नक्सल समस्या पर राजनीति नहीं, नीति की जरूरत
- शशिधर खान
अन्य राजभवनों की तरह छत्तीसगढ़ राजभवन भी राज्य में शोक की लहर से बेखबर ‘प्रोटोकॉल’का पालन करते हुए प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’समझने-समझाने में तल्लीन था । यहां तक कि छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता भी इसी अभियान को सफल बनाने में जुटे थे । मन की बात रेडियो प्रसारणों की 100 कड़ियों को बारी-बारी से आकाशवाणी से दुहराया जा रहा था और लोगों को इसे सुनने-सुनाने को प्रेरित किया जा रहा था । कर्नाटक चुनाव प्रचार चरम पर है, जहां भाजपा का सत्ता में बने रहना दांव पर है ।
प्रधानमंत्री समेत सभी केंद्रीय और छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता आनेवाले कुछ महीनों में नक्सली हमले में जान गंवानेवाले जवानों के परिवारजनों का दर्द अच्छी तरह भूल जाएंगे । भाजपा संस्कृति के इस भावनाशून्य आनंद सागर में शोकाकुल परिवार को भी भूलकर डूबना पड़ा ।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है और प्रधानमंत्री का यह चूनावी तकिया कलाम है कि ‘कांग्रेस की नक्सलियों से मिलीभगत है ।’नवंबर में छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनाव होना है । अभी मन की बात के बकाद आ गया योग दिवस, जो प्रधानमंत्री की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा है ।
तथ्यपरक घटनाक्रम के आलोक में इस द्विविधात्मक स्थिति का जायजा लेते हैं । दंतेवाड़ा की ताजा वारदात के पीछे-आगे टटोलने से पहले राजनीतिक बयानबाजी का जिक्र जरूरी है । क्योंकि इसका पुलिस के मनोबल पर असर पड़ता है, जिससे जवान नक्सलियों की तरह एलर्ट और मौके की तलाश में रहने जैसी मुस्तैदी नहीं दिखा पाते ।
2 साल के अंतराल के बाद यह सबसे बड़ा नक्सली हमला है । २०२१ के अप्रील महीने में ही वीजापुर के टेकालगुडियम गांव के निकट नक्सल रोधी अभियान में शामिल लगभग 1,000 जवानों को चार दिशाओं से 300-400 माओवादियों ने घेर लिया और अंधाधुंध फायरिंग करके २२ जवानों को मार दिया, कम-से-कम 35 को गंभीर रूप से जख्मी कर दिया ।
इस अभियान में केंद्रीय सुरक्षा बलों का एलीट दस्ता कोबरा, सीआरपी और डीआरजी सब साथ शामिल थे । नक्सली उनके हथियार, गोलाबारूद लूटने के साथ-साथ एक कोबरा जवान को भी अपने साथ ले गए । उस समय की चूके से अगर चेते होते तो अभी की दुखत घटना टली सकती थी । सुरक्षा बलों को मालूम है कि नक्सली मौसम और सुरक्षा बलों की तैयारी के हिसाब से अब टैक्टिकल हमले को अंजाम देते हैं । बरसात शुरू होने से पहले मार्च से मई तक नक्सली ऐसे हमले को अंजाम देते हैं, जिसका काट सुरक्षा बलों के पास नहीं होता । क्योंकि बरसात में आदिवासी बहुल नक्सल इलाकों का रास्ता दुर्गम हो जाता है । आई जी सुंदरराज के अनुसार अभियान से पहले जांच कर ली जाती है कि कहीं सड़क के नीचे IED तो रखी नहीं है, जो सुरंग बनाकर फिट की जाती है । जांच दल को सुरंग का पता नहीं चला और सड़क से पुलिस गाड़ी गुजरते ही उड़ गयी ।
मारे गए डीआरजी जवानों में ज्यादा वे युवक थे, जिन्होंने नक्सलियों का साथ छोड़कर आत्मसमर्पण किया था और जान बचाने के लिए पुलिस में भर्ती हुए थे । यह अभियान छत्तीसगढ़ में 2008 में शुरू किया गया, जब वहां भाजपा की सरकार थी और रमन सिंह मुख्यमंत्री थे । उन्होंने ही नक्सल प्रभावित इलाकों में युवकों को हथियार और पुलिस ट्रेनिंग देकर सरकारी नक्सली बनाया । ऐसे युवकों को सरकारी संरक्षण में नक्सल इलाके में नक्सल टोली ‘सलवा जुडूम’अभियान में लगाया गया । हत्या, लूट, आगजनी से पैदा हुई अराजक स्थिति पर बवेला मचा । राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने फटकार के साथ इस पर 2008 में ही तुरंत रोक लगायी ।
अभी जनवरी, २०२३ में बस्तर जिले में सीआरपी ने बस्तरिया बटालियन तैयार किया है, इसमें स्थानीय 400 आदिवासी युवकों को लिया गया है, जो गांव की भाषा जानते हैं और खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान में सक्षम होंगे । केंद्र की पिछली भाजपा सरकार में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सीआरपी की बस्तर में महिला यूनिट को हरी झंडी दी । आई॰ जी॰ सुंदरराज का कहना है कि हर साल 400 नक्सली आत्मसमर्पण करते हैं, जिनका पुनर्वास किया जाता है ।
२०१३ में छत्तीसगढ़ में भाजपा शासनकाल की दो घटना याद रखने लायक है । सुकमा जिले के झीरम घाटी में मई में हुए नक्सली हमले में मारे गए 27 लोगों में कांग्रेस के सारे टॉप नेता शामिल थे । हमलावार कौन थे ? सरकार ने नक्सली हाथ होने से इन्कार किया । उसके हफ्ते भर पहले 17-05-2013 को 1,000 सीआरपी जवानों ने जिस कथित ‘मुठभेड़’में ४ बच्चे समेत 8 लोगों को मार दिया, वो न्यायिक जांच रिपोर्ट में फर्जी साबित हुई । जांच रिपोर्ट के अनुसार निहत्थे एडेसमेट्टा गांव के 25-30 लोग फसल पूजा के लिये जुटे थे । Archive quality note: This text is readable and verified for publication, but minor Unicode or source-quality imperfections may remain.
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Internal Security Naxalism
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