मणिपुर को समझाने से ज्यादा समझने की जरूरत

- शशिधर खान

	






छत्तीसगढ़ में 16 अप्रील को सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में 29 नक्सली मारे गए, जो सीपीआई (माओवादी) गुट से संबद्ध बताए जाते हैं । पुलिस के अनुसार कांकेड़ जिले के घने जंगलों में सुरक्षा बलों की धरपकड़/तलाशी अभियान टीम पर नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी । पुलिस की ओर से हुई जवाबी फायरिंग में 29 नक्सली मारे गए । 

कांकेड़ के ‘अबूझमड’(अज्ञात) पहाड़ी के नाम से जानी जानेवाली जगह से 29 शव बरामद किए हैं, जो माओवादियों का अभेद्य किला माना जाता है । वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से सरुक्षा बलों की यह बहुत बड़ी सफलता है । राष्ट्रीय स्तर पर भी आंकड़ा देखने से पता चलता है कि 16.04.2024 से पहले २०१८ में एक ही बड़ी मुठभेड़ महाराष्ट्र के गढ़चिरोली जिले में हुई, जिसमें ३७ नक्सली मारे गए । छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की तरह महाराष्ट्र में भी गढ़चिरोली माओवादियों की मजबूत गढ़ है । 


अमित शाह ने पूर्व काँग्रेस मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर नक्सलियों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने का आरोप लगाया और दावा किया कि विष्णुदेव साय के मुख्यमंत्री बनने के चार महीने के अंदर ९० नक्सली मारे गए, 123 गिरफ्तार किए गए तथा 250 ने आत्मसमर्पण कर दिया । 






25 मई, २०१३ को छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी में हुए कथित माओवादी हमले में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत राज्य के सभी कांग्रेसी नेता मारे गए । चुनावी रैली के दौरान हुए उस हमले में 29 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है । लेकिन उस हमले की जांच रिपोर्ट को लेकर चल रही सियासी राजनीति की कानूनी और चुनावी दावों की पुष्टि ‘कवरअप’अभियान में उलझी है । 10 साल बाद २०२३ में विधान सभा चुनाव के समय उस घटना की जांच रिपोर्ट का मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया । यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि उस एक हमले में माओवादियों का हाथ था या नहीं, जिसमें सारे कांग्रेसी नेता मारे गए । 

२०२० में छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने २०१३ झीरम घाटी हमले में मारे गये एक कांग्रेसी नेता के पुत्र की एफआईआर दर्ज की, जिसमें कहा गया कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) इसके पीछे षडयंत्र की जांच नहीं कर पायी । एनआईए ने उस एफआईआर को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी और खारिज हो गयी । फिर एनआईए सुप्रीम कोर्ट गयी, जहां सीजेआई डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़ की पीठ ने छत्तीसगढ़ पुलिस की जांच में हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया । यह आदेश 24.11.2023 को आया । 

छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार द्वारा चलाया गया सलवा जुडूम अभियान के तहत नक्सली काट में युवकों को हथियार देकर लाइसेंसी नक्सली बनाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर, 2008 में कहा - ‘अगर किसी को सरकार हथियार देती है तो वह छद्म पुंलिस का दावा करता है और वह कोई भी अपराध कर सकता है ।’इस तीखी टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल रोक लगाने कहा । 

अब जरा दार्जिलिंग चलते है, जहां स्थित नक्सलबाड़ी में शांति मुंडा 82 साल की उम्र में वृद्धावस्था पेंशन पाते हुए जवाबी हिंसा को कोस रही हैं । याद रहे 25 मई, 1967 को हाथीघीसा में शांति मुंडा ने ही १५ दिन के बच्चे को पीठ पर बांधे पुलिस इंस्पेक्टर पर पहला तीर चलाया था । उसी घटना से नक्सल आंदोलन की शुरूआत हुई थी । अब उस समय की एकमात्र वही नेता जीवित बची हैं । उन्होंने जवाबी हिंसा से पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार के नक्सली सफाया अभियान को जी भरकर कोसा और फर्जी मुठभेड़ दिखाकर बेकसूरों को निशाना बनाने की निंदा की । शांति मुंडा ने कहा - ‘खातमेर राजनीति गलत है, कितनों को आप मारेंगे । इससे मिला क्या, मुझे सिर्फ अपनी जोतवाली जमीन के सिवाए कुछ नहीं मिला ।’जमीन्दार के कब्जे से रैयती जमीन छीनने के लिये जुटी महिलाओं के साथ पुलिस इंस्पेक्टर से शांति मुंडा भिड़ी थीं । नक्सल आंदोलन के जन्मदाता चारु मजुमदार के पुत्र अभिजित मजुमदार ने 2009 में दार्जीलिंग से लोकसभा चुनाव लड़ा था । 

हर मुठभेड़ के बाद इसके फर्जी होने के आरोप को एक सिरे से खारिज नहीं किया जा  सकता । क्योंकि नक्सली प्रायः मुठभेड़ की नौबत कम ही आने देते हैं । छत्तीसगढ़ से आरोप आ रहे हैं कि पुलिस हाट-बाजार, खरीदारी करनेवाले लोगों को मारकर नक्सली बता देती है ।