आखिर कैसे होगा मणिपुर हिंसा पर काबू - शशिधर खान मणिपुर में शांति के प्रयास लगातार जारी हैं । लेकिन साथ-साथ हिंसा भी जारी है और हिंसा पर काबू पाना संभव नहीं हो रहा है । इसलिए शांति और सरकार गठन के लिए विभिन्न जातीय गुटों को प्रतिनिधित्व करनेवाले सिविल सोसायटी संगठनों की केंद्र से वार्ता बेनतीजा चल रही है । एक-दूसरे के खिलाफ नफरती हिंसा से त्रस्त गुटों में मुख्य रूप से मेइतेइ और कुकी-जो समुदायों के लोग शामिल हैं । केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों के साथ दिल्ली में हुई हालिया बातचीत का एक सुखद संयोग ये रहा कि 2 वर्षों में पहली बार गैर-आदिवासी मेइतेइ और आदिवासी कुकी-जो दोनों ही समुदायों के प्रतिनिधि शामिल थे । 03-05-2023 से मणिपुर में हिंसा जारी है । मणिपुर के भाजपा मुख्यमंत्री एन॰ बीरेन सिंह को हिंसा पर नियंत्रण में विफलता और हिंसा की राजनीति के कारण 09-02-2025 को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा । भाजपा और विपक्षी कांग्रेस समेत कोई भी दल सरकार गठन का दावा करने की स्थिति में नहीं था । इसलिए 13 जनवरी, 2025 को राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया । मुख्यमंत्री के इस्तीफे से पहले राज्यपाल बदले गए । रिटायर केन्द्रीय गृह सचिव अजय कुमार भल्ला को मणिपुर का राज्यपाल केन्द्र सरकार ने बनाया । नए राज्यपाल की नीतियों से तनाव में कुछ हद तक कमी आयी । पुलिस थाने और शस्त्रागार से लुटे गए हथियार लोगों ने सौंपे । लेकिन आम जनता को राहत नहीं मिली । क्योंकि छिटफुट हिंसा रूक नहीं पायी । राष्ट्रपति शासन लगाने के बाद विधान सभा को निलंबित अवस्था में रखा गया, ताकि सरकार गठन का रास्ता खुला रहे । कुकी-जो समुदाय के भाजपा समेत 10 विधायकों ने केन्द्र सरकार के इस फैसले का स्वागत किया, मगर मेइतेइ लोगों को अच्छा नहीं लगा । राष्ट्रपति शासन लगाने से नाराज होनेवालों में मुख्यमंत्री एन॰ बीरेन सिंह भी थे, जो मेइतेइ समुदाय से ही आते हैं । मणिपुर विधान सभा का कार्यकाल 2027 तक है । 13 फरवरी के बाद से कुकी-जो समेत नगा और अन्य गैर-मेइतेइ समुदाय के लोग राज्य में शांति तथा लोकप्रिय सरकार की वापसी की कोशिश में जुटे हैं । हिंसा से कुकी-जो लोगों को जान-माल की क्षति ज्यादा हुई है । इसलिए कुकी-जो समुदाय के लोग मई, २०२३ में हिंसा भड़कने के समय से ही अपने लिए अलग प्रशासन की मांग कर रहे हैं । अपनी मांग पर अड़े रहने के बावजूद उन लोगों ने सिविल सोसायटी संगठनों की ओर से हुई वार्ता की पहल का स्वागत किया । केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 01 मार्च को मणिपुर के इलाकों का जायजा लिया और सामान्य स्थिति बहाली की दिशा में सार्थक कदम उठाए । राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने के बाद से वो पहली उच्चस्तरीय समीक्षा की । सभी पहलुओं पर विमर्श करके केंद्रीय गृहमंत्री ने कई निर्देश मणिपुर प्रशासन को दिए । गृह मंत्रालय की ओर से जारी 04 मार्च के वक्तव्य के अनुसार सबसे पहले तो मणिपुर प्रशासन से उन धार्मिक संस्थाओं को चुस्त-दुरूस्त करके चालू करने कहा, जो हिंसा में क्षतिग्रस्त हुए । 