नक्सलियों का वार्ता प्रस्ताव स्वागत योग्य पर सोच बदलें - शशिधर खान प्रतिबंधित नक्सली गुट सीपीआई (माओवादी) ने छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में अपने सबसे मजबूत गढ़ को ध्वस्त होते देख बातचीत का कथित प्रस्ताव प्रचारित किया है । यह शांति प्रस्ताव ऐसे समय में मीडिया के जरिए प्रकाश में आया जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने बस्तर क्षेत्र के दंतेवाड़ा जिला पहुंचने वाले थे । छत्तीसगढ़ सरकार ने 02 अप्रील को नक्सली प्रस्ताव पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि बातचीत के लिए राज्य सरकार तैयार है ताकि नक्सली संगठन के लोग मुख्य धारा में लौटें और समाज से जुड़ें । मगर उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने साफ शब्दों में कह दिया कि वार्ता की कोई शर्त नहीं होगी । केंद्रीय गृह मंत्री ने इस प्रस्ताव पर कोई टिप्पणी किए बगैर 05 अप्रील को दंतेवाड़ा में परंपरागत स्थानीय आयोजन ‘बस्तर पांडुम’में अपना पहले वाला एलान दुहराया कि ३१ मार्च, २०२६ तक नक्सलवाद खत्म करने को सरकार प्रतिबद्ध है । अमित शाह ने फिर से माओवादियों को हथियार डालकर समाज की मुख्यधारा में लौटने कहा । केंद्र सरकार की पहल पर चलाए जा रहे ‘ऑपरेशन कगार’अभियान में केंद्रीय सुरक्षा बलों और राज्य पुलिस को भारी सफलता मिली है । इससे छत्तीसगढ़ के अलावे अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों में भी माओवादियों का अस्तित्व खतरे के कगार पर है । लगभग बैकफुट पर जा चुके नक्सली गुट ने प्रस्ताव में यह जताने का प्रयास किया है मानो वे सुरक्षा बलों के आगे कमजोर नहीं पड़े हैं और कहा है कि सरकार अगर सैन्य अभियान बंद करेगी तो वे युद्धविराम की घोषणा करेंगे । प्रेस विज्ञप्ति में हिंसा छोड़ने और हिंसा के जरिए ही ‘क्रांतिकारी बदलाव’लाने वाली सोच बदलने का कोई संकेत नहीं है । राजनीतिक जुमले का इस्तेमाल करते हुए कहा गया - ‘हम हमेशा जनहित में शांति वार्ता के लिए तैयार है । इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों के आगे सकारात्मक माहौल के लिए यह प्रस्ताव किया गया है ।’ वार्ता प्रस्ताव प्रचारित किए जाने के दिन 02 अप्रील को ही मध्य प्रदेश के मांडला जिले में १४ लाख की इनामी दो महिला नक्सलियों की मौत पुलिस की गोलियों से हुई । राज्य पुलिस की नक्सल रोधी दस्ता हॉक फोर्स के साथ तलाशी अभियान के साथ हुई मुठभेड़ में दोनों मारी गयी । मध्य प्रदेश पुराना नक्सली गढ़ रहा है । 2000 में छत्तीसगढ़ बनने के बाद ज्यादातर नक्सली गतिविधियों वाले जिले मध्यप्रदेश से अलग हो गए । ये दोनों माओवादी महिला मध्यप्रदेश-महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ नक्सल क्षेत्र में सक्रिय थीं । 05 अप्रील को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के छत्तीसगढ़ पहुंचने से कुछ घंटे पहले २० लाख के इनामी चार माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया । उसी दिन शाम को तेलंगाना से 86 नक्सलियों के हथियार डालने की खबर आयी, जहां सीपीआई (माओवादी) गुट ने शांति वार्ता के लिए गोलमेज बैठक का जिक्र प्रस्ताव में किया । तेलंगाना सरकार की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार ये 86 लोग प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) गुट के ही हैं, जिन्होंने समर्पण के बाद कहा कि हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है । उधर छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में अमित शाह जनसभा में बता रहे थे कि 2025 के चौथे महीने की शुरूआत तक 521 माओवादियों ने हथियार डाले और २०२४ में 881 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया । केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि नक्सलियों का अपने ही सुरक्षा बलों के हाथों मारे जाने से खुशी नहीं होती, दोनों ही अपने हैं । मार्च, २०२६ तक नक्सल सफाया अभियान चलाना सरकार की विवशता है, ताकि माओवादी हथियार उठाकर आदिवासी भाई-बहनों का विकास न रोक सकें । ‘बस्तर पांडुम’सांस्कृतिक आयोजन के समापन समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री ने यह ऑफर भी दिया कि जो गांव नक्सलियों के आत्मसमर्पण में मदद करेंगे और खुद को