलाके की जनता सड़कों पर उतर आयी । उन राज्यों को एनएससीएन (आईएम) गुट के साथ संघर्षविराम का दायरा नगालैंड से बाहर बढ़ाने से अपनी क्षेत्रीय अखंडता पर खतरे की आशंका हो गयी । 


उसी समय मुइवा को चेत जाना चाहिए था, जब संघर्षविराम का दायरा बढ़ाने के केंद्र के फैसले के विरोध में उफने नगा आबादी समेत सभी लोगों ने एनएससीएन (मुइवा) के प्रस्तावित नगालिम को ठुकरा दिया । सभी अन्य बातों के अलावा मुइवा ने समूचे पूर्वोत्तर के नगा आबादी वाले इलाकों को मिलाकर ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम’के लिए लड़ाई जारी रखने के लिए भी अपने गांव, जिले के लोगों को हमेशा तैयार रहने कहा है । 

जबकि केंद्र से एनएससीएन (मुइवा) की वार्ता काफी समय से डंप चल रही है । 


केंद्र के वार्ताकार आर॰ एन॰ रवि को फिर नगालैंड का राज्यपाल बना दिया गया और वे वार्ता चलाते रहे, मगर बात आगे बढ़ी नहीं । फिर रवि को तमिलनाडु का राज्यपाल बनाए जाने के बाद केंद्र ने दूसरे रिटायर खुफिया प्रमुख अक्षय कुमार मिश्र को नया वार्ताकार नियुक्त किया । 

अक्षय मिश्र से एनएससीएन (आई एम) की अंतिम वार्ता की जानकारी अप्रील, २०२३ में मिली, जब मैं संयोग से दीमापुर में ही था । दीमापुर में हुई उस बैठक में शामिल होने मुइवा अपने संगठन के २० प्रतिनिधियों के साथ पहुंचे । वार्ता पहले की तरह बेनतीजा रही, क्योंकि अक्षय मिश्र केंद्र की ओर से ऐसा आश्वासन नहीं दे पाए, जो मुइवा चाहते हैं । केंद्र के वार्ताकार ने एनएससीएन के सातों नगा गुटों से भी मुलाकात की, जिन्होंने अड़ियल रवैया पर जोर नहीं दिया । 

मैं नगा झमेले की खोज में नगालैंड का सोनोमा गांव अप्रील, २०२३ में पहुंचा । इसी गांव में नगा आंदोलन के संस्थापक फिजो पैदा हुए । गांव के एक स्कूल शिक्षक बिजोले ने बताया कि - ‘खोनोमा गांव में आज कोई उग्रवादी गतिविधि नहीं, जहां फिजो जन्मे ।’ 

जनवरी, 2025 में एनएससीएन (आई एम) की ओर से जारी एक वक्तव्य में धमकी दी गयी कि ‘अगर किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप से जल्द समझौता नहीं हुआ तो फिर हिंसा की ओर लौटेंगे ।’मुइवा के दस्तखत से जारी इस वक्तव्य के बारे में केंद्र सरकार के सूत्रें को पता चला कि यह मुइवा के चीन स्थित सलाहकार फुनथिंग शिमरे और पामशिन मुइवा का ड्राफ्ट किया हुआ है । 

जनवरी, 2025 में ही केंद्रीय गृह मंत्रालय को पूर्वी नगालैंड के ६ जिलों को मिलाकर ईस्टर्न नगालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (म्च्PO) की अलग फ्रंटियर नगालैंड टेरिटरी (Fच्T) गठन की मांग पर वार्ता करनी पड़ी । उस वार्ता में भी केंद्र का प्रतिनिधित्व अक्षय मिश्र ने किया । इस संगठन ने फरवरी, २०२३ में नगालैंड विधान सभा चुनाव बायकाट की धमकी दी, जिसमें सभी नगा जनजातीय समुदाय के लोग हैं । केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के आश्वासन पर बायकाट वापस ले लिया । 

जनवरी, 2025 में ही अक्षय मिश्र ने नगा नेशनल पोलिटिकल ग्रुप (एनएसपीजी) नेताओं से गुवाहाटी में वार्ता की । 

अब एनएससीएन (आई एम) के मुइवा खुद सोच लें कि वे कहां ठहरते हैं और नयी पीढ़ी को किधर ले जाना चाहते हैं । 

  





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