08 मार्च तक मणिपुर की सारी सड़कों से लोगों की मुक्त आवाजाही और म्यांमार से लगी सीमा पर बाड़ लगाने का काम पूरा करने कहा गया । उसके अलावे केंद्रीय गृह मंत्री ने इस बात पर बल दिया कि सारे लूटे गए हथियार 30 जून तक बरामद कर लिए जाएं । नागरिकों और उग्रवादियों के पास बड़ी संख्या में हथियारों का होना हिंसा, रंगदारी वसूली तथा अपहरण का कारण है । आर्थिक नाकेबंदी और आपसी वैमनस्य के कारण एक समुदाय के लोगों ने दूसरे समुदाय के इलाकों की ओर जानेवाली सड़कें बंद कर रखी थी । गृह मंत्रालय के निर्देश की प्रतिक्रिया में कुकी-जो लोगों का प्रतिनिधित्व करनेवाली जनजातीय एकता कमिटी ने कह दिया कि जबतक उनके लिए अलग प्रशासन गठित नहीं हो जाता, वे सड़कें बंद रखेंगे । झगड़ा समुदायों का ही नहीं, उनके इलाकों के जमीन की स्थिति को लेकर भी है । इंफाल घाटी पहाड़ियों से घिरी है । घाटी में मेइतेइ और पहाड़ियों में कुकी-जो की आबादी रहती है । इनका आपसी सरोकार बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने सारे हाइवे और ग्रामीण सड़कें खोलने का निर्देश दिया था । समझाने-बुझाने के प्रयास में केंद्रीय गृह मंत्रालय के उत्तर पूर्व सलाहकार अक्षय कुमार मिश्र ने 12 मार्च को इंफाल में कुकी-जो और मेइतेइ समुदायों के सिविल सोसायटी संगठनों से अलग-अलग मुलाकात की । उसके पहले 08 मार्च को कांगपोकपी में एक स्थानीय वाशिंदे की हत्या के कारण फिर से हिंसा का माहौल बन गया था । तीन घंटे चली बातचीत में ताजी हिंसा के अलावे नेशनल हाइवे खोलने पर विमर्श के बाद अक्षय मिश्र ने मणिपुर में सामान्य हालात वापस लाने के लिए गृह मंत्रालय का 13-सूत्री फार्मूला दोनों समुदायों के बीच रखा । 13 मार्च की इंफाल वार्ता भी बेनतीजा रही । कुकी-जो समुदाय के लोगों ने 08 मार्च की हिंसा के विरोध में एनएच नंú 2 और ३७ से व्यावसायिक वाहनों की आवाजाही रोके रखी । यही दोनों सड़कें इंफाल घाटी को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ती है, जो कुकी-जो इलाके से गुजरती हैं । दिल्ली में केन्द्रीय गृह मंत्रालय के साथ हुई हालिया बातचीत (30 जून) के दिन भी एनएच-2 और एनएच-37 से मेइतेइ लोगों का गुजरना कुकी-जो समुदायों ने रोक रखा था । जबकि दिल्ली वार्ता में दोनों समुदायों के लोग इकट्ठे शामिल हुए । इस वार्ता में गृह मंत्रालय के सलाहकार अक्षय मिश्र के साथ खुफिया ब्यूरो के अधिकारी भी शामिल थे । गृह मंत्रालय अधिकारियों के अनुसार 30 जून की बातचीत में सिविल सोसायटी संगठनों ने हाइवे पर बेरोकटोक आवाजाही, किसानों की सुरक्षा, अवैध आप्रवासी के खिलाफ कार्रवाई और हिंसा से विस्थापित लोगों के पुनर्वास का मामला उठाया । लोकप्रिय सरकार की वापसी और शांति के रोडमैप पर भी चर्चा हुई, जैसा कि गृह मंत्रालय अधिकारियों ने बताया । याद रहे कि गृहमंत्री अमित शाह ने शांति के रोडमैप और 30 जून तक सारे लुटे गए हथियार सरेंडर/बरामदगी की बात कही थी । इधर दिल्ली में शांति वार्ता चल रही थी और इंफाल में उसी दिन हिंसा फिर उफनी । लगभग 2 महीने के अंतराल के बाद 30 जून को सिविल सोसायटी संगठनों की गृह मंत्रालय से शांति वार्ता के समय ही मणिपुर के पहले से ही हिंसा का केंद्र चुराचांदपुर जिले में चार व्यक्तियों के हिंसा में मारे जाने की वारदात हुई । मृतकों में एक कुकी उग्रवादी, एक महिला समेत तीन नागरिक शामिल हैं । इंफाल से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार दो कुकी उग्रवादियों की आपस में हुई गोलीबारी में ये जानें गयी । हमले की जिम्मेदारी लेनेवाले प्रतिद्वंदी गुट युनाइटेड कुकी नेशनल आर्मी के प्रवक्ता के अनुसार यह 30-10-2024 की हत्या का बदला था, जिसमें लगभग 30 लोग मारे गए थे । प्रवक्ता ने 30 जून को मारे गए कुकी नेशनल आर्मी कमांडर थांगबोई हाओकिप को सरकारी मुखबिर बताया और आरोप लगाया कि गत वर्ष अक्टूबर हत्याकांड में हाओकिप का हाथ था । 