माओवादी मुक्त घोषित करेंगे, उन्हें निर्माण तथा विकास के लिए एक करोड़ रूपये मिलेंगे । उस अवसर पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, उप मुख्यमंत्री अरूण साव और विजय शर्मा मौजूद थे । लेकिन अमित शाह समेत कोई भी माओवादियों की वार्ता पेशकश पर एक पंक्ति नहीं बोले । सीपीआई (माओवादी) का कथित प्रेस नोट तेलुगू में तैयार कया गया, जिसका हिन्दी अनुवाद छत्तीसगढ़ सरकार तक पहुंचा । उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा की एक और प्रतिक्रिया गौर करने लायक है । उन्होंने कहा कि पहले तो इस प्रेस नोट की प्रमाणिकता सुनिश्चित करनी है । पहले भी माओवादियों ने वार्ता की पूर्वी शर्त रखी कि सुरक्षा बल ६ महीने तक बैरकों से बाहर न निकलें और उनकी संख्या कम की जाए, जब इस पर अमल किया गया तो नक्सलियों ने फिर हमले की तैयारी कर ली । छत्तीसगढ़ सरकार का ऐसा कहना आधारहीन नहीं है । २०२३ में छत्तीसगढ़ में भाजपा के सत्ता में वापस लौटने के बाद मुख्यमंत्री बने विष्णुदेव साय ने माओवादियों को बिना शर्त बातचीत के लिए सामने आने कहा । २०२४ पूरे वर्ष सुरक्षा बलों के आगे लगातार पिछड़ने के बाद 2025 शुरू होते ही माओवादियों ने मौका पाकर हमला कर दिया । 06 जनवरी, 2025 को वीजापुर में नक्सलियों ने उस रास्ते में बारूदी सुरंग विछा दिया, जिधर से सुरक्षा बलों को तलाशी अभियान से लौटना था । इस जबर्दश्त बिस्फोट में ‘ऑपरेशन कगार’से जुड़े जिला रिवर्ज बल के 8 जवान मारे गए, उनके सिविलियन ड्राइवर की भी जान गयी । नक्सलियों को यह संदेश देना था कि वे ध्वस्त होने के कगार पर नहीं है । उसके बाद चार महीने में सुरक्षा बलों की ओर से चलाए गए सफाया/सरेंडर अभियान का जवाब है कथित बातचीत प्रस्ताव । इस संबंध में छत्तीसगढ़ की ही २०२१ की वारदात याद करना जरूरी है, जिस आलोक में वर्तमान सरकार ने प्रतिक्रिया दी है । 17-03-2021 को नक्सलियों ने राज्य सरकार के पास शांति वार्ता का प्रस्ताव भेजा, और 28 मार्च को सीआरपी जवानों से भरी बस बारूदी सुरंग बिस्फोट में उड़ा दी । 03 अप्रील, २०२१ को वीजापुर में ही मुठभेड़ में नक्सलियों ने तीन तरफ से टुकड़ियों में बंटकर जवानों को घेर लिया और अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी । उस हत्याकांड में २२ जवान मारे गए, कई घायलों और लापता का कोई सुराग नहीं मिला । एक लापता कोबरा बटालियन जवान रामेश्वर सिंह मनहास को नक्सलियों ने स्थानीय गणमान्य नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मध्यस्थता के बाद मुक्त किया । जो नक्सली गुट हिंसा की बदौलत ‘क्रांतिकारी बदलाव’के दिवास्वप्न देख रहे हैं, उन्हें शांति मुंडा से प्रेरणा और पश्चिम बंगाल से सबक लेनी चाहिए । 1967 में पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी आंदोलन की नींव रखने का श्रेय 83 वर्षीया शांति मुंडा उर्फ शांति सरकार को जाता है । आंदोलन के सूत्रधार कानू सान्याल, चारू मजुमदार, सरोज दत्ता, महादेव मुखर्जी की पीढ़ी के नेताओं में से एकमात्र शांति मुंडा जीवित बची हैं । शांति मुंडा पहली महिला हैं, जिन्होंने 25-05-1967 को आदिवासियों की जमीन हड़पने के लिए जमीन्दारों की ओर से पहुंची पुलिस टीम पर तीर चलाया था । २०२४ लोक सभा चुनाव के दौरान 13-04-2024 को नक्सलवाड़ी (दार्जिलिंग) में शांति मुंडा से बातचीत का अवसर मिला । उन्होंने कहा - ‘मेरे पास सिर्फ अपनी जोत की जमीन है और वृद्धावस्था पेंसन सरकार से मिलता है । आन्दोलन से इतना ही मिला । खात्मे की राजनीति गलत है, आप कितने को मारेंगे । इस पर मेरा कानू दा से मतभेद था, यहां कानू सान्याल की झोपड़ी को छोड़ कहीं लाल झंडा नहीं है ।’ चारू मजुमदार के बेटे अभिजित मजुमदार 2009 में दार्जिलिंग लोकसभा सीट से हार गए । ये इस बात की सबूत है कि जो मुख्य धारा की राजनीति में हैं, उन्हीं के परिवारजन को मतदाता स्वीकारते हैं । पश्चिम बंगाल आज नक्सल मुक्त है । नक्सल गढ़ जंगलमहल के हीरो छत्रधर महतो 11 साल जेल में रहकर फरवरी, २०२० में छूटे । २०१९ लोकसभा चुनाव में भाजपा का साथ दिया, २०२१ विधान सभा चुनाव में दीदी (ममता बनर्जी) के साथ हो गए ।
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Internal Security Naxalism
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