मणिपुर में सुरक्षा बलों का नायाब सद्भाव प्रयास 

- शशिधर खान

	



जातीय हिंसा और तनावग्रस्त मणिपुर में सामाजिक सद्भाव का एक नायाब प्रयास तारीफ के लायक है । अर्द्धसैनिक बल असम राइफल्स ने ऐसे समय में यह प्रयोग इस हफ्ते आजमाया, जब नयी सरकार बनने और राष्ट्रपति शासन हटने के बाद नए तरह से हिंसा भड़क उठी । असम राइफल्स के अधिकारियों ने उन जातियों, समुदायों को फुटबॉल मैच के बहाने आपस में मिलवाया, जो एक-दूसरे से लड़ रहे हैं । इस आयोजन के लिए हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित मणिपुर के पहाड़ी इलाके को चुना गया, जहां बड़ी संख्या में सुरक्षा बल तैनात हैं । 


फुटबॉल टीम के लिए खिलाड़ियों को उसी गाड़ियों में मैदान तक ले जाया गया जिसमें बिठाकार हिंसा में शामिल संदिग्धों को थाने और हिंसा प्रभावित लोगों को राहत शिविरों या सुरक्षित स्थानों में पुलिस तथा असम राइफल्स के जवान ले जाते हैं । 

यह मैदान असम राइफल्स फूटहिल्स फुटबॉल टुर्नामेंट का है और सुरक्षा बल का हथियार भंडार भी इसी में है । 


मणिपुर की पहाड़ियों में कूकी-जो और घाटी में मेइतेइ समुदायों की आबादी ज्यादा है । पहाड़ी में ही मणिपुर की सबसे बड़ी तान्खुन नगा जनजाति के लोग रहते हैं । इनका आपस में मेलजोल और एक-दूसरे के घर के आसपास से गुजरने में भी लोग परहेज करते हैं । 03 मई, २०२३ से भड़की जातीय हिंसा के बाद से इन समुदायों के युवा अपने बुजुर्गों के निर्देश पर घड़ी और टॉर्च लेकर रातभर पहरा देते हैं । 


 सबसे ज्यादा और करने लायक बात यह रही कि कूकी गांव लिटान सारेकखोंग में रहनेवाले नगा समुदाय के खिलाड़ियों को टीम में लिया जाना । फुटबॉल मैच के समय ही लिटान गांव में तान्खुन नगाओं पर पथराव किया गया और कथित कूकी उग्रवादियों ने उनके कई मकानों में आधी रात के समय आग लगा दी । उसके जवाब में कूकियों के कुछ मकानों में भी आग लगाने की खबर फैली । 


मणिपुर में दरअसल नेतृत्व की नहीं, नीति में बदलाव की जरूरत थी । मेइतेइ की जगह कूकी मुख्यमंत्री बनाने से शायद हिंसा नहीं उफनती । २०२२ में मेइतेइ मुख्यमंत्री एन वीरेन सिंह ने अपने समुदाय को एस टी (अनुसूचित जनजाति) का दर्जा देने का फैसला करके यह विवाद खड़ा किया । 2 साल तक बेकाबू हिंसा के बाद विपक्षी कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव लाने से एक दिन पहले वीरेन सिंह ने 09/02/2025 को इस्तीफा दिया और मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया । उसके इस्तीफे से चार दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री के कूकी समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़काने वाले भाषण में उनकी आवाज की जांच का आदेश दिया । 

अभी जनवरी, २०२६ में सरकार गठन की प्रक्रिया के दौरान कूकी-जो कौंसिल ने केंद्र सरकार को चेताया कि २०२६ तक उनकी अलग यूटी (केंद्र शासित क्षेत्र) की मांग पूरी नहीं हुई तो 2027 मणिपुर विधान सभा चुनाव का वायकाट करेंगे । भाजपा के 32 विधायकों में से 10 कूकी-जो समुदाय के हैं, जिनमें सात ‘अलग प्रशासन’की मांग कर रहे हैं । गुवाहाटी से १४ जनवरी को प्राप्त रिपोर्ट में कूकी-जो कौंसिल ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को यह भी आग्रह किया कि बफरजोन के पास मेइतेइ विस्थापितों को बसाने की कथित कोशिश से तनाव बढ़ेगा । कूकियों का दावा है कि विगत तीन वर्षों की हिंसा में मारे गए 260 लोग कूकी समुदाय के ही हैं और विस्थापितों में 40,000 हैं । 

मणिपुर में हिंसा से राजनीतिज्ञ से ज्यादा सामाजिक जन-जीवन प्रभावित हुआ है । इस त्रासदी का स्कूली बच्चों के दिलो-दिमाग पर खौफजदा असर पड़ा है । असम राइफल्स द्वारा आयोजित सद्भावना फुटबॉल मैच के दौरान मैदान से सटे राहत शिविर के अंदर कुछ ड्राइंग और पेंटिंग देखे गए । किसी में एक आदमी पेड़ से लटका है और उसकी गर्दन मरोड़ी हुई है । एक ड्राइंग में घर जल रहा है, छत से आग की लपटें निकल रही है । कुछ पेंटिंग में एके-47 राइफलों से गोलियां दाजी जा रही है और चारों ओर खून के धब्बे हैं, लोग धुएं में बेहतासा जान बचाने को भाग रहे हैं ।

बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए मणिपुर आयोग के अध्यक्ष की शाम प्रदीप कुमार के मुताबिक 10 साल के मेइतेइ बच्चे ने पैंसिल और स्याही से ये स्केच बनायी है, जो उनके मानसिक हालत को दर्शाती है । ये उन बच्चों में से एक है, जिनके स्कूल राहत शिविर बने हुए हैं और वे सकूल जाने से वंचित हैं । 

संयोग कुछ ऐसा रहा कि असम राइफल्स के ‘सद्भावना ऑपरेशन’के बाद से हिंसा की कोई खबर नहीं मिली । मैच खतम होने के दिन 13 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस सूर्यकान्त की अध्यक्षता वाली पीठ मणिपुर ट्राइबन फोनम की याचिका पर सुनवाई के दौरान हिंसा पीड़ित मेइती और कूकी समुदायों से सम्बन्धित मुकदमे मणिपुर तथा गुवाहाटी हाईकोर्ट ले जाने को कह रही थी । 

  




                                                      4।, ब्लॉक जस्मिन, आरागेट के निकट]




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