03 मई, २०२३ से भड़की जिस हिंसा के कारण अभी तक हालात सामान्य नहीं हो पाया है, उसके लिए वास्तव में एन॰ बीरेन सिंह जिम्मेदार हैं । मुख्यमंत्री के रूप में उनका हिंसा उकसानेवाला भड़काऊ भाषण एक गैरजिम्मेदार राजनीतिक नेता की तरह था । एन॰ बीरेन सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा तब दिया, जब उन्हें पक्का यकीन हो गया कि सुप्रीम कोर्ट के सामने सफाई देना असंभव हो जाएगा । एन॰ बीरेन सिंह के पूर्वाग्रह से ग्रसित राजनीतिक फैसले और उसमें मणिपुर हाईकोर्ट की भी कथित् संलिप्तता का मामला उसी समय मई, २०२३ में ही सुप्रीम कोर्ट पहुंचा । सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगानेवालों ने मुख्यमंत्री के भड़काऊ भाषण की वीडियो फुटेज क्लिप सबूत के तौर पर पेश की । 04 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने वीडियो फुटेज में रिकार्ड कुकी-जो समुदाय के खिलाफ हिंसा उकसानेवाले भाषण में मुख्यमंत्री की आवाज की जांच का आदेश दिया । जांच रिपोर्ट आने से पहले एन॰ बीरेन सिंह को केंद्रीय गृहमंत्री ने दिल्ली बुलाय और 04 फरवरी को बीरेन सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया । अमित शाह को मई, २०२३ में ही बीरेन सिंह से इस्तीफा मांग लेना चाहिए था, जब उन्होंने बीरेन सिंह को फटकारा कि ‘ज्यादा राजनीति मत करो ।’08 मई, २०२३ को मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ने संवाददाता सम्मेलन में खुद 68 मौतों की पुष्टि की, विस्थापितों की संख्या 9,000 थी । सरकारी आंकड़े के ही अनुसार आज तक 250 से ज्यादा हिंसा में मारे जा चुके हैं और 60,000 लोग विस्थापित हैं । गैर-आदिवासी मेइतेइ समुदाय को एसटी (अनुसूचित जनजाति) का दर्जा देने का निर्णय राजय मंत्रिमंडल ने मार्च, २०२३ के पहले हफ्ते में किया । लेकिन उसे लागू करवाने के लिए मुख्यमंत्री ने मणिपुर हाईकोर्ट का सहारा लिया । हाईकोर्ट ने अपने 27 मार्च के आदेश में मेइतेइ को एसटी दर्जा देने की सिफारिश राज्य सरकार को केंद्र के पास भेजने कहा । मणिपुर सरकार के ऐसा करते ही ऑल ट्राइबल स्टुडेंट्स यूनियन ने उसके विरोध में 03 मई को सोलिडेरिटी मार्च निकाला और हिंसा भड़क उठी । उस पर मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के उकसाऊ भाषण ने आग में घी का काम किया । भाजपा के ही एक विधायक ने मणिपुर हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर हाईकोर्ट को कड़े लहजे में चेताया कि यह मामला अदालत का नहीं, केंद्र के अधिकार क्षेत्र का है और हाईकोर्ट के महकमे में नहीं आता, इसलिए अपनी सीमा में रहें । मणिपुर में एसटी दर्जा कुकी-जो को प्राप्त है और राज्य सरकार ने मेइतेइ समुदाय के दवाब में ऐसा किया । 