‘अलग झंडा और संविधान’ पर नगा हल संभव नहीं

                                                                                                 - शशिधर खान

	



नगालैंड के विधायकों ने विद्रोही नगा गुट नेशनल सोसलिस्ट कांउसिल ऑफ नगालिम (आईएम-आइसाक मुइवा) को आमंत्रित कर विवादास्पद ‘अलग झंडा और संविधान’ जैसे मुद्दे पर बातचीत करने का केंद्र सरकार से आग्रह किया है । नगा राजनीतिक मसले का सर्वसम्मत अंतिम समाधान निकालने के लिए बनी संसदीय समिति ने केंद्र से गुहार लगायी है कि एनएससीएन (आईएम) नगा नेताओं को बुलाकर इनकी अलग झंडा और अलग संविधान जैसी विवादित मांग पर जल्द-से-जल्द वार्ता की जाए, जो हल के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा है । नगालैंड के सभी 60 विधायक और दो संसद सदस्य इस संसदीय समिति के सदस्य हैं, जिसकी हालिया बैठक में केंद्र से की गयी इस अपील का प्रस्ताव पारित किया गया । 

विदित हो कि नगालैंड के सभी 60 सदस्य एक ही गठजोड़ के बनैर तले खड़े हैं और यह एकजुटता सिर्फ नगा झमेले का अंतिम हल निकालने के लिए आपस में कायम की गयी है । नगालैंड विधान सभा में विपक्ष है ही नहीं । भाजपा समेत सारे क्षेत्रीय /राष्ट्रीय दलों के विधायकों ने एक ही मंच पर आकर गठजोड़ कायम किया हुआ है, इस एकीकृत सरकार का एकमात्र मकसद आपसी राजनीतिक मतभेद भुलाकर नगा उग्रवादियों और केंद्र के बीच चल रही शांतिवार्ता को ठोस नतीजे पर पहुंचाने का प्रयास किया जाए । इसके लिए बनी संसदीय समिति की इसी हफ्ते हुई बैठक इस माएने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि भारत नगा वार्ता सिर्फ ‘अलग झंडा और संविधान’ के अड़ियल रवैए के कारण बेनतीजा चल रही है । इस सिलसिले में अगस्त, 2015 में केंद्र और एनएससीएन (आईएम) नेताओं से दिल्ली में हुई ‘फ्रेमवर्क डील’ का भी जिक्र किया, जिससे दोनों पक्षों के बीच इस समस्या में ‘फाइनल डील’ का रास्ता खुला । 



नगालैंड विधायकों/सांसदों की संसदीय समिति अब तक के प्रयासों की समीक्षा के बाद इस नतीजे पर पहुंची कि अगस्त, 2015 की ‘फ्रेमवर्क डील’ के आलोक में एनएससीएन (आईएम) से अंतिम समाधान की वार्ता जल्द की जाए । 






अप्रील, २०२२ में वार्ताकार अक्षय मिश्र एक-डेढ़ महीने तक नगालैंड में रहकर नगा नेताओं के अड्डे पर जाकर वार्ता कर खाली हाथ लौटे हैं । ताजा पहल का राजनीतिक पहलू भी है । क्योंकि २०२३ के शुरू में ही नगालैंड विधान सभा का चुनाव है । 

नगा नेताओं को भी वो बात नहीं भूलनी चाहिए जो प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने विद्रोह की नींव रखनेवाले फिजो को 1952 में कहा था - ‘आजाद नगालिम मैं तो क्या भारत का कोई प्रधानमंत्री नहीं दे सकता’ ।