10 दिन बाद 18 मई को मुख्यमंत्री अपने चार मंत्रियों के साथ अमित शाह से मिलने दिल्ली पहुंचे । केंद्रीय गृह मंत्री ने एन॰ बीरेन सिंह को फटकारा कि ज्यादा राजनीति मत करो और मणिपुर की घटनाओं पर नाराजगी जतायी । कुकी समुदाय के 10 भाजपा विधायकों ने उसी समय अलग प्रशासन की मांग उठायी और अलग कुकी लैंड राज्य की भी मांग फिर से तेज हुई । आम जनता का राज्य सरकार से भरोसा उठ गया और केंद्र की नीतियों पर भी सवाल उठने लगे । हिंसा और उससे बेघर हुए पीड़ित परिवारों का मामला सुप्रीम कोर्ट गया । केंद्र नेतृत्व परिवर्तन छोड़कर अन्य विकल्पों को आजमाता रहा । आज जिस कुकी समुदाय को विश्वास में लेने पर केंद्र सरकार ज्यादा जोर दे रही है, उससे 2008 से केंद्र का एक-दूसरे के खिलाफ ऑपरेशन स्थगित रखने (एस ओ एस - सस्पेंसन ऑफ ऑपरेशन) समझौता चल रहा था, जिसे राज्य सरकार ने मार्च, २०२३ में मेइतेइ को खुश करने के फैसले से पहले ही वापस ले लिया । आपसी विश्वास खंडित हो चुका है । इसलिए इतने प्रयासों के बावजूद हालात सामान्य नहीं हो रहे हैं । अगस्त, २०२३ में ही सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू व कश्मीर हाईकोर्ट की रिटायर चीफ जस्टिस गीता मित्तल की अध्यक्षता में हिंसा प्रभावितों के राहत और पुनर्वास का जायजा लेने के लिए कमिटी गठित की । उस कमिटी का कार्यकाल 17-03-2025 को ३१ जुलाई तक बढ़ा दिया । क्षतिग्रस्त धार्मिक स्थलों की मरम्मति का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने दिया था । विस्थापितों का भविष्य अधर में लटका है । मार्च, 2025 में ही मणिपुर हाईकोर्ट के द्विवार्षिक समारोह में शामिल होने उस समय सुप्रीम कोर्ट जज बी॰ आर॰ गवई के साथ पांच जजों की टीम गयी और उसी क्रम में राहत शिविरों का भी दौरा किया । २०२३ में ही केंद्र सरकार ने हिंसा से जुड़े अपराधियों का मुकदमा मणिपुर हाईकोर्ट से असम हाईकोर्ट में स्थानान्तरित करने की अर्जी लगायी । इसका मतलब केंद्र का मणिपुर हाईकोर्ट पर भरोसा नहीं था । राज्य की भाजपा सरकार और हिंसा पर काबू पाने के लिए तैनात केंद्रीय सुरक्षा बलों पर केंद्र की निर्भरता भी शांति और सुव्यवस्था में बाधक बन रही है । ऑर्म्ड फार्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (आफ़्स्पा AFSPA) से मणिपुर की जनता को नफरत है । 1980 से काँग्रेस सरकारों की तरह भाजपा भी आफ़्स्पा पर निर्भर है । इसी कानून को हटाने के खिलाफ जनसमर्थन से सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने १४ वर्षों तक अनशन किया । इस कानून के तहत तैनात सेना और अर्द्धसैनिक बलों की किसी भी ज्यादती को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती । सामाजिक कार्यकर्ता मनोरमा देवी को उग्रवादी होने के संदेह में बलात्कार और हत्या करके जवानों द्वारा सड़क पर फेंक दिए जाने की घटना की जांच के लिए 2004 में गठित कमिटी प्रमुख जस्टिस बी॰ पी॰ जीवन रेड्डी ने कहा आफ़्स्पा को ‘काला कानून’बताकर केंद्र को इसका विकल्प तैयार करने कहा था । भाजपा को सिर्फ सत्ता परिवर्तन चाहिए था । २०२२ में दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद एन॰ बीरेन सिंह के किए का फल जनता भुगत रही है । लोकसभा चुनाव २०२४ में भाजपा मणिपुर की दोनों सीटें हारी । मणिपुर की भावनाओं को समझने की जरूरत है । 30 जून की दिल्ली की वार्ता में शामिल सिविल सोसायटी गुटों ने २० मई की ऐसी घटना का मामला गृह मंत्रालय के सामने उठाया । सुरक्षा बलों ने राज्य ट्रांसपोर्ट बस पर ‘मणिपुर’राज्य ढंकने का प्रयास किया, जिससे मणिपुरियों की भावना को ठेस पहुंची और लोग सड़कों पर उत्तर आए ।
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Internal Security Manipur
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